देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 72, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 72
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रोतव्यं सावधानेन चतुर्वर्गफलाप्तये।<br>गृहपुत्रकलत्राप्तधनचिन्तामपास्य च॥ ३७ | तब सावधान मनसे चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-फलको प्राप्त करनेके लिये पुत्र-कलत्र, धन-धान्य तथा गृहकी चिन्ता छोड़कर कथा सुने॥ ३७॥ |
| सूर्योदयं समारभ्य किञ्चित्सूर्येऽवशेषिते।<br>मुहूर्तमात्रं विश्रम्य मध्याह्ने वाचयेत्सुधीः॥ ३८ | विद्वान् वक्ताको चाहिये कि वह सूर्योदयसे आरम्भ करके पुनः दोपहरमें दो घड़ी विश्राम करके सूर्यास्तके कुछ समय पहलेतक कथा-वाचन करे॥ ३८॥ |
| मलमूत्रजयायैषां लघु भोजनमिष्यते।<br>हविष्योन्नं वरं भोज्यं सकृदेव कथार्थिना॥ ३९<br>अथवा स्यात्फलाहारी पयोभुग्वा घृताशनः।<br>यथा स्यान्न कथाविघ्नस्तथा कार्यं विचक्षणैः॥ ४० | मल-मूत्रके वेगको रोकनेके लिये स्वल्पाहार उत्तम होता है। कथार्थीको दिन-रातमें केवल एक बार हविष्यान्नका भोजन करना ही ठीक है; अथवा फलाहार करे या केवल दूध-घीके आहारपर ही रहे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऐसा आहार ग्रहण करे, जिससे कथामें किसी प्रकारकी बाधा न हो॥ ३९-४०॥ |
| कथाश्रवणनिष्ठानां वक्ष्यामि नियमं द्विजाः।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां मध्ये ये भेददर्शिनः॥ ४१<br>देवीभक्तिविहीना ये पाखण्डा हिंसकाः खलाः।<br>विप्रद्रुहो नास्तिका ये न ते योग्याः कथाश्रवे॥ ४२ | हे द्विजगण! अब मैं कथाश्रवणमें निष्ठा रखनेवालोंके नियम बताता हूँ। जो लोग ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें भेददृष्टि रखते हैं, देवीकी भक्तिसे रहित हैं, जो पाखण्डी, हिंसक तथा दुष्ट हैं और जो ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले तथा नास्तिक हैं, वे कथाश्रवणके योग्य नहीं हैं॥ ४१-४२॥ |
| ब्रह्मस्वहरणे लुब्धाः परदारधनेषु च।<br>देवस्वहरणे तेषां नाधिकारः कथाश्रवे॥ ४३ | जो परस्त्री, पराया धन, ब्राह्मणधन तथा देव-सम्पत्तिके हरणमें लुब्ध रहते हैं, उनका कथाश्रवणमें अधिकार नहीं है॥ ४३॥ |
| ब्रह्मचारी च भूशायी सत्यवक्ता जितेन्द्रियः।<br>कथासमाप्तौ भुञ्जीत पत्रावल्यां यतात्मवान्॥ ४४ | श्रोताको चाहिये कि वह ब्रह्मचर्यका पालन करे, पृथ्वीपर सोये, सत्य बोले, जितेन्द्रिय रहे तथा कथाकी समाप्तिपर संयमपूर्वक पत्तलपर भोजन करे॥ ४४॥ |
| वृन्ताकञ्च कलिन्दञ्च तैलञ्च द्विदलं मधु।<br>दग्धमन्नं पर्युषितं भावदुष्टं त्यजेद् व्रती॥ ४५ | व्रतीको बैगन, बहेड़ा (कलिन्द), तेल, दाल, मधु और जला हुआ, बासी तथा भावदूषित अन्नका त्याग कर देना चाहिये॥ ४५॥ |
| आमिषञ्च मसूरान्नमुदक्यादृष्टमेव च।<br>रसोंनं मूलकं हिङ्गुं पलाण्डुं गृञ्जनं तथा॥ ४६<br>कूष्माण्डं नलिकाशाकं न भुञ्जीत कथाव्रती।<br>कामं क्रोधं मदं लोभं दम्भं मानञ्च वर्जयेत्॥ ४७ | कथा सुननेवाला व्रती मांस, मसूर, रजस्वला स्त्रीका देखा हुआ खाद्यान्न, लहसुन, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कोहड़ा और करमीका साग न खाये। काम, क्रोध, मद, लोभ, पाखण्ड और अहंकारको छोड़ दे॥ ४६-४७॥ |
| विप्रध्रुक्पतितव्रात्यश्वपाकयवनान्त्यजैः ।<br>उदक्यया वेदबाह्यैर्न वदेद्यः कथाव्रती॥ ४८ | विप्रद्रोही, पतित, संस्कारहीन, चाण्डाल, यवन, अन्त्यज, रजस्वला स्त्री और वेदविहीन मनुष्योंसे कथाव्रतीको वार्तालाप नहीं करना चाहिये॥ ४८॥ |