देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ३ ] माहात्म्य ४९
| एवं स्तुतः स भगवान् प्रादुरासीज्जगत्पतिः।<br>वृषारूढोऽम्बिकोपेतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥ ३८<br><br>रजताचलगसंकाशस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः ।<br>प्रणतं परितुष्टात्मा प्रोवाच मुनिसत्तमम्॥ ३९ | इस प्रकार मुनि वसिष्ठके द्वारा स्तुति किये जानेपर करोड़ों सूर्यसदृश प्रभासे युक्त एवं भगवती पार्वतीके साथ नन्दीपर आरूढ़ वे जगत्पति भगवान् शंकर प्रकट हो गये॥ ३८॥<br>चाँदीके पर्वतके समान प्रभाववाले, त्रिनेत्रधारी भगवान् चन्द्रशेखर शरणमें आये हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले॥ ३९॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>वरं वरय विप्रर्षे यत्ते मनसि वर्तते।<br>इत्युक्तस्तं प्रणम्येलापुंस्त्वमभ्यर्थयन्मुनिः॥ ४० | श्रीभगवान्ने कहा— हे विप्रर्षे! आपके मनमें जो भी इच्छा हो, वह वर माँगिये। उनके इस प्रकार कहनेपर गुरु वसिष्ठने प्रणाम करके इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिके लिये उनसे प्रार्थना की॥ ४०॥ |
| अथ प्रसन्नो भगवानुवाच मुनिसत्तमम्।<br>मासं पुमान् स भविता मासं नारी भविष्यति॥ ४१ | इसके बाद प्रसन्न होकर शंकरजीने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे कहा कि एक मासतक वह पुरुषरूपमें तथा एक मासतक नारीरूपमें रहेगी॥ ४१॥ |
| इति प्राप्य वरं शाम्भोर्महर्षिर्जगदम्बिकाम्।<br>वरदानोन्मुखीं देवीं प्रणनाम महेश्वरीम्॥ ४२ | इस प्रकार शिवजीसे वर प्राप्त करके महर्षि वसिष्ठने वर प्रदान करनेके लिये सदा उत्सुक रहनेवाली जगदम्बिका पार्वतीको प्रणाम किया॥ ४२॥ |
| कोटिचन्द्रकलाकान्तिं सुस्मितां परिपूज्य च।<br>तुष्टाव भक्त्या सततमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ ४३ | करोड़ों चन्द्रमाकी कला-कान्तिसे युक्त तथा सुन्दर मुसकानवाली भगवतीकी सम्यक् पूजा करके सदाके लिये इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिकी कामनासे वसिष्ठजी श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे॥ ४३॥ |
| जय देवि महादेवि भक्तानुग्रहकारिणि।<br>जय सर्वसुराराध्ये जयानन्तगुणालये॥ ४४ | हे देवि! हे महादेवि! हे भक्तोंपर कृपा करनेवाली भगवति! आपकी जय हो। हे समस्त देवोंकी आराध्यस्वरूपा और अनन्त गुणोंकी आगार! आपकी जय हो॥ ४४॥ |
| नमो नमस्ते देवेशि शरणागतवत्सले।<br>जय दुर्गे दुःखहन्त्रि दुष्टदैत्यनिषूदिनि॥ ४५ | हे देवेश्वरि! हे शरणागतवत्सले! आपको बार-बार नमस्कार है। हे दुःखहारिणि! हे दुष्ट दानवोंका नाश करनेवाली भगवति! आपकी जय हो॥ ४५॥ |
| भक्तिगम्ये महामाये नमस्ते जगदम्बिके।<br>संसारसागरोत्तारपोतीभूतपदाम्बुजे ॥ ४६ | हे भक्तिसे प्राप्त होनेवाली भगवति! हे महामाये! हे जगदम्बिके! हे भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौका-स्वरूप चरणकमलवाली! आपको नमस्कार है॥ ४६॥ |
| ब्रह्मादयोऽपि विबुधास्त्वत्पादाम्बुजसेवया।<br>विश्वसर्गस्थितिलयप्रभुत्वं समवाप्नुयुः॥ ४७ | आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि देवता विश्वके सृजन, पालन तथा संहारहेतु सामर्थ्य प्राप्त करते हैं॥ ४७॥ |
| प्रसन्ना भव देवेशि चतुर्वर्गप्रदायिनि।<br>कस्त्वां स्तोतुं क्षमो देवि केवलं प्रणतोऽस्म्यहम्॥ ४८ | पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) प्रदान करनेवाली हे देवेश्वरि! आप प्रसन्न हों। हे देवि! आपकी स्तुति करनेमें भला कौन समर्थ है, अतः मैं आपको केवल प्रणाम कर रहा हूँ॥ ४८॥ |