भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 75
६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पौराणिकीं कथां दिव्यां येऽपि शृण्वन्त्यभक्तितः ।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखदारिद्र्यभागिनाम् ॥ ७२जो लोग इस दिव्य पौराणिक कथाको श्रद्धारहित होकर सुनते हैं, उन दुःख तथा दारिद्र्य-युक्त मनुष्योंको कथाश्रवणका पुण्य-फल प्राप्त नहीं होता ॥ ७२ ॥
असम्पूज्य पुराणं तु ताम्बूलकुसुमादिभिः ।<br>ये शृण्वन्ति कथां देव्यास्ते दरिद्रा भवन्ति हि ॥ ७३<br><br>कीर्त्यमानां कथां त्यक्त्वा ये व्रजन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ॥ ७४जो लोग ताम्बूल, पुष्प आदि उपचारोंसे पुराणका पूजन किये बिना ही देवीकी कथा सुनते हैं, वे दरिद्र होते हैं और जो लोग कथाके बीचमें ही उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, कुछ ही समय बाद उनकी सम्पदाएँ एवं स्त्री आदि नष्ट हो जाती हैं ॥ ७३-७४ ॥
ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः ।<br>ते वायसा भवन्त्यत्र भुक्त्वा निरययातनाम् ॥ ७५जो अभिमानवश व्याससे ऊँचे स्थानपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरक-यातना भोगकर इस लोकमें कौएकी योनि पाते हैं ॥ ७५ ॥
ये चाढ्यासनसंस्थाश्च ये वीरासनसंस्थिताः ।<br>शृण्वन्ति च कथां दिव्यां ते स्युरर्जुनशाखिनः ॥ ७६जो बहुमूल्य आसनपर अथवा वीरासनसे बैठकर दिव्य कथाका श्रवण करते हैं, वे 'अर्जुन' वृक्ष होते हैं ॥ ७६ ॥
कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम् ।<br>रासभास्ते भवन्तीह कृकलासास्ततः परम् ॥ ७७कथा होते समय जो लोग व्यर्थ तर्क-वितर्क करते हैं, वे इस लोकमें पहले गर्दभयोनिमें तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जाते हैं ॥ ७७ ॥
निन्दन्ति ये पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम् ।<br>ते तु जन्मशतं दुष्टाः शुनकाः स्युर्न संशयः ॥ ७८जो लोग पुराण जाननेवालोंकी अथवा पापनाशिनी कथाकी निन्दा करते हैं, वे सैकड़ों जन्मतक दुष्ट कुत्ते होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७८ ॥
ये शृण्वन्ति कथां वक्तुः समानासनसंस्थिताः ।<br>गुरुतल्पसमं पापं लभन्ते नरकालयाः ॥ ७९<br><br>ये चाप्रणम्य शृण्वन्ति ते भवन्ति विषद्रुमाः ।<br>शयाना येऽपि शृण्वन्ति भवन्त्यजगराहयः ॥ ८०जो लोग कथावाचकके बराबर आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, उन्हें गुरुके आसनपर बैठनेका पाप लगता है और वे नरकमें वास करते हैं। जो लोग वक्ताको प्रणाम किये बिना ही कथा सुनने लगते हैं, वे जन्मान्तरमें विषैले वृक्ष होते हैं। इसी प्रकार जो लोग लेटे-लेटे कथा सुनते हैं; वे अजगर, साँपकी योनि पाते हैं ॥ ७९-८० ॥
ये कदाचन पौराणीं न शृण्वन्ति कथां नराः ।<br>ते घोरं नरकं भुक्त्वा भवन्ति वनसूकराः ॥ ८१<br><br>ये कथां नानुमोदन्ते विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः ।<br>कोट्यब्दं निरयं भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः ॥ ८२जो मनुष्य कभी भी पुराणकी कथा नहीं सुनते, वे घोर नरक भोगकर बनैले सूअरकी योनिमें जाते हैं। जो शठ मनुष्य कथाका अनुमोदन नहीं करते अपितु उसमें विघ्न डाला करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक-यातना भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ८१-८२ ॥
आसनं भाजनं द्रव्यं फलं वस्त्राणि कम्बलम् ।<br>पुराणज्ञाय यच्छन्ति ते व्रजन्ति हरेः पदम् ॥ ८३जो लोग पुराणवेत्ताको आसन, पात्र, द्रव्य, फल, वस्त्र तथा कम्बल प्रदान करते हैं, वे भगवान्‌के परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ८३ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 3 B