भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 889 में से

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पृष्ठ 71

| ६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अरुणोदयवेलायां स्नायाच्छौचं विधाय च।<br>सन्ध्यार्पणकार्यञ्च नित्यं संक्षेपतश्चरेत्॥ २५उस दिन शौचादिसे निवृत्त हो अरुणोदयवेलामें ही स्नान कर लेना चाहिये। सन्ध्या तथा तर्पण आदि नित्यकर्म संक्षेपमें ही करना चाहिये॥ २५॥
कथाश्रवणयोग्यत्वसिद्धये गाश्च दापयेत्।<br>समस्तविघ्नहर्तारमादौ गणपतिं यजेत्॥ २६<br><br>कलशांश्चापि संस्थाप्य पूजयेत्तत्र दिग्भवान्।<br>वटुकं क्षेत्रपालञ्च योगिनीर्मातृकास्तथा॥ २७<br><br>तुलसीञ्चापि सम्पूज्य ग्रहान्विष्णुञ्च शङ्करम्।<br>नवाक्षरेण मनुना पूजयेज्जगदम्बिकाम्॥ २८तत्पश्चात् कथाश्रवणका अधिकारी बननेके लिये गोदान करे और सब विघ्नोंको दूर करनेवाले श्रीगणेशजीका सर्वप्रथम पूजन करे। कलश-स्थापन करके वहाँ दस दिक्पालों, बटुक, क्षेत्रपाल, सभी योगिनियों और मातृकाओंका भी पूजन करे। तुलसी, नवग्रह, विष्णु तथा शिवजीका पूजन करके नवाक्षरमन्त्रसे जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २६—२८॥
सर्वोपचारैः सम्पूज्य श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>श्रीदेव्या वाङ्मयीं मूर्तिं यथावच्छोभनाक्षरम्॥ २९<br><br>कथाविघ्नोपशान्त्यर्थं वृणुयात्पञ्च वाडवान्।<br>जाप्यो नवार्णमन्त्रस्तैः पाठ्यः सप्तशतीस्तवः॥ ३०तत्पश्चात् सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई भगवतीकी वाङ्मयी मूर्तिस्वरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तककी सभी उपचारोंसे विधिवत् पूजा करके कथाकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये पाँच विद्वान् ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये। उनसे निरन्तर नवार्णमन्त्रका जप एवं दुर्गासप्तशतीका पाठ कराना चाहिये॥ २९-३०॥
प्रदक्षिणनमस्कारान्कृत्वान्ते स्तुतिमाचरेत्।<br>कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥ ३१<br><br>संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।<br>ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥ ३२<br><br>मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।<br>इति सम्प्रार्थ्य शृणुयात्कथां नियतमानसः॥ ३३अन्तमें प्रदक्षिणा तथा नमस्कारके बाद इस प्रकार स्तुति करे—‘हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है। इस प्रकार प्रार्थना करके स्वस्थचित्त होकर कथा सुने॥ ३१—३३॥
वक्तारञ्चापि सम्पूज्य व्यासबुद्ध्या यतात्मवान्।<br>माल्यालङ्कारवस्त्राद्यैः सम्भूष्य प्रार्थयेच्च तम्॥ ३४<br><br>सर्वशास्त्रेतिहासज्ञ व्यासरूप नमोऽस्तु ते।<br>कथाचन्द्रोदयेनान्तस्तमःस्तोमं निराकुरु॥ ३५उस समय संयतचित्त होकर वक्ताको साक्षात् व्यास समझकर विधिवत् उनकी पूजा करे और वस्त्राभूषण तथा माला आदि पहनाकर उनसे प्रार्थना करे—‘समस्त शास्त्र तथा पुराणेतिहासके ज्ञाता हे व्यासजी! आपको नमस्कार है। आप कथारूपी चन्द्रमाकी ज्योतिसे हमारे अन्तःकरणके अन्धकारसमूहको नष्ट कीजिये’॥ ३४-३५॥
तदग्रे तु नवाहान्तं कर्तव्या नियमास्तदा।<br>विप्रादीनुपवेश्यादौ सम्पूज्योपविशेत्स्वयम्॥ ३६इसके बाद नवाहके नियमोंका व्रत ले और ब्राह्मणोंका यथाशक्ति पूजन करके उन्हें पहले यथास्थान बैठा दे, तत्पश्चात् स्वयं भी अपने आसनपर बैठ जाय॥ ३६॥
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