देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 82
अ० २ ] प्रथम स्कन्ध ७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुराणमुत्तमं पुण्यं श्रीमद्भागवताभिधम्।<br>अष्टादश सहस्राणि श्लोकास्तत्र तु संस्कृताः ॥ ११<br>स्कन्धा द्वादश चैवात्र कृष्णेन विहिताः शुभाः।<br>त्रिशतं पूर्णमध्याया अष्टादशयुताः स्मृताः ॥ १२<br>विंशतिः प्रथमे तत्र द्वितीये द्वादशैव तु।<br>त्रिंशच्चैव तृतीये तु चतुर्थे पञ्चविंशतिः ॥ १३<br>पञ्चत्रिंशत्तथाध्यायाः पञ्चमे परिकीर्तिताः।<br>एकत्रिंशत्तथा षष्ठे चत्वारिंशाच्च सप्तमे ॥ १४<br>अष्टमे तत्त्वसङ्ख्याश्च पञ्चाशन्नवमे तथा।<br>त्रयोदश तु सम्प्रोक्ता दशमे मुनिना किल ॥ १५<br>तथा चैकादशस्कन्धे चतुर्विंशतिरीरिताः।<br>चतुर्दशैव चाध्याया द्वादशे मुनिसत्तमाः ॥ १६ | यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण अत्यन्त पवित्र एवं उत्तम है। इसमें अठारह हजार सुन्दर श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायनद्वारा विरचित इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणमें कल्याणकारी बारह स्कन्ध तथा कुल तीन सौ अठारह अध्याय बताये गये हैं। उनमें प्रथम स्कन्धमें बीस अध्याय, द्वितीयमें बारह, तृतीयमें तीस और चतुर्थमें पच्चीस अध्याय हैं। पंचम स्कन्धमें पैंतीस अध्याय, षष्ठमें इकतीस, सप्तममें चालीस, अष्टममें तत्त्व-संख्या* के बराबर अर्थात् चौबीस, नवममें पचास और दशम स्कन्धमें तेरह अध्याय मुनि व्यासजीने कहे हैं। इसी प्रकार हे मुनिगण! एकादश स्कन्धमें चौबीस और द्वादश स्कन्धमें चौदह अध्याय बताये गये हैं॥ ११—१६॥ |
| एवं सङ्ख्या समाख्याता पुराणेऽस्मिन्महात्मना।<br>अष्टादशसहस्रीया सङ्ख्या च परिकीर्तिता ॥ १७ | इस प्रकार महात्मा व्यासजीने इस महापुराणमें अध्यायोंकी संख्या बतायी है। इसमें श्लोकोंकी संख्या अठारह हजार कही गयी है॥ १७॥ |
| सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १८ | सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश-वर्णन, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित—इस प्रकार पुराणोंके ये पाँच लक्षण हैं॥ १८॥ |
| निर्गुणा या सदा नित्या व्यापिका विकृता शिवा।<br>योगगम्याखिलाधारा तुरीया या च संस्थिता ॥ १९<br>तस्यास्तु सात्त्विकी शक्ती राजसी तामसी तथा।<br>महालक्ष्मीः सरस्वती महाकालीति ताः स्त्रियः ॥ २० | जो कल्याणमयी भगवती नित्या, निर्गुणा, व्यापकरूपसे सृष्टिमें स्थित रहनेवाली, विकाररहित, योगगम्या, सबकी आधाररूपा तथा तुरीयावस्थामें प्रतिष्ठित हैं; उन्हींकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली नामक देवियोंके रूपमें प्रकट होती हैं॥ १९-२०॥ |
| तासां तिसृणां शक्तीनां देहाङ्गीकारलक्षणः।<br>सृष्ट्यर्थं च समाख्यातः सर्गः शास्त्रविशारदैः ॥ २१ | उन्हीं तीनों शक्तियोंका सृष्टिके लिये शरीर धारण करना ही शास्त्रके विद्वानोंके द्वारा 'सर्ग' कहा गया है॥ २१॥ |
| हरिद्रुहिणरुद्राणां समुत्पत्तिस्ततः स्मृता।<br>पालनोत्पत्तिनाशार्थं प्रतिसर्गः स्मृतो हि सः ॥ २२ | तदनन्तर जगत्के सृजन, पालन तथा संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी उत्पत्ति कही गयी है; और उसे ही प्रतिसर्ग बताया गया है॥ २२॥ |
| सोमसूर्योद्भवानां च राज्ञां वंशप्रकीर्तनम्।<br>हिरण्यकशिप्वादीनां वंशास्ते परिकीर्तिताः ॥ २३<br>स्वायम्भुवमुखानां च मनूनां परिवर्णनम्।<br>कालसङ्ख्या तथा तेषां तत्तन्मन्वन्तराणि च ॥ २४<br>तेषां वंशानुकथनं वंशानुचरितं स्मृतम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि भवन्ति मुनिसत्तमाः ॥ २५ | चन्द्रवंशी, सूर्यवंशी राजाओंके वंशवर्णन तथा हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंके वंशकथनको 'वंश' कहा गया है; इसी प्रकार स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओंका वर्णन एवं उनके समय-विभाग मन्वन्तर कहलाते हैं। उन मनुओंके वंशका क्रमशः वर्णन करना ही 'वंशानुचरित' कहा गया है। हे मुनिवरो! इस प्रकार सभी पुराण उपर्युक्त पाँचों लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ २३—२५॥ |
* सांख्यशास्त्रमें प्रकृति, महत्, अहंकार आदि चौबीस तत्त्व माने जाते हैं।