भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 889 में से

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पृष्ठ 490

अ० १७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४८१


अथ सप्तदशोऽध्यायः

श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे श्रीकृष्णावतारका चरित सुनानेका निवेदन करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>वाराङ्गनास्त्वयाख्याता नरनारायणाश्रमे।<br>एकं नारायणं शान्तं कामयानाः स्मरातुराः॥ १<br>शप्तुकामस्तदा जातो मुनिर्नारायणश्च ताः।<br>निवारितो नरेणाथ भ्रात्रा धर्मविदा नृप॥ २**जनमेजय बोले—**हे मुने! आप नर-नारायणके आश्रममें आयी हुई अप्सराओंकी चर्चा पहले ही कर चुके हैं, जो काम-पीड़ित होकर शान्तचित्त मुनि नारायणपर आसक्त हो गयी थीं। उसके बाद मुनि नारायण उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसपर उनके भाई धर्मवेत्ता नरने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया था॥ १-२॥
किं कृतं मुनिना तेन व्यसने समुपस्थिते।<br>ताभिः संकल्पितेनाथ कामार्थाभिर्भृशं मुने॥ ३<br>शक्रेणोत्पादिताभिश्च बहुप्रार्थनया पुनः।<br>याचितेन विवाहार्थं किं कृतं तेन जिष्णुना॥ ४<br>इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि चरितं तस्य मोक्षदम्।<br>नारायणस्य मे ब्रूहि विस्तरेण पितामह॥ ५हे मुने! अत्यन्त कामासक्त उन अप्सराओं के द्वारा [अपने मनमें पतिरूपमें] संकल्पित किये गये उन मुनि नारायणने इस विषम संकटके उपस्थित होनेपर क्या किया? इन्द्रके द्वारा प्रेषित उन वारांगनाओंके बार-बार बहुत प्रार्थना करके विवाहके लिये याचित उन भगवान् नारायणमुनिने क्या किया? हे पितामह! मैं उन नारायणमुनिका यह मोक्षदायक चरित्र सुनना चाहता हूँ; विस्तारके साथ मुझे बतायें॥ ३-५॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथा तस्य महात्मनः।<br>धर्मपुत्रस्य धर्मज्ञ विस्तरेण वदामि ते॥ ६**व्यासजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, मैं बताऊँगा। हे धर्मज्ञ! उन महात्मा धर्मपुत्र नारायणका चरित्र विस्तारपूर्वक मैं आपको बता रहा हूँ॥ ६॥
शप्तुकामस्तु संदृष्टो नरेणाथ यदा हरिः।<br>वारितोऽसौ समाश्वास्य मुनिर्नारायणस्तदा॥ ७जब नरने मुनि नारायणको शाप देनेके लिये उद्यत देखा तब उन्होंने नारायणको आश्वासन देकर [वैसा करनेसे] रोक दिया॥ ७॥
शान्तकोपस्तदोवाच तास्तपस्वी महामुनिः।<br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यं मधुरं धर्मनन्दनः॥ ८तत्पश्चात् क्रोधके शान्त हो जानेपर महामुनि तपस्वी धर्मपुत्र नारायण उन अप्सराओंसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए यह मधुर वचन कहने लगे—॥ ८॥
अस्मिञ्जन्मनि चार्वङ्ग्यः कृतसंकल्पवानहम्।<br>आवाभ्याञ्च न कर्तव्यः सर्वथा दारसंग्रहः॥ ९<br>तस्माद् गच्छन्तु त्रिदिवं कृपां कृत्वा ममोपरि।<br>धर्मज्ञा न प्रकुर्वन्ति व्रतभङ्गं परस्य वै॥ १०हे सुन्दरियो! हमने इस जन्ममें संकल्प कर रखा है कि हम दोनों कभी भी विवाह नहीं करेंगे। अतः मेरे ऊपर कृपा करके आपलोग स्वर्ग लौट जायँ। धर्मज्ञ लोग दूसरेका व्रत भंग नहीं करते॥ ९-१०॥
शृङ्गारेऽस्मिन् रसे नूनं स्थायीभावो रतिः स्मृतः।<br>कथं करोमि सम्बन्धं तदभावे सुलोचनाः॥ ११हे सुन्दर नेत्रोंवाली! इस शृंगार-रसमें रतिको ही स्थायी भाव कहा गया है। अतः [ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेके कारण] उसके अभावमें मैं सम्बन्ध कैसे कर सकता हूँ?॥ ११॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 A

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