देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २
| या विद्येत्यभिधीयते श्रुतिपथे शक्तिः सदाद्या परा<br>सर्वज्ञा भवबन्धच्छित्तिनिपुणा सर्वाशये संस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया सुदुरात्मभिश्च मुनिभिर्ध्यानास्पदं प्रापिता<br>प्रत्यक्षा भवतीह सा भगवती सिद्धिप्रदा स्यात्सदा॥ ४ | वैदिक मार्गानुसार जिसे ‘विद्या’ कहते हैं, जो सर्वदा ‘आदिशक्ति’ कही जाती हैं, जिन्हें योगीलोग ‘पराशक्ति’ भी कहते हैं; जो सर्वज्ञ, भवबन्धन काटनेमें निपुण हैं तथा जो सबके हृदयदेशमें विराजती रहती हैं और दुरात्मा प्राणी जिन्हें नहीं जान सकते, मुनियोंके ध्यान करनेपर जो शीघ्र प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं, वे भगवती सर्वदा सिद्धिदायिनी बनी रहें॥ ४॥ |
| सृष्ट्वाखिलं जगदिदं सदसत्स्वरूपं<br>शक्त्या स्वया त्रिगुणया परिपाति विश्वम्।<br>संहृत्य कल्पसमये रमते तथैका<br>तां सर्वविश्वजननीं मनसा स्मरामि॥ ५ | जो सत्-असत्रूप उस जगत्की सृष्टि करके अपनी त्रिगुणात्मिका (सत्त्व, रज, तम) शक्तिद्वारा उसका पालन करती तथा प्रलयान्तमें उसका संहार करके अकेली स्वयं लीलारमण करती हैं, उन समस्त विश्वकी जननी भगवतीका मैं मन-ही-मन स्मरण करता हूँ॥ ५॥ |
| ब्रह्मा सृजत्यखिलमेतदिति प्रसिद्धं<br>पौराणिकैश्च कथितं खलु वेदविद्भिः।<br>विष्णोस्तु नाभिकमले किल तस्य जन्म<br>तैरूक्तमेव सृजते न हि स स्वतन्त्रः॥ ६ | यह संसारमें प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा ही इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं, साथ ही सभी वेदज्ञ तथा पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। उनका यह भी कथन है कि भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ही उन ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वतन्त्र नहीं हैं, अपितु विष्णुकी प्रेरणासे ही वे संसारकी सृष्टि करते हैं॥ ६॥ |
| विष्णुस्तु शेषशयने स्वपितीति काले<br>तन्नाभिपद्ममुकुले खलु तस्य जन्म।<br>आधारतां किल गतोऽत्र सहस्रमौलिः<br>सम्बोध्यातां स भगवान् हि कथं मुरारिः॥ ७ | जब कल्पान्तमें सर्वत्र जलमय हो जाता है, तब केवल शेषशय्यापर भगवान् विष्णु शयन करते हैं और उन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्माका आविर्भाव होता है। इस प्रकार जब सहस्र फणवाले शेष ही विष्णुके आधार हैं, तो फिर उन मुरारिको भी सर्वाधार भगवान् कैसे कहा जाय?॥ ७॥ |
| एकार्णवस्य सलिलं रसरूपमेव<br>पात्रं विना न हि रसस्थितिरस्ति कच्चित्।<br>या सर्वभूतविषये किल शक्तिरूपा<br>तां सर्वभूतजननीं शरणं गतोऽस्मि॥ ८ | प्रलयकालीन समुद्रका जल भी तो रसरूप ही है और बिना पात्र रस कहीं ठहर नहीं सकता। अतएव जो सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे विराजती रहती हैं, मैं उन सम्पूर्ण संसारकी जननी आदिशक्ति भगवतीकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ८॥ |
| योगनिद्रामीलिताक्षं विष्णुं दृष्ट्वाम्बुजे स्थितः।<br>अजस्तुष्टाव यां देवीं तामहं शरणं गतः॥ ९ | योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णुको देखकर उनके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माने जिन देवीकी स्तुति की थी, मैं उन्हीं पराशक्ति भगवतीके शरणागत हूँ॥ ९॥ |
| तां ध्यात्वा सगुणां मायां मुक्तिदां निर्गुणां तथा।<br>वक्ष्ये पुराणमखिलं शृण्वन्तु मुनयस्त्विह॥ १० | हे मुनिजनो! उन्हीं निर्गुण तथा सगुण रूपवाली तथा मुक्तिदायिनी योगमायाका ध्यान करके मैं यहाँ सम्पूर्ण देवीभागवतपुराण कह रहा हूँ; आपलोग सुनिये॥ १०॥ |