भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 889 में से

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पृष्ठ 498

| अ० १८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४८९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रामो भूत्वाथ देवेन्द्र प्राविशद्दण्डकं वनम्।<br>पदातिश्चीरवासाश्च जटावल्कलवान्पुनः॥ ४१<br>असहायो ह्यपाथेयो भीषणे निर्जने वने।<br>कुर्वन्नाखेटकं तत्र व्यचरं विगतत्रपः॥ ४२हे देवेन्द्र! रामका अवतार लेकर मुझे दण्डकवनमें पैदल विचरण करना पड़ा, गेरुआ वस्त्र धारण करना पड़ा और जटा-वल्कलधारी बनना पड़ा। उस निर्जन वनमें असहाय रहते हुए तथा पासमें बिना किसी भोज्य-सामग्रीके ही निर्लज्ज होकर आखेट करते हुए मैं इधर-उधर भटकता रहा॥ ४१-४२॥
न ज्ञातवान्मृगं हैमं मायया पिहितस्तदा।<br>उटजे जानकीं त्यक्त्वा निर्गतस्तत्पदानुगः॥ ४३उस समय मायासे आच्छादित रहनेके कारण मैं उस मायावी स्वर्ण-मृगको नहीं पहचान सका और जानकीको पर्णकुटीमें छोड़कर उस मृगके पीछे-पीछे निकल पड़ा॥ ४३॥
लक्ष्मणोऽपि च तां त्यक्त्वा निर्गतो मत्पदानुगः।<br>वारितोऽपि मयात्यर्थं मोहितः प्राकृतैर्गुणैः॥ ४४मेरे बहुत मना करनेपर भी प्राकृत गुणोंसे व्यामुग्ध होनेके कारण लक्ष्मण भी उस सीताको छोड़कर मेरे पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए वहाँसे निकल पड़े॥ ४४॥
भिक्षुरूपं ततः कृत्वा रावणः कपटाकृतिः।<br>जहार तरसा रक्षो जानकीं शोककर्शिताम्॥ ४५तदनन्तर कपटस्वभाव राक्षस रावणने भिक्षुकका रूप धारण करके शोकसे व्याकुल जानकीका तत्काल हरण कर लिया॥ ४५॥
दुःखार्तेन मया तत्र रुदितञ्च वने वने।<br>सुग्रीवेण च मित्रत्वं कृतं कार्यवशन्मया॥ ४६<br>अन्यायेन हतो वाली शापाच्चैव निवारितः।<br>सहायान्वानरान् कृत्वा लङ्कायां चलितः पुनः॥ ४७तब दुःखसे व्याकुल होकर मैं वन-वन भटकता हुआ रोता रहा और अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मैंने सुग्रीवसे मित्रता की। मैंने अन्यायपूर्वक वालीका वध किया तथा उसे शापसे मुक्ति दिलायी और इसके बाद वानरोंको अपना सहायक बनाकर लंकाकी ओर प्रस्थान किया॥ ४६-४७॥
बद्धोऽहं नागपाशैश्च लक्ष्मणश्च ममानुजः।<br>विसंज्ञौ पतितौ दृष्ट्वा वानरा विस्मयं गताः॥ ४८<br>गरुडेन तदागत्य मोचितौ भ्रातरौ किल।<br>चिन्ता मे महती जाता दैवं किं वा करिष्यति॥ ४९<br>हृतं राज्यं वने वासो मृतस्तातः प्रिया हृता।<br>युद्धं कष्टं ददात्येवमग्रे किं वा करिष्यति॥ ५०[वहाँ युद्धमें] मैं तथा मेरा छोटा भाई लक्ष्मण दोनों ही नागपाशोंसे बाँध दिये गये। हम दोनोंको अचेत पड़ा देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गये। तब गरुड़ने आकर हम दोनों भाइयोंको छुड़ाया। उस समय मुझे महान् चिन्ता होने लगी कि दैव अब न जाने क्या करेगा? राज्य छिन गया, वनमें वास करना पड़ा, पिताकी मृत्यु हो गयी और प्रिय सीता हर ली गयी। युद्ध कष्ट दे ही रहा है, अब आगे दैव न जाने क्या करेगा!॥ ४८-५०॥
प्रथमं तु महद्दुःखमराज्यस्य वनाश्रयम्।<br>राजपुत्र्यान्वितस्यैव धनहीनस्य मे सुराः॥ ५१<br>वराटिकापि पित्रा मे न दत्ता वननिर्गमे।<br>पदातिरसहायोऽहं धनहीनश्च निर्गतः॥ ५२<br>चतुर्दशैव वर्षाणि नीतानि च तदा मया।<br>क्षात्रं धर्मं परित्यज्य व्याधवृत्त्या महावने॥ ५३हे देवतागण! सर्वप्रथम दुःख तो मुझ राज्यविहीनका वनवास हुआ; वनके लिये चलते समय राजकुमारी सीता मेरे साथ थीं और मेरे पास धन भी नहीं था। वन जाते समय पिताजीने मुझे एक वराटिका (कौड़ी) भी नहीं दी; असहाय तथा धनविहीन मैं पैदल ही निकल पड़ा। उस समय क्षत्रियधर्मका त्याग करके व्याधवृत्तिके द्वारा मैंने उस महावनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये॥ ५१-५३॥