देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौराणिकीं कथां दिव्यां येऽपि शृण्वन्त्यभक्तितः ।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखदारिद्र्यभागिनाम् ॥ ७२ | जो लोग इस दिव्य पौराणिक कथाको श्रद्धारहित होकर सुनते हैं, उन दुःख तथा दारिद्र्य-युक्त मनुष्योंको कथाश्रवणका पुण्य-फल प्राप्त नहीं होता ॥ ७२ ॥ |
| असम्पूज्य पुराणं तु ताम्बूलकुसुमादिभिः ।<br>ये शृण्वन्ति कथां देव्यास्ते दरिद्रा भवन्ति हि ॥ ७३<br><br>कीर्त्यमानां कथां त्यक्त्वा ये व्रजन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ॥ ७४ | जो लोग ताम्बूल, पुष्प आदि उपचारोंसे पुराणका पूजन किये बिना ही देवीकी कथा सुनते हैं, वे दरिद्र होते हैं और जो लोग कथाके बीचमें ही उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, कुछ ही समय बाद उनकी सम्पदाएँ एवं स्त्री आदि नष्ट हो जाती हैं ॥ ७३-७४ ॥ |
| ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः ।<br>ते वायसा भवन्त्यत्र भुक्त्वा निरययातनाम् ॥ ७५ | जो अभिमानवश व्याससे ऊँचे स्थानपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरक-यातना भोगकर इस लोकमें कौएकी योनि पाते हैं ॥ ७५ ॥ |
| ये चाढ्यासनसंस्थाश्च ये वीरासनसंस्थिताः ।<br>शृण्वन्ति च कथां दिव्यां ते स्युरर्जुनशाखिनः ॥ ७६ | जो बहुमूल्य आसनपर अथवा वीरासनसे बैठकर दिव्य कथाका श्रवण करते हैं, वे 'अर्जुन' वृक्ष होते हैं ॥ ७६ ॥ |
| कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम् ।<br>रासभास्ते भवन्तीह कृकलासास्ततः परम् ॥ ७७ | कथा होते समय जो लोग व्यर्थ तर्क-वितर्क करते हैं, वे इस लोकमें पहले गर्दभयोनिमें तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जाते हैं ॥ ७७ ॥ |
| निन्दन्ति ये पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम् ।<br>ते तु जन्मशतं दुष्टाः शुनकाः स्युर्न संशयः ॥ ७८ | जो लोग पुराण जाननेवालोंकी अथवा पापनाशिनी कथाकी निन्दा करते हैं, वे सैकड़ों जन्मतक दुष्ट कुत्ते होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७८ ॥ |
| ये शृण्वन्ति कथां वक्तुः समानासनसंस्थिताः ।<br>गुरुतल्पसमं पापं लभन्ते नरकालयाः ॥ ७९<br><br>ये चाप्रणम्य शृण्वन्ति ते भवन्ति विषद्रुमाः ।<br>शयाना येऽपि शृण्वन्ति भवन्त्यजगराहयः ॥ ८० | जो लोग कथावाचकके बराबर आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, उन्हें गुरुके आसनपर बैठनेका पाप लगता है और वे नरकमें वास करते हैं। जो लोग वक्ताको प्रणाम किये बिना ही कथा सुनने लगते हैं, वे जन्मान्तरमें विषैले वृक्ष होते हैं। इसी प्रकार जो लोग लेटे-लेटे कथा सुनते हैं; वे अजगर, साँपकी योनि पाते हैं ॥ ७९-८० ॥ |
| ये कदाचन पौराणीं न शृण्वन्ति कथां नराः ।<br>ते घोरं नरकं भुक्त्वा भवन्ति वनसूकराः ॥ ८१<br><br>ये कथां नानुमोदन्ते विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः ।<br>कोट्यब्दं निरयं भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः ॥ ८२ | जो मनुष्य कभी भी पुराणकी कथा नहीं सुनते, वे घोर नरक भोगकर बनैले सूअरकी योनिमें जाते हैं। जो शठ मनुष्य कथाका अनुमोदन नहीं करते अपितु उसमें विघ्न डाला करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक-यातना भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ८१-८२ ॥ |
| आसनं भाजनं द्रव्यं फलं वस्त्राणि कम्बलम् ।<br>पुराणज्ञाय यच्छन्ति ते व्रजन्ति हरेः पदम् ॥ ८३ | जो लोग पुराणवेत्ताको आसन, पात्र, द्रव्य, फल, वस्त्र तथा कम्बल प्रदान करते हैं, वे भगवान्के परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ८३ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 3 B
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६७ | | :--- | :--- |
| पुराणपुस्तकस्यापि ये पट्टवसनं नवम्।<br>प्रयच्छन्ति शुभं सूत्रं ते नराः सुखभागिनः ॥ ८४ | जो मनुष्य पुराणपुस्तकके लिये नवीन रेशमी वस्त्र तथा सुन्दर सूत्रका दान करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥ ८४ ॥ | | पुराणानां तु सर्वेषां श्रवणाद्यत्फलं लभेत्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं देवीभागवताल्लभेत् ॥ ८५ | सभी पुराणोंके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे सौगुना पुण्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे होता है ॥ ८५ ॥ | | यथा सरित्सु प्रवरा गङ्गा देवेषु शङ्करः।<br>काव्ये रामायणं यद्वज्ज्योतिष्मत्सु यथा रविः ॥ ८६<br><br>आह्लादकानां चन्द्रश्च धनानाञ्च यथा यशः।<br>क्षमावतां यथा भूमिर्गाम्भीर्ये सागरो यथा ॥ ८७<br><br>मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः।<br>अष्टादशपुराणानां देवीभागवतं तथा ॥ ८८ | जिस प्रकार नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं; देवताओंमें शिव, काव्योंमें वाल्मीकीय रामायण तथा तेजस्वियोंमें भगवान् सूर्य श्रेष्ठ हैं; और जैसे आनन्द देनेवालोंमें चन्द्रमा, सब धनोंमें सुयश, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, गम्भीरतामें समुद्र, मन्त्रोंमें गायत्री तथा पापनाशके उपायोंमें भगवत्स्मरण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार अठारहों पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८६-८८ ॥ | | येन केनाप्युपायेन नवकृत्वः शृणोति चेत्।<br>न शक्यं तत्फलं वक्तुं जीवन्मुक्तः स एव हि ॥ ८९ | जिस किसी भी उपायसे यदि कोई मनुष्य इस महापुराणकी नौ आवृत्तियाँ सुन ले तो उसके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह तो जीवन्मुक्त ही हो जाता है ॥ ८९ ॥ | | राजशत्रुभये प्राप्ते महामारीभये तथा।<br>दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च तच्छान्त्यै शृणुयादिदम् ॥ ९० | किसी शत्रु राजासे भय होनेपर, महामारीके समय, अकाल पड़नेपर तथा राष्ट्र-भंगके अवसरपर उसकी शान्तिके लिये यह पुराण सुनना चाहिये ॥ ९० ॥ | | भूतप्रेतविनाशाय राज्यलाभाय शत्रुतः।<br>पुत्रलाभाय शृणुयाद्देवीभागवतं द्विजाः ॥ ९१ | हे विप्रो! भूत-प्रेतादिके शमनके लिये, शत्रुसे राज्य प्राप्त करनेके लिये और पुत्र-प्राप्तिके लिये श्रीमद्देवीभागवतका श्रवण करना चाहिये ॥ ९१ ॥ | | श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥ ९२ | जो देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ९२ ॥ | | भगवत्या स्वयं देव्या श्लोकार्धेन प्रकाशितम्।<br>शिष्यप्रशिष्यद्वारेण तदेव विपुलीकृतम् ॥ ९३ | स्वयं भगवती जगदम्बाने इस पुराणको सर्वप्रथम केवल आधे श्लोकमें ही प्रकाशित किया, वही बादमें शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा देवीभागवतके रूपमें विस्तृत कर दिया गया ॥ ९३ ॥ | | न गायत्र्याः परो धर्मो न गायत्र्याः परं तपः।<br>न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः परो मनुः ॥ ९४ | गायत्रीसे बढ़कर न कोई धर्म है, न तप है, न कोई देवता है और न कोई मन्त्र ही है ॥ ९४ ॥ | | गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्यते।<br>सात्र भागवते देवी सरहस्या प्रतिष्ठिता ॥ ९५<br><br>अतो भागवतस्यास्य देव्याः प्रीतिकरस्य च।<br>महान्त्यपि पुराणानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ९६ | भगवती अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करती हैं, इसी कारणसे उन्हें गायत्री कहा जाता है। वे भगवती गायत्री इस पुराणमें अपने रहस्योंसहित विराजती हैं। अतः भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस देवीभागवतकी सोलहवीं कलाके समान भी अन्य महापुराण नहीं हो सकते ॥ ९५-९६ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 C
