भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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४८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जरासन्धो महापापी मागधेषु पतिर्मम।<br>शिशुपालस्तथा चैद्यः काशिराजः प्रतापवान्॥ ५<br><br>रूक्मी च बलवान्कंसो नरकश्च महाबलः।<br>शाल्वः सौभपतिः क्रूरः केशी धेनुकवत्सकौ॥ ६<br><br>सर्वे धर्मविहीनाश्च परस्परविरोधिनः।<br>पापाचारा मदोन्मत्ताः कालरूपाश्च पार्थिवाः॥ ७मगधदेशका राजा महापापी जरासन्ध, चेदिनरेश शिशुपाल, प्रतापी काशिराज, रुक्मी, बलवान् कंस, महाबली नरकासुर, सौभनरेश शाल्व, क्रूर केशी, धेनुकासुर और वत्सासुर—ये सभी राजागण धर्महीन, परस्पर विरोध रखनेवाले, पापाचारी, मदोन्मत्त और साक्षात् कालस्वरूप हो गये हैं॥ ५–७॥
तैरहं पीडिता शक्र भाराक्रान्ताक्षमा विभो।<br>किं करोमि क्व गच्छामि चिन्ता मे महती स्थिता॥ ८हे इन्द्र! उनसे मुझे बहुत व्यथा हो रही है। मैं उनके भारसे दबी हुई हूँ और अब [उनका भार सहनेमें] मैं असमर्थ हो गयी हूँ। हे विभो! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मुझे यही महान् चिन्ता है॥ ८॥
पीडिताहं वराहेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>शक्र जानीहि हरिणा दुःखार्दुःखतरं गता॥ ९हे इन्द्र! पूर्वमें मैं [दानव हिरण्याक्षसे] पीड़ित थी। उस समय परम ऐश्वर्यशाली वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने मेरा उद्धार किया था। यदि वे वराहरूप धारण करके मेरा उद्धार न किये होते तो उससे भी अधिक दुःखकी स्थितिमें मैं न पहुँचती—आप ऐसा जानिये॥ ९॥
यतोऽहं दुष्टदैत्येन कश्यपस्यात्मजेन वै।<br>हृताहं हिरण्याक्षेण मग्ना तस्मिन्महार्णवे॥ १०<br><br>तदा सूकररूपेण विष्णुना निहतोऽप्यसौ।<br>उद्धृताहं वराहेण स्थापिता हि स्थिरा कृता॥ ११<br><br>नोचेद्रसातले स्वस्था स्थिता स्यां सुखशायिनी।<br>न शक्तास्म्यद्य देवेश भारं वोढुं दुरात्मनाम्॥ १२कश्यपके पुत्र दुष्ट दैत्य हिरण्याक्षने मुझे चुरा लिया था और उस महासमुद्रमें डुबो दिया था। उस समय भगवान् विष्णुने सूकरका रूप धारणकर उसका संहार किया और मेरा उद्धार किया। तदनन्तर उन वराहरूपधारी विष्णुने मुझे स्थापित करके स्थिर कर दिया अन्यथा मैं इस समय पातालमें स्वस्थचित्त रहकर सुखपूर्वक सोयी रहती। हे देवेश! अब मैं दुष्टात्मा राजाओंका भार वहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ १०–१२॥
अग्रे दुष्टः समायाति ह्यष्टाविंशस्तथा कलिः।<br>तदाहं पीडिता शक्र गन्तास्म्याशु रसातलम्॥ १३<br><br>तस्मात्त्वं देवदेवेश दुःखरूपार्णवस्य च।<br>पारदो भव भारं मे हर पादौ नमामि ते॥ १४हे इन्द्र! अब आगे अट्ठाईसवाँ दुष्ट कलियुग आ रहा है। उस समय मैं और भी पीड़ित हो जाऊँगी तब तो मैं शीघ्र ही रसातलमें चली जाऊँगी। अतएव हे देवदेवेश! इस दुःखरूपी महासागरसे मुझे पार कर दीजिये; मेरा बोझ उतार दीजिये, मैं आपके चरणोंमें नमन करती हूँ॥ १३–१४॥
इन्द्र उवाच<br>इले किं ते करोम्यद्य ब्रह्माणं शरणं व्रज।<br>अहं तत्रागमिष्यामि स ते दुःखं हरिष्यति॥ १५**इन्द्र बोले—**हे वसुन्धरे! मैं इस समय तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ! तुम ब्रह्माकी शरणमें जाओ, वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे, मैं भी वहाँ आ जाऊँगा॥ १५॥
तच्छ्रुत्वा त्वरिता पृथ्वी ब्रह्मलोकं गता तदा।<br>शक्रोऽपि पृष्ठतः प्राप्तः सर्वदेवपुरःसरः॥ १६यह सुनकर पृथ्‍वीने तत्काल ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे-पीछे इन्द्र भी सभी देवताओंके साथ वहाँ पहुँच गये॥ १६॥