भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 74
अ० ५ ]माहात्म्य६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।<br>न्यूनं सम्पूर्णतां याति तस्माद्विष्णुञ्च कीर्तयेत्॥ ६०जिनके स्मरण तथा नामकीर्तनसे तप, यज्ञ, क्रिया आदिमें न्यूनता समाप्त हो जाती है, उन विष्णुभगवान्‌का नाम-कीर्तन करना चाहिये॥ ६०॥
देव्याः सप्तशतीमन्त्रैः समाप्तौ होममाचरेत्।<br>देवीमाहात्म्यमूलेन नवार्णमनुनाथवा॥ ६१<br><br>गायत्र्या त्वथवा होमः पायसेन ससर्पिषा।<br>यतो भागवतं त्वेतद् गायत्रीमयमीरितम्॥ ६२कथासमाप्तिके दिन दुर्गासप्तशतीके मन्त्रोंसे अथवा देवीमाहात्म्यके मूलपाठसे या नवार्ण* मन्त्रसे होम करना चाहिये अथवा घृतसहित पायसद्वारा गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके हवन करे; क्योंकि यह श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण गायत्रीमय कहा गया है॥ ६१-६२॥
वाचकं तोषयेत्सम्यग्वस्त्रभूषधनादिभिः।<br>प्रसन्ने वाचके सर्वाः प्रसन्नास्तस्य देवताः॥ ६३कथावाचकको वस्त्र, भूषण, धन आदिके द्वारा सन्तुष्ट करे; क्योंकि कथावाचकके प्रसन्न होनेपर सभी देवता उसपर प्रसन्न हो जाते हैं॥ ६३॥
ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्।<br>पृथिव्यां देवरूपास्ते तुष्टेष्वेष्भीप्सितं फलम्॥ ६४श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये और नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट करे; क्योंकि वे विप्र पृथ्वीपर देवताके स्वरूप हैं। उनके सन्तुष्ट होनेपर वांछित फल प्राप्त होता है॥ ६४॥
सुवासिनीः कुमारीश्च देवीभक्त्या च भोजयेत्।<br>ताभ्योऽपि दक्षिणां दत्त्वा प्रार्थयेत्सिद्धिमात्मनः॥ ६५सुहागिन स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंको साक्षात् देवी समझकर उन्हें भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा देकर अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करे॥ ६५॥
दद्याद्दानानि चान्यानि सुवर्णं गाः पयस्विनीः।<br>हयानिभान्मेदिनीञ्च तस्य स्यादक्षयं फलम्॥ ६६सुवर्ण, दूध देनेवाली गौ, हाथी, घोड़े और भूमिको दान करना चाहिये; क्योंकि उसका अक्षय फल होता है॥ ६६॥
देवीभागवतं चैतल्लिखितं शोभनाक्षरम्।<br>हेमसिंहासने स्थाप्य पट्टवस्त्रेण वेष्टितम्॥ ६७<br><br>अष्टम्यां वा नवम्याञ्च वाचकायार्चिताय च।<br>दद्यात्स भोगान्भुक्तेह दुर्लभं मोक्षमाप्नुयात्॥ ६८सुन्दर अक्षरोंमें लिखी देवीभागवतकी पुस्तकको रेशमी-वस्त्रमें लपेटकर उसे सुवर्णनिर्मित सिंहासनपर रखकर अष्टमी या नवमी तिथिको विधिपूर्वक कथावाचकको दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह इस संसारमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है॥ ६७-६८॥
दरिद्रो दुर्बलो बालस्तरुणो जरठोऽपि वा।<br>पुराणवेत्ता वन्द्यः स्यात्पूज्यो मान्यश्च सर्वदा॥ ६९पुराणको जाननेवाला वक्ता चाहे दरिद्र हो, दुर्बल हो, बालक हो, युवक हो अथवा वृद्ध हो, वह सर्वदा वन्दनीय पूज्य एवं मान्य होता है॥ ६९॥
सन्ति लोकस्य बहवो गुरवो गुणजन्मतः।<br>सर्वेषामपि तेषाञ्च पुराणज्ञः परो गुरुः॥ ७०यद्यपि संसारमें जन्म अथवा गुणके कारण अनेक गुरु हैं, परंतु पुराणका ज्ञाता उन सबमें श्रेष्ठ गुरु है॥ ७०॥
पौराणिको ब्राह्मणस्तु व्यासासनसमाश्रितः।<br>आसमाप्ते प्रसङ्गे तु नमस्कुर्यान्न कस्यचित्॥ ७१व्यासके आसनपर बैठा हुआ पौराणिक ब्राह्मण जबतक कथा समाप्त न हो जाय, तबतक किसीको भी प्रणाम न करे॥ ७१॥

* ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 A