| ६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद् ब्राह्मणानां धनं<br>धर्मो धर्मसुतेन यत्र गदितो नारायणेनामलः।<br>गायत्र्याश्च रहस्यमत्र च मणिद्वीपश्च संवर्णितः<br>श्रीदेव्या हिमभूभृते भगवती गीता च गीता स्वयम्॥ ९७ | श्रीमद्देवीभागवतपुराण अत्यन्त निर्मल है। जो ब्राह्मणोंका अमूल्य धन है और जिसमें स्वयं धर्मपुत्र नारायणने पवित्र धर्मका वर्णन किया है। इसमें श्रीगायत्रीदेवीका रहस्य एवं मणिद्वीपका सम्यक् वर्णन किया गया है। साथ ही इसमें हिमालयके प्रति स्वयं भगवतीद्वारा कही गयी देवीगीता विद्यमान है॥ ९७॥ | | तस्मान्नास्य पुराणस्य लोकेऽन्यत्सदृशं परम्।<br>अतः सदैव संसेव्यं देवीभागवतं द्विजाः॥ ९८ | इस कारण हे विप्रो! इस महापुराणके सदृश दूसरा कोई उत्तम पुराण लोकमें नहीं है, अतः आपलोग सदा इस श्रीमद्देवीभागवतका भलीभाँति सेवन करें॥ ९८॥ | | यस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता<br>नो वा हरिर्न गिरिशो न हि चाप्यनन्तः।<br>अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ ९९ | जिनके सम्पूर्ण प्रभावको ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष भी भलीभाँति नहीं जान सकते जबकि वे उन्हींके अंशज भी हैं, तब दूसरे देवता उन्हें कैसे जान सकेंगे? उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा निरन्तर प्रणाम है॥ ९९॥ | | यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं<br>ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।<br>रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ १०० | जिनके चरण-कमलोंकी धूलि पाकर ब्रह्मा समस्त संसारकी रचना करते हैं, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं; दूसरे किसी उपायसे वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकते—ऐसी उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा सतत प्रणाम है॥ १००॥ | | सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते<br>मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे।<br>विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां<br>नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते॥ १०१ | अमृत-सागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्ता-मणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है॥ १०१॥ | | ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता ।<br>जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता॥ १०२ | इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र—आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणि-द्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें॥ १०२॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत- श्रवणविधिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
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॥ समाप्तमिदं श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 D
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
[ पूर्वार्ध ]
प्रथमः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि।<br>बुद्धिं या नः प्रचोदयात्॥ १ | जो सर्वचेतनात्मकस्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें॥ १॥ |
| शौनक उवाच<br>सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ।<br>यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः॥ २<br>अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ।<br>कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ॥ ३<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद।<br>त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ ४ | **शौनक बोले—**हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण-संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है। हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है॥ २–४॥ |
| अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम्।<br>दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम्॥ ५<br>समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम्।<br>पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः॥ ६ | हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास-योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं। हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण-संहिताका श्रवण करना चाहता है। अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगोंसे उसका वर्णन कीजिये॥ ५-६॥ |
| दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ७ | हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से रहित होकर दीर्घजीवी हों। हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें॥ ७॥ |
| श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः।<br>न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते॥ ८<br>यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते।<br>तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः॥ ९ | हे सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं। जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त होता है॥ ८-९॥ |
| ७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः।<br>सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च॥१० | जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय?॥१०॥ | | अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः।<br>वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः॥११ | अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं॥११॥ | | येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम्।<br>व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः॥१२ | जिस किसी प्रकारसे समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोंका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है और विद्वानोंका समय शास्त्र-चिन्तनमें जाता है॥१२॥ | | शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च।<br>(त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च।<br>वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च॥)<br>नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च॥१३ | शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क-वितर्कसे युक्त हैं। (पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद-विवाद तथा छल-प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत विस्तारवाले हैं॥१३॥ | | सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम्।<br>तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम्॥१४ | उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि वह हेतुवादसे परिपूर्ण है॥१४॥ | | तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः।<br>कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च॥१५ | इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा-भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं॥१५॥ | | तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम्।<br>कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम्॥१६ | आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है॥१६॥ | | उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम्।<br>मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा॥१७<br><br>विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात्।<br>श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम्॥१८ | उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये। उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं॥१७-१८॥ | | त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल।<br>कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः॥१९ | हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं॥१९॥ | | श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च।<br>नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापानेऽमरा यथा॥२० | जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं॥२०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
| अ० २ ] | प्रथम स्कन्ध | ७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| धिक्सुधां पिबतां सूत मुक्तिर्नैव कदाचन।<br>पिबन्भागवतं सद्यो नरो मुच्येत सङ्कटात् ॥ २१ | हे सूतजी! उस अमृतको धिक्कार है, जिसके पीनेसे कभी मुक्ति नहीं होती, परंतु इस भागवतरूपी कथा-सुधाके पानसे तो मनुष्य शीघ्र ही भवसंकटसे मुक्त हो जाता है॥ २१॥ |
| सुधापाननिमित्तं यत् कृता यज्ञाः सहस्रशः।<br>न शान्तिमधिगच्छामः सूत सर्वात्मना वयम् ॥ २२<br><br>मखानां हि फलं स्वर्गः स्वर्गात्प्रच्यवनं पुनः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमणं च निरन्तरम् ॥ २३ | हे सूतजी! अमृतपानके लिये जो हजारों प्रकारके यज्ञ किये गये हैं, उनसे भी सर्वदाके लिये हमें शान्ति नहीं मिली। यज्ञोंका फल तो केवल स्वर्ग है, [पुण्य क्षीण होनेपर] पुनः स्वर्गसे मृत्युलोकमें लौटना ही पड़ता है। इस प्रकार निरन्तर आवागमनके चक्रमें आना-जाना लगा रहता है॥ २२-२३॥ |
