भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३

| एकदा सा जगामाथ बुधस्याश्रमसन्निधौ।<br>दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं पीनोन्नतपयोधराम्॥ २६<br><br>बिम्बोष्ठीं कुन्ददशनां सुमुखीमुत्पलेक्षणाम्।<br>अनङ्गशरविद्धाङ्गश्चकमे भगवान् बुधः॥ २७ | एक बार वह बुधके आश्रमके समीप पहुँची। स्थूल तथा उन्नत स्तनोंवाली, बिम्ब-फलके समान लाल ओठोंवाली, कुन्दफूलके समान श्वेत दाँतोंवाली, सुन्दर मुख तथा कमलके समान नयनोंवाली उस सर्वाङ्गसुन्दरी तरुणीको देखकर कामदेवके बाणोंसे बिंधे हुए अंगोंवाले भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये॥ २६-२७॥ | | सापि तं चकमे सुभ्रूः कुमारं सोमनन्दनम्।<br>ततस्तस्याश्रमेऽवात्सीद्रममाणा बुधेन सा॥ २८ | वह सुन्दर भौंहोंवाली युवती भी चन्द्रपुत्र कुमार बुधपर आसक्त हो गयी और बुधके साथ रमण करती हुई उनके आश्रममें रहने लगी॥ २८॥ | | अथ कालेन कियता पुरूरवसमात्मजम्।<br>स तस्यां जनयामास मित्रावरुणसम्भवः॥ २९ | हे महर्षि अगस्त्य! कुछ समय बाद बुधने उस तरुणीसे पुरूरवा नामक पुत्रको उत्पन्न किया॥ २९॥ | | अथ वर्षेषु यातेषु कदाचित् सा बुधाश्रमे।<br>स्मृत्वा स्वं पूर्ववृत्तान्तं दुःखिता निर्जगाम ह॥ ३० | इस प्रकार बुधके आश्रममें रहते हुए कई वर्ष बीत जानेपर किसी समय उसे अपने पूर्व वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वह दुःखित होकर आश्रमसे चली गयी॥ ३०॥ | | गुरोरथाश्रमं गत्वा वसिष्ठस्य प्रणम्य तम्।<br>निवेद्य वृत्तं शरणं ययौ पुंस्त्वमभीप्सती॥ ३१ | इसके बाद गुरु वसिष्ठके आश्रममें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया और सारा वृत्तान्त कहकर पुरुषत्वकी कामना करती हुई वह उनके शरणागत हो गयी॥ ३१॥ | | वसिष्ठो ज्ञातवृत्तान्तो गत्वा कैलासपर्वतम्।<br>सम्पूज्य शम्भुं तुष्टाव भक्त्या परमया युतः॥ ३२ | इस प्रकार सभी बातोंको जानकर वसिष्ठजी कैलास-पर्वतपर जाकर विधि-विधानसे भगवान् शंकरकी पूजा करके परम भक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३२॥ | | वसिष्ठ उवाच<br>नमो नमः शिवायस्तु शङ्कराय कपर्दिने।<br>गिरिजार्द्धाङ्गदेहाय नमस्ते चन्द्रमौलये॥ ३३ | **वसिष्ठजी बोले—**शिव, शंकर, कपर्दी, गिरिजाके अर्धांग एवं चन्द्रमौलिको बार-बार नमस्कार है॥ ३३॥ | | मृडाय सुखदात्रे ते नमः कैलासवासिने।<br>नीलकण्ठाय भक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने॥ ३४ | मृड, सुखदाता, कैलासवासी, नीलकण्ठ, भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३४॥ | | शिवाय शिवरूपाय प्रपन्नभयहारिणे।<br>नमो वृषभवाहाय शरण्याय परात्मने॥ ३५ | शिव, शिवस्वरूप, शरणागतभयहारी, वृषभवाहन, शरणदाता परमात्माको नमस्कार है॥ ३५॥ | | ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय सर्गस्थितिलयेषु च।<br>नमो देवाधिदेवाय वरदाय पुरारये॥ ३६ | सृजन, पालन तथा संहारके समय ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशरूपधारी, देवाधिदेव, वरदायक तथा त्रिपुरारिको मेरा नमस्कार है॥ ३६॥ | | यज्ञरूपाय यजतां फलदात्रे नमो नमः।<br>गङ्गाधराय सूर्येन्दुशिखिनेत्राय ते नमः॥ ३७ | यज्ञरूप तथा याजकोंके फलदाताको बार-बार नमस्कार है। आप गंगाधर, सूर्य-चन्द्र-अग्निस্বরূপ त्रिनेत्रको मेरा नमस्कार है॥ ३७॥ |