देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 70, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 70
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नावकाशः कदाचित्स्यान्नवाहश्रवणेऽपि तैः।<br>आगन्तव्यं यथाकालं यज्ञे पुण्या क्षणस्थितिः॥ १४ | जिन लोगोंको पूरे नौ दिनतक कथा सुननेका अवकाश न मिल सके, वे जब भी समय मिले तभी आ जायें; क्योंकि यज्ञमें क्षणभर भी पहुँच जाना विशेष पुण्यदायक होता है॥ १४॥ |
| विनयेनैव कर्तव्यमेवमाकारणं नृणाम्।<br>आगतानाञ्च कर्तव्यं वासस्थानं यथोचितम्॥ १५ | बड़ी नम्रताके साथ मनुष्योंको निमन्त्रण देना चाहिये और आये हुए श्रोताओंके बैठनेका भी समुचित प्रबन्ध करना चाहिये॥ १५॥ |
| कथास्थानं प्रकर्तव्यं भूमौ मार्जनपूर्वकम्।<br>लेपनं गोमयेनाथ विशालायां मनोरमम्॥ १६<br><br>कार्यस्तु मण्डपो रम्यो रम्भास्तम्भोपशोभितः।<br>वितानमुपरिष्टात्तु पताकाध्वजराजितः॥ १७ | विस्तृत भूमिमें कथा-प्रवचनका सुन्दर स्थान बनाना चाहिये। उस स्थानकी सफाई कराकर गोबरसे लिपवा देना चाहिये। केलेके स्तम्भोंसे सुशोभित और ध्वज-पताकाओंसे अलंकृत एक सुरम्य मण्डपका निर्माण करना चाहिये और उसके ऊपर सुन्दर चाँदनी लगा देनी चाहिये॥ १६-१७॥ |
| वक्तुश्चैवासनं दिव्यं सुखास्तरणसंयुतम्।<br>रचितव्यं प्रयत्नेन प्राङ्मुखं वाप्युदङ्मुखम्॥ १८ | कथावाचकका आसन दिव्य तथा सुखकर आस्तरणसे युक्त होना चाहिये। उसे प्रयत्नपूर्वक पूर्वा-भिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखना चाहिये॥ १८॥ |
| यथोचितानि कुर्वीत श्रोतॄणामासनानि च।<br>नॄणां चैवाथ नारीणां कथाश्रवणहेतवे॥ १९ | कथाश्रवणके लिये आनेवाले पुरुष तथा स्त्री श्रोताओंके लिये भी यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसनोंकी व्यवस्था करनी चाहिये॥ १९॥ |
| वाग्मी दान्तश्च शास्त्रज्ञो देव्याराधनतत्परः।<br>दयालुर्निस्पृहो दक्षो धीरो वक्तोत्तमो मतः॥ २० | वक्तृत्वसम्पन्न, संयमी, शास्त्रज्ञ, देवीकी आराधनामें तत्पर, दयालु, लोभहीन, दक्ष तथा धैर्यशाली कथावाचक उत्तम माना गया है॥ २०॥ |
| ब्रह्मण्यो देवताभक्तः कथारसपरायणः।<br>उदारोऽलोलुपो नम्रः श्रोता हिंसाविवर्जितः॥ २१ | इसी प्रकार श्रोता भी ऐसा होना चाहिये जो ब्राह्मणसेवी, देवभक्त, कथा-रसका पान करनेवाला, उदार, लोभरहित, विनम्र और हिंसा आदिसे रहित हो॥ २१॥ |
| पाखण्डनिरतो लुब्धः स्त्रैणो धर्मध्वजस्तथा।<br>निष्ठुरः क्रोधनो वक्ता देवीयज्ञे न शस्यते॥ २२ | पाखण्डी, लोभी, स्त्रीस्वभाव, कामी, धर्मका दिखावामात्र करनेवाला, निष्ठुर तथा क्रोधी वक्ता देवीभागवतके नवाहयज्ञमें श्रेष्ठ नहीं माना जाता है॥ २२॥ |
| संशयच्छेदनायकः पण्डितश्च तथागुणः।<br>श्रोतृबोधकृदव्यग्रः कार्यो वक्तुः सहायकत्॥ २३ | श्रोताओंकी शंकाओंके निवारणहेतु कथावाचकके साथ एक ऐसा सहायक भी लगा देना चाहिये, जो पण्डित, गुणवान्, शान्त तथा श्रोताओंको समझानेमें कुशल हो॥ २३॥ |
| मुहूर्तदिवसादर्वाग्वक्तृश्रोत्रादिभिर्जनैः ।<br>कर्तव्यं क्षौरकर्मादि ततो नियमकल्पनम्॥ २४ | कथा प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही वक्ता एवं श्रोतागणोंको क्षौरकर्म करा लेना चाहिये। तत्पश्चात् अन्यान्य नियमोंका पालन करना चाहिये॥ २४॥ |