| विना ज्ञानेन सर्वज्ञ नैव मुक्तिः कदाचन।<br>भ्रमतां कालचक्रेऽत्र नराणां त्रिगुणात्मके ॥ २४<br><br>अतः सर्वरसोपेतं पुण्यं भागवतं वद।<br>पावनं मुक्तिदं गुह्यं मुमुक्षूणां सदा प्रियम् ॥ २५ | हे सर्वज्ञ! त्रिगुणात्मक कालचक्रमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंकी ज्ञानके बिना मुक्ति कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये सब प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण तथा पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवतपुराण कहिये; जो पवित्र, मुक्तिदायक, गोपनीय तथा मुमुक्षुजनोंको सर्वदा प्रिय है॥ २४-२५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
$\sim\sim\circ\sim\sim$
अथ द्वितीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका निरूपण और उसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| धन्योऽहमतिभाग्योऽहं पावितोऽहं महात्मभिः।<br>यत्पृष्टं सुमहत्पुण्यं पुराणं वेदविश्रुतम् ॥ १ | [हे मुनिजनो!] मैं धन्य और महान् भाग्यशाली हूँ, जो कि आप महात्माओंने वेदविश्रुत तथा अत्यन्त पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणके सम्बन्धमें प्रश्न करके मुझे पवित्र बना दिया॥ १॥ |
| तदहं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वश्रुत्यर्थसम्मतम्।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणामागमानामनुत्तमम् ॥ २ | इसलिये मैं सभी वेदोंके तात्पर्यसे युक्त, सभी शास्त्रों और आगमोंके रहस्यरूप सर्वोत्तम श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको आपलोगोंसे कहता हूँ॥ २॥ |
| नत्वा तत्पदपङ्कजं सुललितं मुक्तिप्रदं योगिनां<br>ब्रह्माद्यैरपि सेवितं स्तुतिपरैर्ध्येयं मुनीन्द्रैः सदा।<br>वक्ष्याम्यद्य सविस्तरं बहुरसं श्रीमत्पुराणोत्तमं<br>भक्त्या सर्वरसालयं भगवतीनाम्ना प्रसिद्धं द्विजाः ॥ ३ | हे द्विजगण! ब्रह्मा-विष्णु-महेशसे सेवित, स्तुतिपरायण मुनिजनोंके सतत ध्यान करनेयोग्य तथा योगियोंको मुक्ति देनेवाले भगवतीके सुन्दर एवं कोमल चरणकमलोंमें प्रणाम करके मैं अब उस उत्तम पुराणका भक्तिपूर्वक विस्तारसे वर्णन करूँगा; जो सभी रसोंसे युक्त, शोभासम्पन्न, सभी रसोंका निधान एवं श्रीमद्देवीभागवतके नामसे प्रसिद्ध है॥ ३॥ |
७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २
| या विद्येत्यभिधीयते श्रुतिपथे शक्तिः सदाद्या परा<br>सर्वज्ञा भवबन्धच्छित्तिनिपुणा सर्वाशये संस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया सुदुरात्मभिश्च मुनिभिर्ध्यानास्पदं प्रापिता<br>प्रत्यक्षा भवतीह सा भगवती सिद्धिप्रदा स्यात्सदा॥ ४ | वैदिक मार्गानुसार जिसे ‘विद्या’ कहते हैं, जो सर्वदा ‘आदिशक्ति’ कही जाती हैं, जिन्हें योगीलोग ‘पराशक्ति’ भी कहते हैं; जो सर्वज्ञ, भवबन्धन काटनेमें निपुण हैं तथा जो सबके हृदयदेशमें विराजती रहती हैं और दुरात्मा प्राणी जिन्हें नहीं जान सकते, मुनियोंके ध्यान करनेपर जो शीघ्र प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं, वे भगवती सर्वदा सिद्धिदायिनी बनी रहें॥ ४॥ |
| सृष्ट्वाखिलं जगदिदं सदसत्स्वरूपं<br>शक्त्या स्वया त्रिगुणया परिपाति विश्वम्।<br>संहृत्य कल्पसमये रमते तथैका<br>तां सर्वविश्वजननीं मनसा स्मरामि॥ ५ | जो सत्-असत्रूप उस जगत्की सृष्टि करके अपनी त्रिगुणात्मिका (सत्त्व, रज, तम) शक्तिद्वारा उसका पालन करती तथा प्रलयान्तमें उसका संहार करके अकेली स्वयं लीलारमण करती हैं, उन समस्त विश्वकी जननी भगवतीका मैं मन-ही-मन स्मरण करता हूँ॥ ५॥ |
| ब्रह्मा सृजत्यखिलमेतदिति प्रसिद्धं<br>पौराणिकैश्च कथितं खलु वेदविद्भिः।<br>विष्णोस्तु नाभिकमले किल तस्य जन्म<br>तैरूक्तमेव सृजते न हि स स्वतन्त्रः॥ ६ | यह संसारमें प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा ही इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं, साथ ही सभी वेदज्ञ तथा पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। उनका यह भी कथन है कि भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ही उन ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वतन्त्र नहीं हैं, अपितु विष्णुकी प्रेरणासे ही वे संसारकी सृष्टि करते हैं॥ ६॥ |
| विष्णुस्तु शेषशयने स्वपितीति काले<br>तन्नाभिपद्ममुकुले खलु तस्य जन्म।<br>आधारतां किल गतोऽत्र सहस्रमौलिः<br>सम्बोध्यातां स भगवान् हि कथं मुरारिः॥ ७ | जब कल्पान्तमें सर्वत्र जलमय हो जाता है, तब केवल शेषशय्यापर भगवान् विष्णु शयन करते हैं और उन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्माका आविर्भाव होता है। इस प्रकार जब सहस्र फणवाले शेष ही विष्णुके आधार हैं, तो फिर उन मुरारिको भी सर्वाधार भगवान् कैसे कहा जाय?॥ ७॥ |
| एकार्णवस्य सलिलं रसरूपमेव<br>पात्रं विना न हि रसस्थितिरस्ति कच्चित्।<br>या सर्वभूतविषये किल शक्तिरूपा<br>तां सर्वभूतजननीं शरणं गतोऽस्मि॥ ८ | प्रलयकालीन समुद्रका जल भी तो रसरूप ही है और बिना पात्र रस कहीं ठहर नहीं सकता। अतएव जो सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे विराजती रहती हैं, मैं उन सम्पूर्ण संसारकी जननी आदिशक्ति भगवतीकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ८॥ |
| योगनिद्रामीलिताक्षं विष्णुं दृष्ट्वाम्बुजे स्थितः।<br>अजस्तुष्टाव यां देवीं तामहं शरणं गतः॥ ९ | योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णुको देखकर उनके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माने जिन देवीकी स्तुति की थी, मैं उन्हीं पराशक्ति भगवतीके शरणागत हूँ॥ ९॥ |
| तां ध्यात्वा सगुणां मायां मुक्तिदां निर्गुणां तथा।<br>वक्ष्ये पुराणमखिलं शृण्वन्तु मुनयस्त्विह॥ १० | हे मुनिजनो! उन्हीं निर्गुण तथा सगुण रूपवाली तथा मुक्तिदायिनी योगमायाका ध्यान करके मैं यहाँ सम्पूर्ण देवीभागवतपुराण कह रहा हूँ; आपलोग सुनिये॥ १०॥ |
अ० २ ] प्रथम स्कन्ध ७३
अ० २ ] प्रथम स्कन्ध ७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुराणमुत्तमं पुण्यं श्रीमद्भागवताभिधम्।<br>अष्टादश सहस्राणि श्लोकास्तत्र तु संस्कृताः ॥ ११<br>स्कन्धा द्वादश चैवात्र कृष्णेन विहिताः शुभाः।<br>त्रिशतं पूर्णमध्याया अष्टादशयुताः स्मृताः ॥ १२<br>विंशतिः प्रथमे तत्र द्वितीये द्वादशैव तु।<br>त्रिंशच्चैव तृतीये तु चतुर्थे पञ्चविंशतिः ॥ १३<br>पञ्चत्रिंशत्तथाध्यायाः पञ्चमे परिकीर्तिताः।<br>एकत्रिंशत्तथा षष्ठे चत्वारिंशाच्च सप्तमे ॥ १४<br>अष्टमे तत्त्वसङ्ख्याश्च पञ्चाशन्नवमे तथा।<br>त्रयोदश तु सम्प्रोक्ता दशमे मुनिना किल ॥ १५<br>तथा चैकादशस्कन्धे चतुर्विंशतिरीरिताः।<br>चतुर्दशैव चाध्याया द्वादशे मुनिसत्तमाः ॥ १६ | यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण अत्यन्त पवित्र एवं उत्तम है। इसमें अठारह हजार सुन्दर श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायनद्वारा विरचित इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणमें कल्याणकारी बारह स्कन्ध तथा कुल तीन सौ अठारह अध्याय बताये गये हैं। उनमें प्रथम स्कन्धमें बीस अध्याय, द्वितीयमें बारह, तृतीयमें तीस और चतुर्थमें पच्चीस अध्याय हैं। पंचम स्कन्धमें पैंतीस अध्याय, षष्ठमें इकतीस, सप्तममें चालीस, अष्टममें तत्त्व-संख्या* के बराबर अर्थात् चौबीस, नवममें पचास और दशम स्कन्धमें तेरह अध्याय मुनि व्यासजीने कहे हैं। इसी प्रकार हे मुनिगण! एकादश स्कन्धमें चौबीस और द्वादश स्कन्धमें चौदह अध्याय बताये गये हैं॥ ११—१६॥ |
| एवं सङ्ख्या समाख्याता पुराणेऽस्मिन्महात्मना।<br>अष्टादशसहस्रीया सङ्ख्या च परिकीर्तिता ॥ १७ | इस प्रकार महात्मा व्यासजीने इस महापुराणमें अध्यायोंकी संख्या बतायी है। इसमें श्लोकोंकी संख्या अठारह हजार कही गयी है॥ १७॥ |
| सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १८ | सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश-वर्णन, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित—इस प्रकार पुराणोंके ये पाँच लक्षण हैं॥ १८॥ |
| निर्गुणा या सदा नित्या व्यापिका विकृता शिवा।<br>योगगम्याखिलाधारा तुरीया या च संस्थिता ॥ १९<br>तस्यास्तु सात्त्विकी शक्ती राजसी तामसी तथा।<br>महालक्ष्मीः सरस्वती महाकालीति ताः स्त्रियः ॥ २० | जो कल्याणमयी भगवती नित्या, निर्गुणा, व्यापकरूपसे सृष्टिमें स्थित रहनेवाली, विकाररहित, योगगम्या, सबकी आधाररूपा तथा तुरीयावस्थामें प्रतिष्ठित हैं; उन्हींकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली नामक देवियोंके रूपमें प्रकट होती हैं॥ १९-२०॥ |
