देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १७] चतुर्थ स्कन्ध ४८३
| राजोवाच | राजा बोले— |
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| कृष्णावतारचरितं विस्तरेण वदस्व मे।<br>सन्देहो मम चित्तेऽस्ति तं निवारय मानद॥ २४ | हे मानद! अब आप कृष्णावतारकी कथा विस्तारके साथ मुझसे कहिये और मेरे मनमें जो सन्देह है, उसका निवारण कीजिये॥ २४॥ |
| ययोः पुत्रत्वमापन्नौ हर्यनन्तौ महाबलौ।<br>देवकीवसुदेवौ तौ दुःखभाजौ कथं मुने॥ २५ | हे मुने! महाबली श्रीकृष्ण और बलराम जिनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए, उन वसुदेव और देवकीको दुःखका भागी क्यों होना पड़ा?॥ २५॥ |
| कंसेन निगडे बद्धौ पीडितौ बहुवत्सरान्।<br>ययोः पुत्रो हरिः साक्षात्तपसा तोषितोऽभवत्॥ २६ | जिनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्रीहरि उनके पुत्र बने थे, वे ही [वसुदेव और देवकी] बेड़ियोंमें बद्ध होकर कंसके द्वारा बहुत वर्षोंतक क्यों सताये गये?॥ २६॥ |
| जातोऽसौ मथुरायां तु गोकुले स कथं गतः।<br>कंसं हत्वा द्वारवत्यां निवासं कृतवान्कथम्॥ २७<br><br>पित्रादिसेवितं देशं समृद्धं पावनं किल।<br>त्यक्त्वा देशान्तरेऽनार्ये गतवान्स कथं हरिः॥ २८ | वे श्रीकृष्ण उत्पन्न तो मथुरामें हुए, किंतु गोकुल क्यों ले जाये गये? बादमें कंसका वध करके उन्होंने द्वारकामें निवास क्यों किया? अपने पिता आदिके द्वारा सेवित, समृद्धिसम्पन्न तथा पवित्र स्थानको छोड़कर वे भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे अनार्य देशमें क्यों चले गये?॥ २७-२८॥ |
| कुलञ्च द्विजशापेन कथमुत्सादितं हरेः।<br>भारावतारणं कृत्वा वासुदेवः सनातनः॥ २९<br><br>देहं मुमोच तरसा जगाम च दिवं हरिः।<br>पापिष्ठानाञ्च भारेण व्याकुलाभूच्च मेदिनी॥ ३०<br><br>ते हता वासुदेवेन पार्थेनामितकर्मणा।<br>लुण्ठिता यैर्हरेः पत्न्यस्ते कथं न निपातिताः॥ ३१ | एक ब्राह्मणके शापसे भगवान् श्रीकृष्णके वंशका नाश क्यों हो गया? पृथ्वीका भार उतारकर उन सनातन भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत देहत्याग कर दिया और वे स्वर्ग चले गये। जिन पापियोंके भारसे पृथ्वी व्याकुल हो उठी थी, उन्हें तो अमित कर्मोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने मार डाला था, किंतु जिन चोरोंने भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लिया था, उन्हें वे क्यों नहीं मार सके?॥ २९—३१॥ |
| भीष्मो द्रोणस्तथा कर्णो बाह्लीकोऽप्यथ पार्थिवः।<br>वैराटोऽथ विकर्णश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्थिवः॥ ३२<br><br>सोमदत्तादयः सर्वे निहताः समरे नृपाः।<br>तेषामुत्तारितो भारश्चौराणां न हतः कथम्॥ ३३<br><br>कृष्णपत्न्यः कथं दुःखं प्राप्ताः प्रान्ते पतिव्रताः।<br>सन्देहोऽयं मुनिश्रेष्ठ चित्ते मे परिवर्तते॥ ३४ | भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजा बाह्लीक, वैराट, विकर्ण, राजा धृष्टद्युम्न, सोमदत्त आदि सभी राजागण युद्धमें मार डाले गये। भगवान् श्रीकृष्णने उनका भार तो पृथ्वीपरसे उतार दिया, किंतु वे चोरोंका भार क्यों नहीं मिटा सके? कृष्णकी पतिव्रता पत्नियोंको निर्जन स्थानमें इस प्रकारका दुःख क्यों मिला? हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह संदेह बार-बार हो रहा है॥ ३२—३४॥ |
| वसुदेवस्तु धर्मात्मा पुत्रदुःखेन तापितः।<br>त्यक्तवान्स कथं प्राणानपमृत्युं जगाम ह॥ ३५ | धर्मात्मा वसुदेवने पुत्रशोकसे सन्तप्त होकर अपने प्राण त्याग दिये; इस प्रकार वे अकालमृत्युको क्यों प्राप्त हुए?॥ ३५॥ |
| पाण्डवा धर्मसंयुक्ताः कृष्णे च निरताः सदा।<br>ते कथं दुःखभोक्तारो ह्यभवन्मुनिसत्तम॥ ३६ | हे मुनिवर! पाण्डव धर्मनिष्ठ थे और भगवान् कृष्णमें सदा तल्लीन रहते थे; फिर भी उन्हें दुःख क्यों भोगना पड़ा?॥ ३६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 C