भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 889 में से

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पृष्ठ 73
६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५

| वेदगोगुरुविप्राणां स्त्रीराज्ञां महतां तथा।<br>देवानां देवभक्तानां न निन्दां शृणुयादपि॥ ४९ | श्रोताको चाहिये कि वह वेद, गौ, गुरु, ब्राह्मण, स्त्री, राजा, महापुरुष, देवताओं और देवभक्तोंकी निन्दा कभी न सुने॥ ४९॥ | | विनयं चार्जवं शौचं दयां च मितभाषणम्।<br>उदारं मानसञ्चैव कुर्याद्यस्तु कथाव्रती॥ ५० | जो कथाव्रती हो उसे सर्वदा विनयशील, सरलचित्त, पवित्र, दयालु, कम बोलनेवाला तथा उदार मनवाला होना चाहिये॥ ५०॥ | | श्वित्री कुष्ठी क्षयी रुग्णो भाग्यहीनश्च पापकृत्।<br>दरिद्रश्चानपत्यश्च भक्त्येमां शृणुयात्कथाम्॥ ५१ | श्वेतकुष्ठी, कुष्ठी, क्षयरोगी, अभागा, पापी, दरिद्र तथा सन्तानहीन मनुष्य इस कथाको भक्तिपूर्वक सुने॥ ५१॥ | | वन्ध्या वा काकबन्ध्या वा दुर्भगा वा मृतार्भका।<br>पतद्गर्भाङ्गना या च ताभिः श्राव्या तथा कथा॥ ५२ | जो स्त्री वन्ध्या, काकबन्ध्या (जिस स्त्रीको एक बार सन्तान होकर बन्द हो जाय), अभागिन तथा मृतवत्सा हो और जिसका गर्भ गिर जाता हो, ऐसी सभी स्त्रियोंको इस देवीभागवतकथाका श्रवण करना चाहिये॥ ५२॥ | | धर्मार्थकाममोक्षांश्च यो वाञ्छति विना श्रमम्।<br>भगवत्या भागवतं श्रोतव्यं तेन यत्नतः॥ ५३ | जो मनुष्य बिना परिश्रमके ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक इस देवीभागवतकी कथा अवश्य सुने॥ ५३॥ | | कथादिनानि चैतानि नवयज्ञैः समानि हि।<br>तेषु दत्तं हुतं जप्तमनन्तफलदं भवेत्॥ ५४ | इस नवाह्नकथाके नौ दिन नौ यज्ञोंके समान हैं। उनमें किया गया दान, हवन तथा जप अनन्त फल देनेवाला होता है॥ ५४॥ | | एवं व्रतं नवाहं तु कृत्योद्यापनमाचरेत्।<br>महाष्टमीव्रतं यद्वत्तथा कार्यं फलेप्सुभिः॥ ५५ | इस प्रकार नवाहव्रत करके उसका उद्यापन करना चाहिये। फलकी कामना करनेवाले पुरुषोंको महाष्टमीव्रतके उद्यापनकी भाँति नवाहव्रतका भी उद्यापन करना चाहिये॥ ५५॥ | | निष्कामाः श्रवणेनैव पूता मुक्तिं व्रजन्ति हि।<br>भोगमोक्षप्रदा नॄणां यतो भगवती परा॥ ५६ | निष्काम व्यक्ति कथाके श्रवणमात्रसे पवित्र होकर मुक्ति पा जाते हैं; क्योंकि परा भगवती मनुष्योंको भोग और मोक्ष सब कुछ देनेवाली हैं॥ ५६॥ | | पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्या तु नित्यशः।<br>वक्त्रा दत्तं प्रसादं तु गृह्णीयाद्भक्तिपूर्वकम्॥ ५७ | पुस्तक और कथावाचक—दोनोंकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये और वक्ताद्वारा दिया हुआ प्रसाद भक्तिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये॥ ५७॥ | | कुमारीः पूजयेन्नित्यं भोजयेत्प्रार्थयेच्च यः।<br>सुवासिनीश्च विप्रांश्च तस्य सिद्धिर्न संशयः॥ ५८ | नवाह-यज्ञमें जो श्रोता नित्य कुमारी कन्याओं, सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराता तथा उनसे प्रार्थना करता है, उसकी कार्यसिद्धि अवश्य हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८॥ | | गायत्र्या नाम साहस्रं समाप्तावथ वा पठेत्।<br>विष्णोर्नामसहस्रञ्च सर्वदोषोपशान्तये॥ ५९ | सभी त्रुटियोंकी शान्तिके निमित्त कथासमाप्तिके दिन गायत्रीसहस्रनाम अथवा विष्णुसहस्रनामका पाठ करना चाहिये॥ ५९॥ |

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