| तासां तिसृणां शक्तीनां देहाङ्गीकारलक्षणः।<br>सृष्ट्यर्थं च समाख्यातः सर्गः शास्त्रविशारदैः ॥ २१ | उन्हीं तीनों शक्तियोंका सृष्टिके लिये शरीर धारण करना ही शास्त्रके विद्वानोंके द्वारा 'सर्ग' कहा गया है॥ २१॥ |
| हरिद्रुहिणरुद्राणां समुत्पत्तिस्ततः स्मृता।<br>पालनोत्पत्तिनाशार्थं प्रतिसर्गः स्मृतो हि सः ॥ २२ | तदनन्तर जगत्के सृजन, पालन तथा संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी उत्पत्ति कही गयी है; और उसे ही प्रतिसर्ग बताया गया है॥ २२॥ |
| सोमसूर्योद्भवानां च राज्ञां वंशप्रकीर्तनम्।<br>हिरण्यकशिप्वादीनां वंशास्ते परिकीर्तिताः ॥ २३<br>स्वायम्भुवमुखानां च मनूनां परिवर्णनम्।<br>कालसङ्ख्या तथा तेषां तत्तन्मन्वन्तराणि च ॥ २४<br>तेषां वंशानुकथनं वंशानुचरितं स्मृतम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि भवन्ति मुनिसत्तमाः ॥ २५ | चन्द्रवंशी, सूर्यवंशी राजाओंके वंशवर्णन तथा हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंके वंशकथनको 'वंश' कहा गया है; इसी प्रकार स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओंका वर्णन एवं उनके समय-विभाग मन्वन्तर कहलाते हैं। उन मनुओंके वंशका क्रमशः वर्णन करना ही 'वंशानुचरित' कहा गया है। हे मुनिवरो! इस प्रकार सभी पुराण उपर्युक्त पाँचों लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ २३—२५॥ |
* सांख्यशास्त्रमें प्रकृति, महत्, अहंकार आदि चौबीस तत्त्व माने जाते हैं।
| ७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सपादलक्षं च तथा भारतं मुनिना कृतम्।<br>इतिहास इति प्रोक्तं पञ्चमं वेदसम्मतम्॥ २६ | सवा लाख श्लोकोंका महाभारत नामक ग्रन्थ भी व्यासजीने ही रचा है; यह ‘इतिहास’ कहलाता है—जो वेदसम्मत होनेके कारण पाँचवाँ वेद कहा गया है॥ २६॥ |
| शौनक उवाच<br>कानि तानि पुराणानि ब्रूहि सूत सविस्तरम्।<br>कतिसङ्ख्यानि सर्वज्ञ श्रोतुकामा वयं त्विह॥ २७ | शौनकजी बोले— हे सूतजी! वे पुराण कौन-कौनसे हैं और कितने हैं? हमलोगोंको सुननेकी उत्कट इच्छा है और आप सर्वज्ञ हैं, अतः विस्तारसे बताइये॥ २७॥ |
| कलिकालविभीताः स्मो नैमिषारण्यवासिनः।<br>ब्रह्मणात्र समादिष्टाश्चक्रं दत्त्वा मनोमयम्॥ २८<br><br>कथितं तेन नः सर्वानगच्छन्त्वेतस्य पृष्ठतः।<br>नेमिः संशीर्यते यत्र स देशः पावनः स्मृतः॥ २९<br><br>कलेस्तत्र प्रवेशो न कदाचित् सम्भविष्यति।<br>तावत्तिष्ठन्तु तत्रैव यावत्सत्ययुगं पुनः॥ ३० | कलिकालसे भयभीत हम ब्राह्मण नैमिषारण्यमें ही रहते हैं। ब्रह्माजीने मनोमय चक्र हमें देकर यह आदेश दिया था कि इसी चक्रके पीछे-पीछे आपलोग जायँ। जहाँ इस चक्रकी नेमि शीर्ण हो जाय, वह देश परम पवित्र कहा गया है। वहाँ कभी कलियुगका प्रवेश नहीं होगा। आपलोग वहाँ तबतक रहें, जबतक पुनः ‘सत्ययुग’ न आ जाय॥ २८–३०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गृहीत्वा तत्कथानकम्।<br>चालयन्निर्गतस्तूर्णं सर्वदेशदिदृक्षया॥ ३१ | उनका वह वचन सुनकर तथा उनकी बातोंको हृदयमें रखकर हमलोग सब देशोंके दर्शनार्थ उस मनोमय चक्रके पीछे-पीछे तत्काल चल दिये॥ ३१॥ |
| प्रेत्यात्र चालयंश्चक्रं नेमिः शीर्णोऽत्र पश्यतः।<br>तेनेदं नैमिषं प्रोक्तं क्षेत्रं परमपावनम्॥ ३२ | चलते-चलते इसी स्थानपर पहुँचकर उस चक्रकी नेमि हमलोगोंके देखते-देखते शीर्ण हो गयी। तभीसे यह स्थान परम पवित्र ‘नैमिषक्षेत्र’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ३२॥ |
| कलिप्रवेशो नैवात्र तस्मात्स्थानं कृतं मया।<br>मुनिभिः सिद्धसङ्घैश्च कलिभीतैर्महात्मभिः॥ ३३ | यहाँ कभी कलिको प्रवेश नहीं होता। इसीलिये मैंने अनेक ऋषि-मुनियों, सिद्धगणों एवं कलिसे भयभीत महात्माओंके साथ यहाँ अपना निवास बना लिया है॥ ३३॥ |
| पशुहीनाः कृता यज्ञाः पुरोडाशादिभिः किल।<br>कालातिवाहनं कार्यं यावत्सत्ययुगागमः॥ ३४ | हमलोगों ने यहाँपर चरु-पुरोडाश आदिद्वारा अनेक पशुवध-विहीन यज्ञ किये हैं। जबतक सत्ययुग न आ जाय तबतक हमलोगोंका यहीं रहनेका दृढ़ निश्चय है॥ ३४॥ |
| भाग्ययोगेन सम्प्राप्तः सूत त्वं चात्र सर्वथा।<br>कथयाद्य पुराणं हि पावनं ब्रह्मसम्मतम्॥ ३५ | हे सूतजी! आप निश्चितरूपसे हमलोगोंके सौभाग्यसे ही यहाँ आ पहुँचे हैं। इसलिये आप इस ब्रह्मसम्मत पावन पुराणकी कथा कहिये॥ ३५॥ |
| सूत शुश्रूषवः सर्वे वक्ता त्वं मतिमानथ।<br>निर्व्यापारा वयं नूनमेकचित्तास्तथैव च॥ ३६ | हे सूतजी! हमलोगोंको सुननेकी उत्कट इच्छा है और आप-जैसे बुद्धिमान् वक्ता भी प्राप्त हैं। हमलोग भी अपना सभी कार्य त्यागकर चित्त एकाग्र करके यहाँ स्थित हैं॥ ३६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
| अ० ३ ] | प्रथम स्कन्ध | ७५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम्॥ ३७<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम्।<br>विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल॥ ३८ | अतः हे सूतजी! आप चिरंजीवी हों तथा तीनों प्रकारके तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से मुक्त रहकर अब हमलोगोंको परम पवित्र तथा कल्याणकारी श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनाइये; जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विधिवत् वर्णन किया गया है। महर्षि व्यासने भी बताया है कि इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके पुनः उससे मुक्ति मिलती है॥ ३७-३८॥ |
| द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम्।<br>न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम्॥ ३९ | हे सूतजी! महर्षि वेदव्यासने जिस पवित्र पुराणको कहा है, उसके मनोहर कथा-चरित्रोंको सुननेसे हमारी कभी तृप्ति नहीं होती है॥ ३९॥ |
| सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र-<br>मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् ।<br>निखिलमलगणानां नाशकत्कामदं<br>प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम्॥ ४० | सभी गुणोंका एकमात्र स्थान, परम पवित्र, समस्त संसारकी जननी भगवतीके लीलानाट्यके समान विचित्र, सभी पापसमूहोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले तथा भगवतीके नामसे समन्वित श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणको प्रकट कीजिये॥ ४०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु सम्प्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः।<br>यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ १ | सूतजी बोले—हे मुनीश्वरवृन्द! सत्यवती-सुत वेद-व्यासजीसे मैंने जिस प्रकार तत्त्वपूर्वक पुराणोंको सुना है, उसे मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये॥ १॥ |
| मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।<br>अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्॥ २ | उनमें दो ‘म’ वाले (मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण), दो ‘भ’ वाले (भविष्यपुराण तथा भागवत), तीन ‘ब्र’ वाले (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और ब्रह्मवैवर्तपुराण), चार ‘व’ वाले (वामन, विष्णु, वायु और वाराहपुराण), ‘अ’ वाला (अग्निपुराण), ‘ना’ वाला (नारदपुराण), ‘प’ वाला (पद्मपुराण), ‘लिं’ वाला (लिंगपुराण), ‘ग’ वाला (गरुडपुराण), ‘कू’ वाला (कूर्मपुराण), ‘स्क’ वाला (स्कन्दपुराण)—ये पृथक्-पृथक् (अठारह) पुराण हैं॥ २॥ |
| ७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चतुर्दशसहस्रं च मत्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम्।<br>तथा ग्रहसहस्रं तु मार्कण्डेयं महाद्भुतम्॥ ३<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४ | उनमें आदिके मत्स्यपुराणमें चौदह हजार, अत्यन्त अद्भुत मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा भविष्यपुराणमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक-संख्या तत्त्वदर्शी मुनियोंने बतायी है॥ ३-४॥ |
| अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल।<br>तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम्॥ ५<br>द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम्।<br>तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च॥ ६ | पवित्र भागवतपुराणमें अठारह हजार और ब्रह्म-पुराणमें दस हजार श्लोक हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार एक सौ तथा ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं॥ ५-६॥ |
| अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च।<br>चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक॥ ७<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम्।<br>चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम्॥ ८<br>षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञितम्।<br>पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम्॥ ९ | हे शौनक! वामनपुराणमें दस हजार तथा वायुपुराणमें चौबीस हजार छः सौ श्लोक हैं। उस परम विचित्र विष्णुपुराणमें तेईस हजार, वाराहपुराणमें चौबीस हजार, अग्निपुराणमें सोलह हजार तथा नारद-पुराणमें पचीस हजार श्लोक कहे गये हैं॥ ७-९॥ |
| पञ्चपञ्चाशतसाहस्रं पाद्माख्यं विपुलं मतम्।<br>एकादशसहस्राणि लैङ्गाख्यं चातिविस्तृतम्॥ १०<br>एकोनविंशत्साहस्रं गारुडं हरिभाषितम्।<br>सप्तदशसहस्रं च पुराणं कूर्मभाषितम्॥ ११ | विशाल पद्मपुराणमें पचपन हजार और लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। इसी प्रकार साक्षात् भगवान्के द्वारा कहे हुए गरुडपुराणमें उन्नीस हजार तथा कूर्मपुराणमें सत्रह हजार श्लोक हैं॥ १०-११॥ |
| एकाशीतिसहस्राणि स्कान्दाख्यं परमाद्भुतम्।<br>पुराणाख्या च संख्या च विस्तरेण मयानघाः॥ १२ | परम विचित्र स्कन्दपुराणमें इक्यासी हजार श्लोक कहे गये हैं। हे पापरहित मुनियो! इस प्रकार मैंने पुराणों तथा उनके श्लोकोंकी संख्या विस्तारपूर्वक बता दी॥ १२॥ |
| तथैवोपपुराणानि शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः।<br>सनत्कुमारं प्रथमं नारसिंहं ततः परम्॥ १३<br>नारदीयं शिवं चैव दौर्वाससमनुत्तमम्।<br>कापिलं मानवं चैव तथा चौशनसं स्मृतम्॥ १४<br>वारुणं कालिकाख्यं च साम्बं नन्दिकृतं शुभम्।<br>सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम्॥ १५<br>माहेश्वरं भागवतं वासिष्ठं च सविस्तरम्।<br>एतान्युपपुराणानि कथितानि महात्मभिः॥ १६ | हे मुनिवरो! अब उपपुराणोंकी भी संख्या सुनिये। उनमें सर्वप्रथम उपपुराण सनत्कुमार है, तत्पश्चात् नरसिंह, नारदीय, शिव, दुर्वासा, कपिल, मनु, उशना, वरुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सौर, पराशर, आदित्य, माहेश्वर, भागवत तथा अठारहवाँ वासिष्ठ—ये सब उपपुराण महात्माओंद्वारा बताये गये हैं॥ १३-१६॥ |
| अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ १७ | सत्यवतीतनय वेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी रचना करनेके बाद उन्हीं विषयोंसे विस्तारपूर्वक उस अतुलनीय 'महाभारत' का प्रणयन किया॥ १७॥ |
| मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे द्वापरे युगे।<br>प्रादुःकरोति धर्मार्थी पुराणानि यथाविधि॥ १८<br>द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा।<br>वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया॥ १९ | प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् वेदव्यासजी ही धर्मरक्षार्थ पुराणोंकी यथाविधि रचना करते रहते हैं। जब-जब द्वापरयुग आता है, तब-तब साक्षात् भगवान् विष्णु ही व्यासजीके रूपमें अवतीर्ण होकर सर्वलोकहितार्थ वेदके अनेक भेदोपभेद करते हैं॥ १८-१९॥ |
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अल्पायुषोऽल्पबुद्धींश्च विप्रान् ज्ञात्वा कलावथ।<br>पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे युगे॥ २० | विशेषकर कलियुगमें ब्राह्मणोंको अल्पायु एवं अल्पबुद्धि जानकर वे युग-युगमें पवित्र पुराण-संहिताओंका निर्माण करते हैं॥ २०॥ |
| स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम्।<br>तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ २१ | स्त्रियों, शूद्रों तथा भ्रष्ट द्विजातियोंको वेद-श्रवणका अधिकार नहीं है, इसलिये उनके कल्याणके लिये व्यासजीने पुराणोंकी रचना की है॥ २१॥ |
| मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे।<br>अष्टाविंशतिमे प्राप्ते द्वापरे मुनिसत्तमाः॥ २२<br>व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे धर्मवित्तमः।<br>एकोनत्रिंशत्संप्राप्ते द्रौणिर्व्यासो भविष्यति॥ २३<br>अतीतास्तु तथा व्यासाः सप्तविंशतिरेव च।<br>पुराणसंहितास्तैस्तु कथितास्तु युगे युगे॥ २४ | हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस वैवस्वत नामक शुभ सातवें मन्वन्तरके अट्ठाइसवें द्वापरयुगमें परम धर्मनिष्ठ सत्यवतीपुत्र मेरे गुरु श्रीव्यासजी हुए और उनतीसवें द्वापरमें द्रौणि नामके व्यास होंगे। इनके पूर्व भी सत्ताईस व्यास हो चुके हैं, जिन्होंने प्रत्येक युगमें अनेक पुराण-संहिताएँ रची हैं॥ २२–२४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्रूहि सूत महाभाग व्यासाः पूर्वयुगोद्भवाः।<br>वक्तारस्तु पुराणानां द्वापरे द्वापरे युगे॥ २५ | ऋषियोंने कहा— हे महाभाग सूतजी! अब आप पूर्वकालमें प्रत्येक द्वापरयुगमें अवतीर्ण हुए पुराणवक्ता व्यासोंकी कथा कहिये॥ २५॥ |
| सूत उवाच<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्ताः स्वयं वेदाः स्वयम्भुवा।<br>प्रजापतिर्द्वितीये तु द्वापरे व्यासकार्यकृत्॥ २६<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे तु बृहस्पतिः।<br>पञ्चमे सविता व्यासः षष्ठे मृत्युस्तथापरे॥ २७ | सूतजी बोले— सृष्टिके बाद सर्वप्रथम द्वापरयुगमें स्वयं ब्रह्माजीने ही 'व्यास' के रूपमें प्रकट होकर वेदोंका विभाजन किया। दूसरे द्वापरमें 'प्रजापति' व्यास बने, तीसरे द्वापरमें 'शुक्राचार्य', चौथे द्वापरमें 'बृहस्पति', पाँचवेंमें 'सूर्य' तथा छठेमें 'यमराज' ही साक्षात् व्यास बने थे॥ २६–२७॥ |
| मघवा सप्तमे प्राप्ते वसिष्ठस्त्वष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतस्तु नवमे त्रिधामा दशमे तथा॥ २८ | सातवें द्वापरमें 'इन्द्र', आठवेंमें 'वसिष्ठमुनि', नवेंमें 'सारस्वत' और दसवें द्वापरमें 'त्रिधामाजी' व्यास हुए॥ २८॥ |
| एकादशेऽथ त्रिवृषो भरद्वाजस्ततः परम्।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो धर्मश्चापि चतुर्दशे॥ २९ | ग्यारहवेंमें 'त्रिवृष', बारहवेंमें 'भरद्वाजमुनि', तेरहवेंमें 'अन्तरिक्ष' और चौदहवें द्वापरमें 'धर्मराज' स्वयं व्यास बने॥ २९॥ |
| त्रय्यारुणिः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>मेधातिथिः सप्तदशे व्रती ह्यष्टादशे तथा॥ ३० | पन्द्रहवें द्वापरमें 'त्रय्यारुणि', सोलहवेंमें 'धनंजय', सत्रहवेंमें 'मेधातिथि' तथा अठारहवें द्वापरमें 'व्रतीमुनि' व्यास हुए॥ ३०॥ |
| अत्रिरेकोनविंशेऽथ गौतमस्तु ततः परम्।<br>उत्तमश्चैकविंशेऽथ हर्यात्मा परिकीर्तितः॥ ३१ | उन्नीसवेंमें 'अत्रि', बीसवेंमें 'गौतम' और इक्कीसवें द्वापरमें हर्यात्मा 'उत्तम' नामक व्यास कहे गये हैं॥ ३१॥ |
| वेनो वाजश्रवाश्चैव सोमोऽमुष्यायणस्तथा।<br>तृणबिन्दुस्तथा व्यासो भार्गवस्तु ततः परम्॥ ३२ | बाईसवेंमें 'वाजश्रवा वेन', तेईसवेंमें 'आमुष्यायण सोम', चौबीसवेंमें 'तृणविन्दु' तथा पचीसवें द्वापरमें 'भार्गव' व्यास हुए॥ ३२॥ |
| ७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः शक्तिर्जातुकर्ण्यः कृष्णद्वैपायनस्ततः।<br>अष्टाविंशतिसंख्येयं कथिता या मया श्रुता॥ ३३ | छब्बीसवेंमें 'शक्ति', सत्ताईसवेंमें 'जातुकर्ण्य' और अट्ठाईसवें द्वापरमें 'कृष्णद्वैपायनजी' व्यास हुए। इस प्रकार अट्ठाईस व्यासोंके नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बता दिया॥ ३३॥ |
| कृष्णद्वैपायनात्प्रोक्तं पुराणं च मया श्रुतम्।<br>श्रीमद्भागवतं पुण्यं सर्वदुःखौघनाशनम्॥ ३४ | इन्हीं कृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा कहे गये श्रीमद्देवीभागवतपुराणको मैंने सुना था; जो पुण्यप्रद, सब प्रकारके दुःखोंका नाश करनेवाला, सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मोक्षदाता, वैदिक भावोंसे ओत-प्रोत तथा सभी आगमोंके रसोंसे परिपूर्ण, अत्यन्त मनोहर एवं मुमुक्षुजनोंको सदा प्रिय लगनेवाला है॥ ३४-३५॥ |
| कामदं मोक्षदं चैव वेदार्थपरिबृंहितम्।<br>सर्वागमरसारामं मुमुक्षूणां सदा प्रियम्॥ ३५ | |
| व्यासेन कृत्वातिशुभं पुराणं<br>शुकाय पुत्राय महात्मने यत्।<br>वैराग्ययुक्ताय च पाठितं वै<br>विज्ञाय चैवारणिसम्भवाय॥ ३६ | जिस अत्यन्त पवित्र पुराणको रचकर व्यासजीने अरणीके गर्भसे उत्पन्न, विद्वान्, महात्मा एवं विरक्त अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया था; हे मुनिवृन्द! उसी रहस्यमय महापुराण (श्रीमद्देवीभागवत)-को मैंने भी करुणासागर अपने गुरु व्यासजीके मुखसे सम्पूर्णरूपसे यथार्थतः सुना तथा उनकी कृपासे उसे हृदयंगम कर लिया है॥ ३६-३७॥ |
