भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77
६८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५

| श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद् ब्राह्मणानां धनं<br>धर्मो धर्मसुतेन यत्र गदितो नारायणेनामलः।<br>गायत्र्याश्च रहस्यमत्र च मणिद्वीपश्च संवर्णितः<br>श्रीदेव्या हिमभूभृते भगवती गीता च गीता स्वयम्॥ ९७ | श्रीमद्देवीभागवतपुराण अत्यन्त निर्मल है। जो ब्राह्मणोंका अमूल्य धन है और जिसमें स्वयं धर्मपुत्र नारायणने पवित्र धर्मका वर्णन किया है। इसमें श्रीगायत्रीदेवीका रहस्य एवं मणिद्वीपका सम्यक् वर्णन किया गया है। साथ ही इसमें हिमालयके प्रति स्वयं भगवतीद्वारा कही गयी देवीगीता विद्यमान है॥ ९७॥ | | तस्मान्नास्य पुराणस्य लोकेऽन्यत्सदृशं परम्।<br>अतः सदैव संसेव्यं देवीभागवतं द्विजाः॥ ९८ | इस कारण हे विप्रो! इस महापुराणके सदृश दूसरा कोई उत्तम पुराण लोकमें नहीं है, अतः आपलोग सदा इस श्रीमद्देवीभागवतका भलीभाँति सेवन करें॥ ९८॥ | | यस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता<br>नो वा हरिर्न गिरिशो न हि चाप्यनन्तः।<br>अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ ९९ | जिनके सम्पूर्ण प्रभावको ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष भी भलीभाँति नहीं जान सकते जबकि वे उन्हींके अंशज भी हैं, तब दूसरे देवता उन्हें कैसे जान सकेंगे? उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा निरन्तर प्रणाम है॥ ९९॥ | | यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं<br>ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।<br>रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ १०० | जिनके चरण-कमलोंकी धूलि पाकर ब्रह्मा समस्त संसारकी रचना करते हैं, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं; दूसरे किसी उपायसे वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकते—ऐसी उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा सतत प्रणाम है॥ १००॥ | | सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते<br>मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे।<br>विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां<br>नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते॥ १०१ | अमृत-सागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्ता-मणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है॥ १०१॥ | | ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता ।<br>जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता॥ १०२ | इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र—आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणि-द्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें॥ १०२॥ |

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत- श्रवणविधिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥

~~ ० ~~

॥ समाप्तमिदं श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्॥

~~ ० ~~

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 D