भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 889 में से

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पृष्ठ 56

| अ० ३ ] | माहात्म्य | ४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तच्छ्रुत्वा स मुनिर्दध्यौ ज्ञात्वा होतुर्व्यतिक्रमम्।<br>ईश्वरं शरणं यात इलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ १५यह सुनकर महर्षि वसिष्ठने ध्यान लगाया, इसमें होताका व्यतिक्रम जानकर वे इलाको पुत्र बनानेकी कामनासे ईश्वरकी शरणमें गये॥ १५॥
मुनेस्तपःप्रभावाच्च परेशानुग्रहात्तथा।<br>पश्यतां सर्वलोकानामिला पुरुषतामगात्॥ १६मुनिके तपप्रभाव और भगवान्‌की कृपासे सभी लोगोंके देखते-देखते इला कन्यासे पुरुषरूपमें परिवर्तित हो गयी॥ १६॥
गुरुणा कृतसंस्कारः सुद्युम्नोऽथ मनोः सुतः।<br>निधिर्बभूव विद्यानां सरितामिव सागरः॥ १७इसके बाद गुरु वसिष्ठने पूर्णरूपसे संस्कार करके उसका नाम 'सुद्युम्न' रखा। वे मनुपुत्र सुद्युम्न सभी नदियोंके निधानभूत सागरकी भाँति सभी विद्याओंके निधान हो गये॥ १७॥
अथ कालेन सुद्युम्नस्तारुण्यं समवाप्य च।<br>मृगयार्थं वनं यातो हयमारुह्य सैन्धवम्॥ १८कुछ समय बीतनेपर सुद्युम्न युवा हुए और एक दिन सिन्धुदेशीय घोड़ेपर चढ़कर वे आखेटके लिये वनमें गये॥ १८॥
वनाद् वनान्तरं गच्छन् बहु बभ्राम सानुगः।<br>दैवादधस्ताद्धेमाद्रेः स कुमारो वनं ययौ॥ १९<br><br>कस्मिंश्चित् समये यत्र भार्यायापर्णया सह।<br>अरमद्देवदेवस्तु शङ्करो भगवान् मुदा॥ २०अपने सहचरोंके साथ वे कुमार सुद्युम्न एक वनसे दूसरे वनमें जाते हुए भटकते रहे और फिर संयोगसे वे हिमालयकी तलहटीके उस वनमें पहुँच गये जहाँ किसी समय देवाधिदेव भगवान् शंकर अपनी भार्या अपर्णाके साथ आनन्दपूर्ण मुद्रामें रमण कर रहे थे॥ १९-२०॥
तदा तु मुनयस्तत्र शिवदर्शनलालसाः।<br>आजग्मुरथ तान् दृष्ट्वा गिरिजा व्रीडिताभवत्॥ २१उसी समय भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे मुनिगण वहाँ आ गये और उन्हें देखकर पार्वतीजी लज्जित हो गयीं॥ २१॥
रममाणौ तु तौ दृष्ट्वा गिरिशौ संशितव्रताः।<br>निवृत्ता मुनयो जग्मुर्वैकुण्ठनिलयं तदा॥ २२तब शिव एवं पार्वतीको रमण करते देखकर उत्तम व्रत धारण करनेवाले वे मुनिगण वहाँसे लौटकर वैकुण्ठ-धामकी ओर चल दिये॥ २२॥
प्रियायाः प्रियमन्विच्छञ्छिवोऽरण्यं शशाप ह।<br>अद्यारभ्य विशेद्योऽत्र पुमान् योषिद् भवेदिति॥ २३तदनन्तर अपनी प्रियतमाको प्रसन्न करनेके लिये भगवान्‌ने उस अरण्यको शाप दे दिया कि आजसे जो भी पुरुष यहाँ प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २३॥
तत आरभ्य तं देशं पुरुषा वर्जयन्ति हि।<br>तत्र प्रविष्टः सुद्युम्नो बभूव प्रमदोत्तमा॥ २४तभीसे पुरुषोंने उस वनमें जाना त्याग दिया था और संयोगवश वहाँ पहुँचते ही सुद्युम्न एक लावण्यमयी स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हो गये॥ २४॥
स्त्रीभूताननुगानश्वं वडवां वीक्ष्य विस्मितः।<br>अथ सा सुन्दरी योषा विचचार वने वने॥ २५अपने सभी अनुचरोंको पुरुषसे स्त्री तथा घोड़ोंको घोड़ियोंमें रूपान्तरित हुआ देखकर सुद्युम्न आश्चर्यचकित हो गये। अब वह रूपवती तरुणी वन-वनमें विचरण करने लगी॥ २५॥
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