| श्रुतं मया तत्र तथा गृहीतं<br>यथार्थवद्व्यासमुखान्मुनीन्द्राः ।<br>पुराणगुह्यं सकलं समेतं<br>गुरोः प्रसादात्करुणानिधेश्च॥ ३७ | |
| सूतेन पृष्टः सकलं जगाद<br>द्वैपायनस्तत्र पुराणगुह्यम्।<br>अयौनिजेनाद्भुतबुद्धिना वै<br>श्रुतं मया तत्र महाप्रभावम्॥ ३८ | जिस समय अयोनoutputिज एवं अपूर्व बुद्धिमान् अपने पुत्र शुकदेवजीके प्रश्न करनेपर व्यासजीने रहस्ययुक्त इस पुराणको सुनाया, उस समय मैंने भी एक साधारण श्रोताके रूपमें इस महान् प्रभाववाले श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराणको सुन लिया॥ ३८॥ |
| श्रीमद्भागवतामरांघ्रिपफलास्वादादरः सत्तमाः<br>संसारार्णवदुविर्गाह्यसलिलं सन्तर्तुकामः शुकः।<br>नानाख्यानरसालयं श्रुतिपुटैः प्रेम्णाशृणोदद्भुतं<br>तच्छ्रुत्वा न विमुच्यते कलिभयादेवंविधः कः क्षितौ॥ ३९ | हे सर्वश्रेष्ठ मुनिजन! श्रीमद्भागवतरूपी इस कल्पवृक्षके फलके स्वादके प्रति आदरबुद्धि रखनेवाले तथा अपार संसार-सागरसे पार पानेके लिये श्रीशुकदेवजीने अनेक प्रकारकी सुन्दर एवं रसमयी कथाओंसे युक्त जिस अद्भुत महापुराणको विधिवत् अपने कर्णपुटसे प्रेमपूर्वक सुना है, उसे श्रवण करके भी जो कलिकालके भयसे मुक्त न हुआ, भला ऐसा प्राणी इस भूतलपर कौन होगा?॥ ३९॥ |
| पापीयानपि वेदधर्मरहितः स्वाचारहीनाशयो<br>व्याजेनापि शृणोति यः परमिदं श्रीमत्पुराणोत्तमम्।<br>भुक्त्वा भोगकलापमत्र विपुलं देहावसानेऽचलं<br>योगिप्राप्यमवाप्नुयाद्भगवतीनामाङ्कितं सुन्दरम्॥ ४० | वैदिक धर्मसे रहित तथा निकृष्ट विचार रखनेवाला बड़े-से-बड़ा पापी मनुष्य भी यदि किसी बहाने इस उत्तम श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कर लेता है तो वह भी निश्चय ही समस्त सांसारिक सुखोंको भोगकर अन्तमें योगिजनोंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य, भगवतीके नामसे चिह्नित, मनोरम तथा अचल पदको प्राप्त कर लेता है॥ ४०॥ |
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७९
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७९
| या निर्गुणा हरिहरादिभिरप्यलभ्या<br>विद्या सतां प्रियतमाथ समाधिगम्या।<br>सा तस्य चित्तकुहरे प्रकरोति भावं<br>यः संशृणोति सततं तु सतीपुराणम्॥ ४१ | जो प्राणी इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणको प्रतिदिन प्रेमसे सुनता है, उसके हृदयरूपी गुहामें विष्णु, शिव आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ, सर्वश्रेष्ठ विद्यारूपिणी, सज्जनोंकी एकमात्र प्रिया, गुणातीता एवं समाधिद्वारा जाननेयोग्य वे भगवती निवास करने लगती हैं ॥ ४१ ॥ | | सम्प्राप्य मानुषभवं सकलाङ्गयुक्तं<br>पोतं भवार्णवजलोत्तरणाय कामम्।<br>सम्प्राप्य वाचकमहो न शृणोति मूढः<br>स वञ्चितोऽत्र विधिना सुखदं पुराणम्॥ ४२ | अतः सर्वांगसुन्दर इस मानव-तनको पाकर संसार-सागरके अगाध सलिलसे पार होनेके लिये जलयानके समान परम सुखदायी श्रीमद्देवीभागवतपुराण एवं उसके वक्ताको प्राप्त करके भी जो मूर्ख इसका श्रवण नहीं करता, वह विधाताके द्वारा वंचित ही कहा जायगा ॥ ४२ ॥ | | यः प्राप्य कर्णयुगलं पटुमानुषत्वे<br>रागी शृणोति सततं च परापवादान्।<br>सर्वार्थदं रसनिधिं विमलं पुराणं<br>नष्टः कुतो न शृणुते भुवि मन्दबुद्धिः॥ ४३ | इस दुर्लभ मनुष्य देहमें दोनों कानोंको प्राप्त करके भी जो सांसारिक मनुष्य केवल दूसरोंके दुर्गुणोंको ही सुना करता है, वह अधम मन्दबुद्धि चारों उत्तम पदार्थोंको देनेवाले तथा सब रसोंसे परिपूर्ण इस निर्मल पुराणको भूतलपर क्यों नहीं सुनता ? ॥ ४३ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुराणवर्णन-पूर्वकतत्तद्युगीयव्यासवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
नारदजीद्वारा व्यासजीको देवीकी महिमा बताना
| ऋषय ऊचुः<br>सौम्य व्यासस्य भार्यायां कस्यां जातः सुतः शुकः।<br>कथं वा कीदृशो येन पठितेयं सुसंहिता॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सौम्य ! महर्षि व्यासकी किस पत्नीसे शुकदेवजी उत्पन्न हुए ? उनका जन्म किस प्रकार हुआ और किस प्रकारसे उन्होंने इस संहिताका सम्यक् अध्ययन कर लिया ? ॥ १ ॥ | | अयोनिजस्त्वया प्रोक्तस्तथा चारणिजः शुकः।<br>सन्देहोऽस्ति महांस्तत्र कथयाद्य महामते॥ २ | आपके द्वारा ही वे अयोनिज कहे गये हैं तो फिर अरणीसे उनकी उत्पत्ति कैसे हुई ? हे महामते ! इसमें हमें महान् संशय हो रहा है, आप उसका समाधान करें ॥ २ ॥ | | गर्भयोगी श्रुतः पूर्वं शुको नाम महातपाः।<br>कथं च पठितं तेन पुराणं बहुविस्तरम्॥ ३ | हमलोगोंने पहले ही सुना है कि महातपस्वी शुकदेवजी गर्भयोगी थे। ऐसी स्थितिमें उन्होंने इतने विस्तृत पुराण (श्रीमद्देवीभागवत)-का अध्ययन कैसे कर लिया ? ॥ ३ ॥ | | सूत उवाच<br>पुरा सरस्वतीतीरे व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>आश्रमे कलविंकौ तु दृष्ट्वा विस्मयमागतः॥ ४ | सूतजी बोले—प्राचीन कालमें एक समय सत्यवतीके पुत्र व्यासजी सरस्वतीनदीके किनारे अपने आश्रममें गौरैया पक्षीका जोड़ा देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४ ॥ |
८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| जातंमात्रं शिशुं नीडे मुक्तमण्डान्मनोहरम्।<br>ताम्रास्यं शुभसर्वाङ्गं पिच्छांकुरविवर्जितम्॥ ५<br>तौ तु भक्ष्यार्थमत्यन्तं रतौ श्रमपरायणौ।<br>शिशोश्चंचुपुटे भक्ष्यं क्षिपन्तौ च पुनः पुनः॥ ६<br>अङ्गेनाङ्गानि बालस्य घर्षयन्तौ मुदान्वितौ।<br>चुम्बन्तौ च मुखं प्रेम्णा कलविंकौ शिशोः शुभम्॥ ७ | अण्डेसे तत्काल पैदा हुए लाल मुखवाले, सुन्दर अंगोंवाले एवं पंखरहित शिशुको घोंसलेमें ही छोड़कर वे दोनों उड़ गये और अत्यन्त परिश्रमसे चारा लाकर उस शिशुके चोंचमें डालते हुए दोनों पक्षी अत्यन्त आह्लादयुक्त होकर उस शिशुके अंगोंको अपने अंगोंसे रगड़ते हुए प्रेमपूर्वक उसके सुन्दर मुखको चूम रहे थे॥५-७॥ |
|---|---|
| वीक्ष्य प्रेमाद्भुतं तत्र बाले चटकयोस्तदा।<br>व्यासश्चिन्तातुरः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ ८<br>तिरश्चामपि यत्प्रेम पुत्रे समभिलक्ष्यते।<br>किं चित्रं यन्मनुष्याणां सेवाफलमभीप्सताम्॥ ९<br>किमेतौ चटकौ चास्य विवाहं सुखसाधनम्।<br>विरच्य सुखिनौ स्यातां दृष्ट्वा वध्वा मुखं शुभम्॥ १०<br>अथवा वार्धके प्राप्ते परिचर्यां करिष्यति।<br>पुत्रः परमधर्म्मिष्ठः पुण्यार्थं कलविंकयोः॥ ११<br>अर्जयित्वाथवा द्रव्यं पितरौ तर्पयिष्यति।<br>अथवा प्रेतकार्याणि करिष्यति यथाविधि॥ १२<br>अथवा किं गयाश्राद्धं गत्वा संवितरिष्यति।<br>नीलोत्सर्गं च विधिवत्प्रकरिष्यति बालकः॥ १३ | व्यासजी उस शिशुमें उन दोनों पक्षियोंका ऐसा अद्भुत प्रेम देखकर चिन्तामें पड़ गये और मन-ही-मन सोचने लगे। यदि अपने पुत्रके प्रति पक्षियोंमें ऐसा प्रेम दिखायी दे रहा है तो अपनी सेवाका फल चाहनेवाले मनुष्योंमें ऐसा प्रेम-व्यवहार होनेमें आश्चर्य ही क्या! क्या ये दोनों पक्षी इसका सुख-साधनस्वरूप विवाह करके स्वयं सुखी रहते हुए इसकी वधूका सुन्दर मुख देख पायेंगे? क्या इनकी वृद्धावस्थामें यह धर्मनिष्ठ पुत्र पुण्य-प्राप्तिके लिये इन दोनोंकी सेवा करेगा? धन आदि अर्जित करके क्या यह अपने माता-पिताको सन्तुष्ट रखेगा और इनकी मृत्युके उपरान्त क्या इनका विधि-पूर्वक प्रेतकर्म करेगा? अथवा क्या गयातीर्थ जाकर यह बालक उनके श्राद्ध आदि कर्म करके उनका उद्धार करेगा तथा उनके परलोकसाधनहेतु क्या यह विधिपूर्वक नीलोत्सर्ग (नील वृषभ छोड़नेका कर्म) करेगा?॥८-१३॥ |
| संसारेऽत्र समाख्यातं सुखानामुत्तमं सुखम्।<br>पुत्रगात्रपरिष्वंगो लालनञ्च विशेषतः॥ १४ | पुत्रके शरीरका आलिंगन और विशेषरूपसे उसका लालन-पालन इस संसारमें सभी सुखोंमें उत्तम सुख कहा गया है॥ १४॥ |
| अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।<br>पुत्रादन्यत्तरन्नास्ति परलोकस्य साधनम्॥ १५ | पुत्ररहित मनुष्यकी न तो सद्गति होती है और न तो उसे स्वर्गकी ही प्राप्ति होती है। अतः परलोकसाधनके लिये पुत्रसे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है॥ १५॥ |
| मन्वादिभिश्च मुनिभिर्धर्मशास्त्रेषु भाषितम्।<br>पुत्रवान्स्वर्गमाप्नोति नापुत्रस्तु कथञ्चन॥ १६ | मनु आदि ऋषियोंने भी धर्मशास्त्रोंमें कहा है कि पुत्रवान् मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है और पुत्रहीन व्यक्तिको स्वर्ग-प्राप्ति कभी भी नहीं होती है॥ १६॥ |
| दृश्यतेऽत्र समक्षं तन्नानुमानेन साध्यते।<br>पुत्रवान्मुच्यते पापादाप्तवाक्यं च शाश्वतम्॥ १७ | इस बातमें अनुमानकी कोई आवश्यकता ही नहीं है अपितु यह प्रत्यक्षरूपमें भी देखा जाता है; साथ ही यह वेद, स्मृति आदिका भी सनातन वचन है कि पुत्रवान् मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १७॥ |
