भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 497
४८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— इस प्रकार स्तुति करनेपर पवित्र हृदयवाले वे गरुडध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये और उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओंको अपने दर्शन दिये। प्रसन्न मुखमण्डलवाले भगवान् विष्णुने देवताओंका स्वागत किया और विस्तारपूर्वक उनके आगमनका कारण पूछा॥ २९-३०॥ | | इतीडितः प्रभुर्विष्णुः प्रसन्नो गरुडध्वजः।<br>दर्शनञ्च ददौ तेभ्यो ब्रह्मादिभ्योऽमलाशयः॥ २९<br><br>पप्रच्छ स्वागतं देवान्प्रसन्नवदनो हरिः।<br>ततस्त्वागमने तेषां कारणञ्च सविस्तरम्॥ ३० | | | तमुवाचाब्जजो नत्वा धरादुःखञ्च संस्मरन्।<br>भारावतरणं विष्णो कर्तव्यं ते जनार्दन॥ ३१<br><br>भुवि धृत्वावतारं त्वं द्वापरान्ते समागते।<br>हत्वा दुष्टान्नृपानुर्व्या हर भारं दयानिधे॥ ३२ | तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम करनेके उपरान्त पृथ्वीके दुःखका स्मरण करते हुए उनसे कहा—हे विष्णो! हे जनार्दन! अब पृथ्वीका भार दूर कर देना आपका कर्तव्य है। अतः हे दयानिधे! द्वापरका अन्तिम समय उपस्थित होनेपर आप पृथ्वीपर अवतार लेकर दुष्ट राजाओंको मारकर पृथ्वीका भार उतार दीजिये॥ ३१-३२॥ | | विष्णुरुवाच | विष्णु बोले— इस विषयमें मैं (विष्णु), ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, यम, त्वष्टा, सूर्य और वरुण—कोई भी स्वतन्त्र नहीं है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् योगमायाके अधीन रहता है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ [सात्त्विक, राजस, तामस] गुणोंके सूत्रोंद्वारा उन्हींमें गुँथा हुआ है॥ ३३-३४॥ | | नाहं स्वतन्त्र एवात्र न ब्रह्मा न शिवस्तथा।<br>नेन्द्रोऽग्निर्न यमस्त्वष्टा न सूर्यो वरुणस्तथा॥ ३३<br><br>योगमायावशे सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ग्रथितं गुणसूत्रतः॥ ३४ | | | यथा सा स्वेच्छया पूर्वं कर्तुमिच्छति सुव्रत।<br>तथा करोति सुहिता वयं सर्वेऽपि तद्वशाः॥ ३५ | हे सुव्रत! वे हितकारिणी भगवती सर्वप्रथम स्वेच्छापूर्वक जैसा करना चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। हमलोग भी सदा उनके ही अधीन रहते हैं॥ ३५॥ | | यद्यहं स्यां स्वतन्त्रो वै चिन्तयन्तु धिया किल।<br>कुतोऽभवं मत्स्यवपुः कच्छपो वा महार्णवे॥ ३६<br><br>तिर्यग्योनिषु को भोगः का कीर्तिः किं सुखं पुनः।<br>किं पुण्यं किं फलं तत्र क्षुद्रयोनिगतस्य मे॥ ३७ | अब आपलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार करें कि यदि मैं स्वतन्त्र होता तो महासमुद्रमें मत्स्य और कच्छपरूपधारी क्यों बनता? तिर्यक्-योनियोंमें कौन-सा भोग प्राप्त होता है, क्या यश मिलता है, कौन-सा सुख होता है और कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है? [इस प्रकार] क्षुद्रयोनियोंमें जन्म लेनेवाले मुझ विष्णुको क्या फल मिला?॥ ३६-३७॥ | | कोलो वाथ नृसिंहो वा वामनो वाभवं कुतः।<br>जमदग्निसुतः कस्मात्सम्भवेयं पितामह॥ ३८<br><br>नृशंसं वा कथं कर्म कृतवानस्मि भूतले।<br>क्षतजैस्तु हृदान्सर्वानपूरयेयं कथं पुनः॥ ३९<br><br>तत्कथं जमदग्नेश्च पुत्रो भूत्वा द्विजोत्तमः।<br>क्षत्रियान्हतवानाजौ निर्दयो गर्भगानपि॥ ४० | यदि मैं स्वतन्त्र होता तो सूकर, नृसिंह और वामन क्यों बनता? इसी प्रकार हे पितामह! मैं जमदग्निपुत्र (परशुराम)-के रूपमें उत्पन्न क्यों होता? इस भूतलपर मैं [क्षत्रियोंके संहार जैसा] नृशंस कर्म क्यों करता और उनके रुधिरसे समस्त सरोवरोंको क्यों भर डालता? उस समय मैं जमदग्निपुत्र परशुरामके रूपमें जन्म लेकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी युद्धमें क्षत्रियोंका संहार क्यों करता और घोर निर्दयी बनकर गर्भस्थ शिशुओंंतकको भला क्यों मारता?॥ ३८-४०॥ |