देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४८५ |
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| तदा केनापि न ज्ञातो भगवान्हरिरीश्वरः।<br>किञ्चित्प्रब्रूहि मे ब्रह्मन् कारणं व्रजगोपनम्॥ ५० | भयसे द्वारका चले गये थे। उस समय कोई भी नहीं जान सका कि ये श्रीकृष्ण ही भगवान् विष्णु हैं। हे ब्रह्मन्! [श्रीकृष्णके द्वारा अपनेको] व्रजमें छिपाये रखनेका कुछ कारण आप मुझे बताइये॥ ४९-५०॥ |
| एते चान्ये च बहवः सन्देहा वासविसुत।<br>नाशयाद्य महाभाग सर्वज्ञोऽसि द्विजोत्तम॥ ५१ | हे सत्यवतीनन्दन! ये तथा और भी दूसरे बहुत-से सन्देह हैं। हे महाभाग! हे द्विजवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आज आप उन्हें दूर कर दीजिये॥ ५१॥ |
| गोप्यस्तथैकः सन्देहो हृदयान्न निवर्तते।<br>पाञ्चाल्याः पञ्चभर्तृत्वं लोके किं न जुगुप्सितम्॥ ५२ | एक और गोपनीय सन्देह है जो मेरे मनसे नहीं निकल पा रहा है। क्या द्रौपदीके पाँच पतियोंका होना लोकमें निन्दनीय नहीं है? विद्वज्जन तो सदाचारको ही प्रमाण मानते हैं; तब समर्थ होकर भी उन पाण्डवोंने पशु-धर्म क्यों स्वीकार किया?॥ ५२-५३॥ |
| सदाचारं प्रमाणं हि प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>पशुधर्मः कथं तैस्तु समर्थैरपि संश्रितः॥ ५३ | |
| भीष्मेणापि कृतं किं वा देवरूपेण भूतले।<br>गोलकौ तौ समुत्पाद्य यत्तु वंशस्य रक्षणम्॥ ५४ | देवतास्वरूप भीष्मपितामहने भी भूतलपर दो गोलक सन्तानें उत्पन्न कराकर अपने वंशकी जो रक्षा की, क्या यह उचित है? मुनियोंके द्वारा जो धर्मनिर्णय प्रदर्शित किया गया है कि जिस किसी भी उपायसे पुत्रोत्पत्ति करनी चाहिये, उसे धिक्कार है!॥ ५४-५५॥ |
| धिग्धर्मनिर्णयः कामं मुनिभिः परिदर्शितः।<br>येन केनाप्युपायेन पुत्रोत्पादनलक्षणः॥ ५५ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां चतुर्थस्कन्धे सुराङ्गनानां प्रति नारायणवरदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
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अथाष्टादशोऽध्यायः
पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी स्तुति करना, विष्णुद्वारा अपनेको भगवतीके अधीन बताना
</div>| व्यास उवाच<br>शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कृष्णस्य चरितं महत्।<br>अवतारकारणं चैव देव्याश्चरितमद्भुतम्॥ १ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, अब मैं श्रीकृष्णके महान् चरित्र, उनके अवतारके कारण और भगवतीके अद्भुत चरित्रका वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| ध्रैरकदा भराक्रान्ता रुदती चातिकर्शिता।<br>गोरूपधारिणी दीना भीतागच्छत्त्रिविष्टपम्॥ २ | एक समयकी बात है—[पापियोंके] भारसे व्यथित, अत्यधिक कृश, दीन तथा भयभीत पृथ्वी गौका रूप धारण करके रोती हुई स्वर्गलोक गयी॥ २॥ |
| पृष्टा शक्रेण किं तेऽद्य वर्तते भयमित्यथ।<br>केन वै पीडितासि त्वं किं ते दुःखं वसुन्धरे॥ ३ | वहाँ इन्द्रने पूछा—हे वसुन्धरे! इस समय तुम्हें कौन-सा भय है, तुम्हें किसने पीड़ा पहुँचायी है और तुम्हें क्या दुःख है?॥ ३॥ |
| तच्छ्रुत्वेला तदोवाच शृणु देवेश मेऽखिलम्।<br>दुःखं पृच्छसि यत्त्वं मे भाराक्रान्तोऽस्मि मानद॥ ४ | यह सुनकर पृथ्वीने कहा—हे देवेश! यदि आप पूछ ही रहे हैं तो मेरा सारा दुःख सुन लीजिये। हे मानद! मैं भारसे दबी हुई हूँ॥ ४॥ |