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आतुरे मृत्युकालेऽपि भूमिशय्यागतो नरः।<br>करोति मनसा चिन्तां दुःखितः पुत्रवर्जितः॥ १८<br>धनं मे विपुलं गेहे पात्राणि विविधानि च।<br>मन्दिरं सुन्दरं चैतत्कोऽस्य स्वामी भविष्यति॥ १९ | रोगावस्था में तथा मरणकालमें भूमि-शय्यापर पड़ा हुआ सन्तानहीन प्राणी दुःखित होकर अपने मनमें विचार करता है कि मेरे घरमें पर्याप्त धन है, अनेक प्रकारके पात्र हैं तथा मेरा यह भवन भी अत्यन्त सुन्दर है; किंतु अब इन सबका स्वामी कौन होगा ? ॥ १८-१९ ॥ |
| मृत्युकाले मनस्तस्य दुःखेन भ्रमते यतः।<br>अतोऽस्य दुर्गतिर्नूनं भ्रान्तचित्तस्य सर्वथा॥ २० | चूँकि मृत्युकालमें उस प्राणीका मन अति दुःखी होकर भ्रमित होता रहता है, इसलिये उस भ्रान्त मनवाले प्राणीकी दुर्गति अवश्य ही होती है॥ २०॥ |
| एवं बहुविधां चिन्तां कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>निःश्वस्य बहुधा चोष्णं विमनाः सम्बभूव ह॥ २१ | इस प्रकार अनेकानेक चिन्तन करके और बार-बार लम्बी तथा गर्म साँसें लेकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीका मन अत्यन्त खिन्न हो गया॥ २१॥ |
| विचार्य मनसात्यर्थं कृत्वा मनसि निश्चयम्।<br>जगाम च तपस्तप्तुं मेरुपर्वतसन्निधौ॥ २२ | इसके बाद मनमें बहुत सोच-विचार करके अन्ततः दृढ़ निश्चय करके वे तपश्चर्याके लिये मेरुपर्वतपर चले गये॥ २२॥ |
| मनसा चिन्तयामास कं देवं समुपास्महे।<br>वरप्रदाननिपुणं वाञ्छितार्थप्रदं तथा॥ २३<br>विष्णुं रुद्रं सुरेन्द्रं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>गणेशं कार्तिकेयं च पावकं वरुणं तथा॥ २४ | उन्होंने मनमें विचार किया कि मैं विष्णु, रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि एवं वरुण—इन देवताओंमें किस देवताकी आराधना करूँ, जो वरप्रदान करनेमें उदार तथा अभीष्ट फलोंको देनेवाला हो॥ २३-२४॥ |
| एवं चिन्तयतस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः।<br>यदृच्छया समायातो वीणापाणिः समाहितः॥ २५ | इस प्रकार व्यासजी विचार कर ही रहे थे कि उसी समय संयोगवश मुनिश्रेष्ठ नारदजी हाथोंमें वीणा धारण किये हुए वहाँ आ गये॥ २५॥ |
| तं दृष्ट्वा परमप्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>कृत्वार्घ्यमासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं मुनिम्॥ २६ | उन्हें देखकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्घ्य तथा आसन प्रदान करके उन मुनिसे कुशल-क्षेम पूछा॥ २६॥ |
| श्रुत्वाथ कुशलप्रश्नं पप्रच्छ मुनिसत्तमः।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं द्वैपायन वदस्व मे॥ २७ | कुशल-प्रश्न सुन लेनेके पश्चात् मुनिवर नारदजीने पूछा—हे द्वैपायन! आप किस कारणसे चिन्ताग्रस्त हैं? मुझे बतायें॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न सुखं मानसे यतः।<br>तदर्थं दुःखितश्चाहं चिन्तयामि पुनः पुनः॥ २८ | व्यासजी बोले—सन्तानहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती और कभी भी उसके मनमें सुखानुभूति नहीं होती है। इसी बातको लेकर मैं अत्यन्त दुःखित हूँ और बार-बार यही सोचता रहता हूँ॥ २८॥ |
| तपसा तोषयाम्यद्य कं देवं वाञ्छितार्थदम्।<br>इति चिन्तातुरोऽस्म्यद्य त्वामहं शरणं गतः॥ २९ | मैं अभिलषित फल देनेवाले किस देवताको अपनी तपःसाधनासे प्रसन्न करूँ, इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं [अब इसके समाधानहेतु] आपकी शरणमें हूँ॥ २९॥ |
| ८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| सर्वज्ञोऽसि महर्षे त्वं कथयाशु कृपानिधे।<br>कं देवं शरणं यामि यो मे पुत्रं प्रदास्यति॥ ३० | हे महर्षे! आप सब कुछ जाननेवाले हैं। हे कृपासिन्धु! आप मुझे शीघ्र ही बतायें कि मैं किस देवताकी शरणमें जाऊँ, जो प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान कर दे॥ ३०॥ | | सूत उवाच<br>इति व्यासेन पृष्टस्तु नारदो वेदविन्मुनिः।<br>उवाच परया प्रीत्या कृष्णं प्रति महामनाः॥ ३१ | **सूतजी बोले—**व्यासजीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदवेत्ता तथा महामना महर्षि नारद अत्यन्त प्रेमपूर्वक कृष्णद्वैपायनसे कहने लगे॥ ३१॥ | | नारद उवाच<br>पाराशर्य महाभाग यत्त्वं पृच्छसि मामिह।<br>तमेवार्थं पुरा पृष्टः पित्रा मे मधुसूदनः॥ ३२ | **नारदजी बोले—**हे पराशरतपनय! हे महाभाग! आपके द्वारा जो प्रश्न यहाँ मुझसे पूछा गया है, वैसा ही प्रश्न पूर्वकालमें मेरे पिता ब्रह्माजीने मधुसूदन भगवान् विष्णुसे किया था॥ ३२॥ | | ध्यानस्थं च हरिं दृष्ट्वा पिता मे विस्मयं गतः।<br>पर्यपृच्छत देवेशं श्रीनाथं जगतः पतिम्॥ ३३<br>कौस्तुभोद्भासितं दिव्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>पीताम्बरं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३४<br>कारणं सर्वलोकानां देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं तप्यमानं महत्त्पः॥ ३५ | मेरे पिता ब्रह्माजी कौस्तुभमणिकी प्रभासे दीप्तिमान्, शंख-चक्र-गदा और पद्म धारण करनेवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षःस्थलवाले, सभी लोकोंके कारणस्वरूप, देवाधिदेव, जगद्गुरु, जगदीश्वर, वासुदेव, देवेश, जगत्पति, श्रीनाथ विष्णुको ध्यानमें अवस्थित होकर कठोर तप करते हुए देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा॥ ३३—३५॥ | | ब्रह्मोवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भूतभव्यभवत्प्रभो।<br>तपश्चरसि कस्मात्त्वं किं ध्यायसि जनार्दन॥ ३६ | **ब्रह्माजी बोले—**हे देवाधिदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भूत-भविष्य-वर्तमानके स्वामी ! आप किसलिये यह कठोर तपस्या कर रहे हैं ? हे जनार्दन ! आप किसके ध्यानमें लीन हैं ?॥ ३६॥ | | विस्मयोऽयं ममात्यर्थं त्वं सर्वजगतां प्रभुः।<br>ध्यानयुक्तोऽसि देवेश किं च चित्रमतः परम्॥ ३७ | हे देवेश ! [यह देखकर] मैं परम विस्मयमें पड़ गया हूँ कि समस्त विश्वका स्वामी होते हुए भी आप ऐसा ध्यान कर रहे हैं; भला इससे बढ़कर अन्य कौन-सी विचित्र बात होगी !॥ ३७॥ | | त्वन्नाभिकमलाज्जातः कर्ताहमखिलस्य ह।<br>त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्त्यत्र तं देवं ब्रूहि मापते॥ ३८ | आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत होकर मैं सम्पूर्ण लोकोंके कर्ताके रूपमें अधिष्ठित हूँ। हे लक्ष्मीपते ! आपसे भी श्रेष्ठतर कौन देवता है ? उस देवताको मुझे बताइये॥ ३८॥ | | जानाम्यहं जगन्नाथ त्वमादिः सर्वकारणम्।<br>कर्ता पालयिता हर्ता समर्थः सर्वकार्यकृत्॥ ३९ | हे जगन्नाथ ! मैं तो यही जानता हूँ कि आप ही आदिस্বরূপ, सबके कारण, निर्माता, पालनकर्ता, संहारक तथा सभी कार्योंको सम्पादित करनेवाले हैं॥ ३९॥ | | इच्छया ते महाराज सृजाम्यहमिदं जगत्।<br>हरः संहरते काले सोऽपि ते वचने सदा॥ ४० | हे महाराज ! आपकी इच्छासे ही मैं इस जगत्के रचनाकार्यमें प्रवृत्त होता हूँ और सदा आपके ही आदेशसे शंकरजी प्रलयावस्थामें जगत्का संहार करते हैं॥ ४०॥ |
| अ० ४ ] | प्रथम स्कन्ध | ८३ | | :--- | :--- |
| सूर्यो भ्रमति चाकाशे वायुर्वाति शुभाशुभः।<br>अग्निस्तपति पर्जन्यो वर्षतीश त्वदाज्ञया॥ ४१ | हे ईश! आपकी आज्ञासे ही सूर्य आकाशमें [नियमित रूपसे] भ्रमण करता है, शुभ तथा अशुभ हवा चलती है, अग्नि ताप धारण करती है और मेघ वृष्टि करता है॥ ४१॥ | | त्वं तु ध्यायसि कं देवं संशयोऽयं महान्मम।<br>त्वत्तः परं न पश्यामि देवं वै भुवनत्रये॥ ४२ | आप किस देवताका ध्यान कर रहे हैं? यह मेरी महती शंका है। मैं तो तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ॥ ४२॥ | | कृपां कृत्वा वदस्वाद्य भक्तोऽस्मि तव सुव्रत।<br>महतां नैव गोप्यं हि प्रायः किञ्चिदिति स्मृतिः॥ ४३ | हे सुव्रत! मैं आपका भक्त हूँ, अतः कृपा करके [अपनी तपस्याका रहस्य] बताइये; क्योंकि यह सर्वविदित है कि महान् लोग अपने भक्तोंसे कुछ भी गोपनीय नहीं रखते हैं॥ ४३॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिराह प्रजापतिम्।<br>शृणुष्वैकमना ब्रह्मंस्त्वां ब्रवीमि मनोगतम्॥ ४४ | ब्रह्माजीका वचन सुनकर भगवान् विष्णु उनसे बोले—हे ब्रह्मन्! आपको अपने मनकी बात बताता हूँ, आप उसे एकाग्रचित्त होकर सुनें॥ ४४॥ | | यद्यपि त्वां शिवं मां च स्थितिसृष्ट्यन्तकारणम्।<br>ते जानन्ति जनाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः॥ ४५<br><br>स्रष्टा त्वं पालकश्चाहं हरः संहारकारकः।<br>कृताः शक्त्येति संतर्कः क्रियते वेदपारगैः॥ ४६ | यद्यपि सभी देव, दानव और मानव यही जानते हैं कि आप जगत्की रचना, मैं जगत्के पालन और शिवजी जगत्के संहारके परम कारण हैं तथापि वेद-तत्त्वज्ञ विद्वान् यह तर्कना करते हैं कि किसी शक्तिके द्वारा ही आप सृष्टिके कर्ता हैं, मैं भर्ता हूँ और शंकरजी हर्ता हैं॥ ४५-४६॥ | | जगत्संजनने शक्तिस्त्वयि तिष्ठति राजसी।<br>सात्त्विकी मयि रुद्रे च तामसी परिकीर्तिता॥ ४७ | जगत्की रचनाके लिये आपमें राजसी शक्ति विद्यमान है, मुझमें सात्त्विकी शक्ति स्थित है तथा शिवजीमें तामसी शक्ति बतायी गयी है॥ ४७॥ | | तया विरहितस्त्वं न तत्कर्मकरणे प्रभुः।<br>नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः॥ ४८ | उस शक्तिके न रहनेपर आप न तो सृष्टि-रचना कर सकते हैं, न मैं पालन-कार्य करनेमें समर्थ हो सकता हूँ और न तो शंकर संहार कर सकते हैं॥ ४८॥ | | तदधीना वयं सर्वे वर्तामः सततं विभो।<br>प्रत्यक्षे च परोक्षे च दृष्टान्तं शृणु सुव्रत॥ ४९ | हे विभो! हम सभी निरन्तर उसी शक्तिके अधीन रहते हैं। हे सुव्रत! अब प्रत्यक्ष तथा परोक्षसे सम्बन्धित दृष्टान्त भी आप सुनिये॥ ४९॥ | | शेषे स्वपिमि पर्यङ्के परतन्त्रो न संशयः।<br>तदधीनः सदोत्तिष्ठे काले कालवशं गतः॥ ५० | इसमें कोई संशय नहीं कि मैं परतन्त्र होकर शेष-शय्यापर शयन करता हूँ और उसी शक्तिके अधीन होकर समयपर कालका वशवर्ती होकर मैं शयनसे उठता हूँ॥ ५०॥ | | तपश्चरामि सततं तदधीनोऽस्म्यहं सदा।<br>कदाचित्सह लक्ष्म्या च विहरामि यथासुखम्॥ ५१<br><br>कदाचिद्दानवैः सार्धं संग्रामं प्रकरोम्यहम्।<br>दारुणं देहदमनं सर्वलोकभयङ्करम्॥ ५२ | उसी शक्तिका अवलम्बन प्राप्तकर मैं सदा तपश्चरण करता रहता हूँ। मैं कभी लक्ष्मीके साथ सुखपूर्वक विहार करता हूँ और कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण, शरीरको चूर्ण कर देनेवाला तथा लोगोंको भयभीत कर देनेवाला युद्ध भी करता हूँ॥ ५१-५२॥ |
८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तस्मिन्नेकार्णवे पुरा।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुयुद्धं मया कृतम्॥ ५३ | हे धर्मज्ञ! आप यह तो प्रत्यक्ष जानते हैं कि पूर्व समयमें मेरे द्वारा उस महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक भीषण बाहुयुद्ध किया गया था॥ ५३॥ |
| तौ कर्णमलजौ दुष्टौ दानवौ मदगर्वितौ।<br>देव देव्याः प्रसादेन निहतौ मधुकैटभौ॥ ५४<br><br>तदा त्वया न किं ज्ञातं कारणं तु परात्परम्।<br>शक्तिरूपं महाभाग किं पृच्छसि पुनः पुनः॥ ५५ | हे देव! कानकी मैलसे उत्पन्न अत्यन्त दुष्ट, मदोन्मत्त तथा अहंकारी मधु-कैटभ नामक दोनों दानवोंका मैंने देवीकी कृपासे ही संहार किया था। हे महाभाग! क्या आप उस समय परात्पर कारणस्वरूपा महाशक्तिको नहीं जान पाये थे? अतः बार-बार क्यों पूछ रहे हैं?॥ ५४-५५॥ |
| यदिच्छः पुरुषो भूत्वा विचरामि महार्णवे।<br>कच्छपः कोलसिंहश्च वामनश्च युगे युगे॥ ५६ | उसी शक्तिकी इच्छासे मैं परमपुरुषके रूपमें महासागरमें विचरण करता हूँ और विभिन्न युगोंमें कच्छप, वराह, नृसिंह तथा वामनके रूपमें अवतरित होता रहता हूँ॥ ५६॥ |
| न कस्यापि प्रियो लोके तिर्यग्योनिषु सम्भवः।<br>नाभवं स्वेच्छया वामवराहादिषु योनिषु॥ ५७ | तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होना किसीके लिये भी प्रिय नहीं होता। मैं अपनी इच्छासे वामन, वराह आदि योनियोंमें उत्पन्न नहीं होता हूँ। [अपितु इसमें उसी शक्तिकी प्रेरणा ही परम कारण है]॥ ५७॥ |
| विहाय लक्ष्म्या सह संविहारं<br>को याति मत्स्यादिषु हीनयोनिषु।<br>शय्यां च मुक्त्वा गरुडासनस्थः<br>करोमि युद्धं विपुलं स्वतन्त्रः॥ ५८ | भला ऐसा कौन होगा, जो लक्ष्मीके साथ सुखदायक विहारका त्याग करके मत्स्यादि नीच योनियोंमें जन्म लेगा? यदि मैं स्वतन्त्र होता तो [सुखदायिनी] शय्याको छोड़कर गरुडरूपी आसनपर बैठकर महाभयंकर युद्ध क्यों करता!॥ ५८॥ |
| पुरा पुरस्तेऽज शिरो मदीयं<br>गतं धनुर्ज्यास्खलनात्क्व चापि।<br>त्वया तदा वाजिशिरो गृहीत्वा<br>संयोजितं शिल्पिवरेण भूयः॥ ५९ | हे अज! प्राचीन कालमें एक बार आपके समक्ष ही धनुषकी प्रत्यंचा टूट जानेके कारण मेरा सिर छिन्न हो गया था। तब शिल्पकारोंमें श्रेष्ठ आपने फिरसे मेरे धड़पर घोड़ेका सिर जोड़ दिया था॥ ५९॥ |
| हयाननोऽहं परिकीर्तितश्च<br>प्रत्यक्षमेतत्तव लोककर्तः।<br>विडम्बनेयं किल लोकमध्ये<br>कथं भवेदात्मपरो यदि स्याम्॥ ६० | हे लोकनिर्माता! उसी समयसे मैं 'हयग्रीव' नामसे लोकप्रसिद्ध हुआ, यह सब आपके सामने घटित हुआ था। यदि मैं स्वाधीन होता तो संसारमें यह विडम्बना कैसे होती?॥ ६०॥ |
| तस्मान्नाहं स्वतन्त्रोऽस्मि शक्त्यधीनोऽस्मि सर्वथा।<br>तामेव शक्तिं सततं ध्यायामि च निरन्तरम्॥ ६१<br><br>नातः परतरं किञ्चिज्जानामि कमलोद्भव। | अतएव मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ, अपितु सर्वथा उसी शक्तिके अधीन हूँ। मैं निरन्तर उसी शक्तिका ध्यान करता रहता हूँ। हे कमलोद्भव! मैं इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं जानता॥ ६१ १/२॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्तं विष्णुना तेन पद्मयोनेस्तु सन्निधौ॥ ६२ | नारदजी बोले—हे व्यासजी! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा था। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे पिता |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तेन चाप्यहमुक्तोऽस्मि तथैव मुनिपुङ्गव।<br>तस्मात्त्वमपि कल्याण पुरुषार्थाप्तिहेतवे॥ ६३<br><br>असंशयं हृदम्भोजे भज देवीपदाम्बुजम्।<br>सर्वं दास्यति सा देवी यद्यदिष्टं भवेत्तव॥ ६४ | ब्रह्माजीने वे सब बातें मुझसे कही थीं। अतः आप भी कल्याणकारी पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे सर्वथा संशयरहित होकर अपने हृदयकमलमें देवी भगवतीके चरणारविन्दका ध्यान कीजिये। वे देवी आपके समस्त अभिलषित फलोंको अवश्य प्रदान करेंगी॥ ६२-६४॥ |
| सूत उवाच<br>नारदेनैवमुक्तस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>देवीपादाब्जनिष्ठातस्तपसे प्रययौ गिरौ॥ ६५ | सूतजी बोले—नारदजीके ऐसा कहनेपर सत्यवतीपुत्र व्यासजी देवीके चरणारविन्दमें अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए तपश्चर्याहेतु पर्वतपर चले गये॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे देवीसर्वोत्तमतेकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>सूतास्माकं मनः कामं मग्नं संशयसागरे।<br>यथोक्तं महदाश्चर्यं जगद्विस्मयकारकम्॥ १<br><br>यन्मूर्धा माधवस्यापि गतो देहात्पुनः परम्।<br>हयग्रीवस्ततो जातः सर्वकर्ता जनार्दनः॥ २ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हमारा चित्त सन्देहरूपी सागरमें पूर्णतः डूबता जा रहा है; क्योंकि आपने महान् आश्चर्यजनक तथा संसारको विस्मित कर देनेवाली यह बात कह दी कि विष्णुके शरीरसे उनका सिर अलग हो गया था और वे सर्वपालक जनार्दन पुनः हयग्रीव हो गये थे॥ १-२॥ |
| वेदोऽपि स्तौति यं देवं देवाः सर्वे यदाश्रयाः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः सर्वकारणकारणः॥ ३<br><br>तस्यापि वदनं छिन्नं दैवयोगात्कथं तदा।<br>तत्सर्वं कथयाशु त्वं विस्तरेण महामते॥ ४ | वेद भी जिन भगवान् विष्णुका स्तवन करते हैं, समस्त देवता जिनका आश्रय ग्रहण करते हैं, जो आदिदेव हैं, जगत्के स्वामी हैं और सभी कारणोंके भी कारण हैं; दैवयोगसे उनका भी मस्तक कैसे कट गया? हे महामते! वह सब आप हमसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये॥ ३-४॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सावधानाः समन्ततः।<br>चरितं देवदेवस्य विष्णोः परमतेजसः॥ ५ | सूतजी बोले—हे मुनियो! आप सभी लोग एकाग्रचित्त होकर परम तेजस्वी देवाधिदेव भगवान् विष्णुका चरित्र सुनिये॥ ५॥ |
| कदाचिद्दारुणं युद्धं कृत्वा देवः सनातनः।<br>दशवर्षसहस्राणि परिश्रान्तो जनार्दनः॥ ६ | किसी समय वे सनातन देव विष्णु दस हजार वर्षोंतक भीषण युद्ध करके अत्यन्त थक गये थे॥ ६॥ |
| समे देशे शुभे स्थाने कृत्वा पद्मासनं विभुः।<br>अवलम्ब्य धनुः सज्यं कण्ठदेशे धरास्थितम्॥ ७<br><br>दत्त्वा भारं धनुष्कोट्यां निद्रामप रमापतिः।<br>श्रान्तत्वादैवयोगाच्च जातस्तत्रातिनिद्रितः॥ ८ | तदनन्तर एक समतल तथा शुभ स्थानपर पद्मासन लगाकर पृथ्वीपर स्थित प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुषपर कण्ठप्रदेश (गर्दन) टिकाये हुए उस धनुषकी नोंकपर भार देकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु सो गये और थकावटके कारण दैवयोगसे उन्हें गहरी नींद आ गयी॥ ७-८॥ |