भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० १८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४८७ | | :--- | :--- |

| सुरभीमागतां तत्र दृष्ट्वोवाच प्रजापतिः।<br>महीं ज्ञात्वा महाराज ध्यानेन समुपस्थिताम् ॥ १७<br><br>कस्माद्रुदसि कल्याणि किं ते दुःखं वदाधुना।<br>पीडितासि च केन त्वं पापाचारेण भूर्वद ॥ १८ | हे महाराज! उस आयी हुई धेनुको अपने सम्मुख उपस्थित देखकर तथा ध्यान-दृष्टिद्वारा उसे पृथ्वी जान करके ब्रह्माजीने कहा—हे कल्याणि! तुम किसलिये रो रही हो और तुम्हें कौन-सा दुःख है; मुझे अभी बताओ। हे पृथ्वि! किस पापाचारीने तुम्हें पीड़ा पहुँचायी है, मुझे बताओ॥ १७-१८॥ | | धरोवाच<br>कलिरायाति दुष्टोऽयं बिभेमि तद्भयादहम्।<br>पापाचाराः प्रजास्तत्र भविष्यन्ति जगत्पते ॥ १९<br><br>राजानश्च दुराचाराः परस्परविरोधिनः।<br>चौरकर्मरताः सर्वे राक्षसाः पूर्णवैरिणः ॥ २०<br><br>तान्हत्वा नृपतीन्भारं हर मेऽद्य पितामह।<br>पीडितास्मि महाराज सैन्यभारेण भूभृताम् ॥ २१ | धरा बोली— हे जगत्पते! यह दुष्ट कलि अब आनेवाला है। मैं उसीके आतंकसे डर रही हूँ; क्योंकि उस समय सभी लोग पापाचारी हो जायेंगे। सभी राजालोग दुराचारी हो जायेंगे, आपसमें विरोध करनेवाले होंगे और चोरीके कर्ममें संलग्न रहेंगे। वे राक्षसके रूपमें एक-दूसरेके पूर्णरूपसे शत्रु बन जायेंगे। हे पितामह! उन राजाओंका वध करके मेरा भार उतार दीजिये। हे महाराज! मैं राजाओंकी सेनाके भारसे दबी हुई हूँ॥ १९-२१॥ | | ब्रह्मोवाच<br>नाहं शक्तस्तथा देवि भारावतरणे तव।<br>गच्छावः सदनं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः ॥ २२<br><br>स ते भारापनोदं वै करिष्यति जनार्दनः।<br>पूर्वं मयापि ते कार्यं चिन्तितं सुविचार्य च ॥ २३<br><br>तत्र गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्र देवो जनार्दनः। | ब्रह्माजी बोले— हे देवि! तुम्हारा भार उतारनेमें मैं सर्वथा समर्थ नहीं हूँ। अब हम दोनों चक्रधारी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके धाम चलते हैं। वे जनार्दन तुम्हारा भार अवश्य उतार देंगे। मैंने पहलेसे ही भलीभाँति विचार करके तुम्हारा कार्य करनेकी योजना बनायी है। [उन्होंने इन्द्रसे कहा—] हे सुरश्रेष्ठ! जहाँपर भगवान् जनार्दन विद्यमान हैं, अब आप वहींपर चलें॥ २२-२३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा वेदकर्तासौ पुरस्कृत्य सुरांश्च गाम् ॥ २४<br><br>जगाम विष्णुसदनं हंसारूढश्चतुर्मुखः।<br>तुष्टाव वेदवाक्यैश्च भक्तिप्रवणमानसः ॥ २५ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर वे वेदकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हंसपर आरूढ हुए और देवताओं तथा गोरूपधारिणी पृथ्वीको साथमें लेकर विष्णुलोकके लिये प्रस्थित हो गये। [वहाँ पहुँचकर] भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले ब्रह्माजी वेदवाक्योंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ २४-२५॥ | | ब्रह्मोवाच<br>सहस्रशीर्षास्त्वमसि सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>त्वं वेदपुरुषः पूर्वं देवदेवः सनातनः ॥ २६<br><br>भूतपूर्वं भविष्यच्च वर्तमानं च यद्विभो।<br>अमरत्वं त्वया दत्तमस्माकं च रमापते ॥ २७<br><br>एतावान्महिमा तेऽस्ति को न वेत्ति जगत्त्रये।<br>त्वं कर्ताप्यविता हन्ता त्वं सर्वगतिरीश्वरः ॥ २८ | ब्रह्माजी बोले— आप हजार मस्तकोंवाले, हजार नेत्रोंवाले और हजार पैरोंवाले हैं। आप देवताओंके भी आदिदेव तथा सनातन वेदपुरुष हैं। हे विभो! हे रमापते! भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकालका जो भी हमारा अमरत्व है, उसे आपने ही हमें प्रदान किया है। आपकी इतनी बड़ी महिमा है कि उसे त्रिलोकीमें कौन नहीं जानता? आप ही सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। आप सर्वव्यापी और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं॥ २६-२८॥ |