भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६७ | | :--- | :--- |

| पुराणपुस्तकस्यापि ये पट्टवसनं नवम्।<br>प्रयच्छन्ति शुभं सूत्रं ते नराः सुखभागिनः ॥ ८४ | जो मनुष्य पुराणपुस्तकके लिये नवीन रेशमी वस्त्र तथा सुन्दर सूत्रका दान करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥ ८४ ॥ | | पुराणानां तु सर्वेषां श्रवणाद्यत्फलं लभेत्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं देवीभागवताल्लभेत् ॥ ८५ | सभी पुराणोंके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे सौगुना पुण्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे होता है ॥ ८५ ॥ | | यथा सरित्सु प्रवरा गङ्गा देवेषु शङ्करः।<br>काव्ये रामायणं यद्वज्ज्योतिष्मत्सु यथा रविः ॥ ८६<br><br>आह्लादकानां चन्द्रश्च धनानाञ्च यथा यशः।<br>क्षमावतां यथा भूमिर्गाम्भीर्ये सागरो यथा ॥ ८७<br><br>मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः।<br>अष्टादशपुराणानां देवीभागवतं तथा ॥ ८८ | जिस प्रकार नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं; देवताओंमें शिव, काव्योंमें वाल्मीकीय रामायण तथा तेजस्वियोंमें भगवान् सूर्य श्रेष्ठ हैं; और जैसे आनन्द देनेवालोंमें चन्द्रमा, सब धनोंमें सुयश, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, गम्भीरतामें समुद्र, मन्त्रोंमें गायत्री तथा पापनाशके उपायोंमें भगवत्स्मरण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार अठारहों पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८६-८८ ॥ | | येन केनाप्युपायेन नवकृत्वः शृणोति चेत्।<br>न शक्यं तत्फलं वक्तुं जीवन्मुक्तः स एव हि ॥ ८९ | जिस किसी भी उपायसे यदि कोई मनुष्य इस महापुराणकी नौ आवृत्तियाँ सुन ले तो उसके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह तो जीवन्मुक्त ही हो जाता है ॥ ८९ ॥ | | राजशत्रुभये प्राप्ते महामारीभये तथा।<br>दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च तच्छान्त्यै शृणुयादिदम् ॥ ९० | किसी शत्रु राजासे भय होनेपर, महामारीके समय, अकाल पड़नेपर तथा राष्ट्र-भंगके अवसरपर उसकी शान्तिके लिये यह पुराण सुनना चाहिये ॥ ९० ॥ | | भूतप्रेतविनाशाय राज्यलाभाय शत्रुतः।<br>पुत्रलाभाय शृणुयाद्देवीभागवतं द्विजाः ॥ ९१ | हे विप्रो! भूत-प्रेतादिके शमनके लिये, शत्रुसे राज्य प्राप्त करनेके लिये और पुत्र-प्राप्तिके लिये श्रीमद्देवीभागवतका श्रवण करना चाहिये ॥ ९१ ॥ | | श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥ ९२ | जो देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ९२ ॥ | | भगवत्या स्वयं देव्या श्लोकार्धेन प्रकाशितम्।<br>शिष्यप्रशिष्यद्वारेण तदेव विपुलीकृतम् ॥ ९३ | स्वयं भगवती जगदम्बाने इस पुराणको सर्वप्रथम केवल आधे श्लोकमें ही प्रकाशित किया, वही बादमें शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा देवीभागवतके रूपमें विस्तृत कर दिया गया ॥ ९३ ॥ | | न गायत्र्याः परो धर्मो न गायत्र्याः परं तपः।<br>न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः परो मनुः ॥ ९४ | गायत्रीसे बढ़कर न कोई धर्म है, न तप है, न कोई देवता है और न कोई मन्त्र ही है ॥ ९४ ॥ | | गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्यते।<br>सात्र भागवते देवी सरहस्या प्रतिष्ठिता ॥ ९५<br><br>अतो भागवतस्यास्य देव्याः प्रीतिकरस्य च।<br>महान्त्यपि पुराणानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ९६ | भगवती अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करती हैं, इसी कारणसे उन्हें गायत्री कहा जाता है। वे भगवती गायत्री इस पुराणमें अपने रहस्योंसहित विराजती हैं। अतः भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस देवीभागवतकी सोलहवीं कलाके समान भी अन्य महापुराण नहीं हो सकते ॥ ९५-९६ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 C