देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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४८२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १७]
| कारणेन विना कार्यं न भवेदिति निश्चयः।<br>कविभिः कथितं शास्त्रे स्थायीभावो रसः किल॥ १२ | कारणके बिना कार्य नहीं हो सकता है—यह सुनिश्चित है। कवियोंने शास्त्रमें कहा है कि स्थायीभाव ही रसस्वरूप है॥ १२॥ |
| धन्यः सुचारुसर्वाङ्गः सभाग्योऽहं धरातले।<br>प्रीतिपात्रं यतो जातो भवतीनामकृत्रिमम्॥ १३ | समस्त सुन्दर अंगोंवाला मैं इस धरातलपर धन्य तथा सौभाग्यशाली हूँ जो कि आपलोगोंका स्वाभाविक प्रीतिपात्र बन सका॥ १३॥ |
| भवतीभिः कृपां कृत्वा रक्षणीयं व्रतं मम।<br>भविष्यामि महाभागाः पतिरप्यन्यजन्मनि॥ १४ | हे महाभागाओ! आपलोग कृपा करके मेरे व्रतकी रक्षा करें। मैं दूसरे जन्ममें आपलोगोंका पति अवश्य बनूँगा॥ १४॥ |
| अष्टाविंशे विशालाक्ष्यो द्वापरेऽस्मिन्धरातले।<br>देवानां कार्यसिद्धयर्थं प्रभविष्यामि सर्वथा॥ १५ | हे विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं अट्ठाईसवें द्वापरमें इस धरातलपर निश्चितरूपसे अवतरित होऊँगा॥ १५॥ |
| तदा भवत्यो मद्भााः प्राप्य जन्म पृथक्पृथक्।<br>भूपतीनां सुता भूत्वा पत्नीभावं गमिष्यथ॥ १६ | उस समय आपलोग भी राजाओंकी कन्याएँ होकर पृथक्-पृथक् जन्म ग्रहण करेंगी और मेरी भार्याएँ बनकर पत्नी-भावको प्राप्त होंगी॥ १६॥ |
| इत्याश्वास्य हरिस्तास्तु प्रतिश्रुत्य परिग्रहम्।<br>व्यसर्जयत्स भगवाञ्जग्मुश्च विगतज्वराः॥ १७ | पाणिग्रहणका ऐसा आश्वासन देकर भगवान् नारायण-मुनिने उन्हें विदा किया और वे अप्सराएँ भी कामव्यथासे रहित होकर वहाँसे चली गयीं॥ १७॥ |
| एवं विसर्जितास्तेन गताः स्वर्गं तदाङ्गनाः।<br>शक्राय कथयामासुः कारणं सकलं पुनः॥ १८ | इस प्रकार उनसे विदा पाकर वे अप्सराएँ स्वर्ग पहुँचीं और फिर उन्होंने इन्द्रको सारा वृत्तान्त बता दिया॥ १८॥ |
| आश्रुत्य मधवांस्ताभ्यो वृत्तान्तं तस्य विस्तरात्।<br>तुष्टाव तं महात्मानं नारीर्दृष्ट्वा तथोर्वशीः॥ १९ | तदनन्तर उन अप्सराओंसे नारायणमुनिका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर तथा साथमें आयी उर्वशी आदि नारियोंको देखकर इन्द्र उन महात्मा नारायणकी प्रशंसा करने लगे॥ १९॥ |
| इन्द्र उवाच<br>अहो धैर्यं मुनेः कामं तथैव च तपोबलम्।<br>येनोर्वश्यः स्वतपसा तादृग्रूपाः प्रकल्पिताः॥ २० | **इन्द्र बोले—**अहो, उन मुनिका ऐसा अपार धैर्य तथा तपोबल है, जिन्होंने अपने तपके प्रभावसे उन्हीं अप्सराओंके सदृश रूपवाली अन्य उर्वशी आदि अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं। नारायणमुनिकी यह प्रशंसा करके देवराज इन्द्रका मन प्रसन्नतासे परिपूर्ण हो गया। उधर, धर्मात्मा नारायण भी तपस्यामें संलग्न हो गये॥ २०-२१॥ |
| इति स्तुत्वा प्रसन्नात्मा बभूव सुरराट् ततः।<br>नारायणोऽपि धर्मात्मा तपस्यभिरतोऽभवत्॥ २१ | |
| इत्येतत्सर्वमाख्यातं मुनेर्वृत्तान्तमद्भुतम्।<br>नारायणस्य सकलं नरस्य च महामुनेः॥ २२ | [हे राजन्!] इस प्रकार मैंने आपसे मुनि नारायण और महामुनि नरके सम्पूर्ण अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कर दिया॥ २२॥ |
| तौ हि कृष्णार्जुनौ वीरौ भूभारहरणाय च।<br>जातौ तौ भरतश्रेष्ठ भृगोः शापवशादिह॥ २३ | हे भरतश्रेष्ठ! वे ही नर-नारायण भृगुके शापवश पृथ्वीका भार उतारनेके लिये इस लोकमें पराक्रमी कृष्ण तथा अर्जुनके रूपमें अवतरित हुए थे॥ २३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [प्रथम खण्ड]—16 B