देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| दैवाद्युद्धे जयः प्राप्तो निहतोऽसौ महासुरः।<br>आनीता च पुनः सीता प्राप्तायोध्या मया तथा ॥ ५४<br><br>वर्षाणि कतिचित्तत्र सुखं संसारसम्भवम्।<br>प्राप्तं राज्यञ्च सम्पूर्णं कोसलानधितिष्ठता॥ ५५ | तदनन्तर भाग्यवश युद्धमें मुझे विजय प्राप्त हुई और वह महान् असुर रावण मारा गया। इसके बाद मैं सीताको ले आया और मुझे अयोध्या फिरसे प्राप्त हो गयी। इस प्रकार जब मुझे सम्पूर्ण राज्य मिल गया, तब कोसलदेशपर अधिष्ठित रहते हुए मैंने वहाँपर कुछ वर्षोंतक सांसारिक सुखका भोग किया॥ ५४-५५॥ |
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| पुरैवं वर्तमानेन प्राप्तराज्येन वै तदा।<br>लोकापवादभीतेन त्यक्ता सीता वने मया॥ ५६<br><br>कान्ताविरहजं दुःखं पुनः प्राप्तं दुरासदम्।<br>पातालं सा गता पश्चाद्गुरां भित्त्वा धरात्मजा ॥ ५७ | इस प्रकार पूर्वकालमें जब मुझे राज्य प्राप्त हो गया तब मैंने लोकनिन्दाके भयसे वनमें सीताका परित्याग कर दिया। इसके बाद मुझे पुनः पत्नी-वियोगसे होनेवाला भयंकर दुःख प्राप्त हुआ। वह धरानन्दिनी सीता पृथ्वीको भेदकर पातालमें चली गयी ॥ ५६-५७॥ |
| एवं रामावतारेऽपि दुःखं प्राप्तं निरन्तरम्।<br>परतन्त्रेण मे नूनं स्वतन्त्रः को भवेत्तदा ॥ ५८<br><br>पश्चात्कालवशात्प्राप्तः स्वर्गो मे भ्रातृभिः सह।<br>परतन्त्रस्य का वार्ता वक्तव्या विबुधेन वै॥ ५९<br><br>परतन्त्रोऽस्म्यहं नूनं पद्मयोने निशामय।<br>तथा त्वमपि रुद्रश्च सर्वे चान्ये सुरोत्तमाः ॥ ६० | इस प्रकार रामावतारमें भी मैं परतन्त्र होकर निरन्तर दुःख पाता रहा। तब भला दूसरा कौन स्वतन्त्र हो सकता है? तत्पश्चात् कालके वशीभूत होकर मुझे अपने भाइयोंके साथ स्वर्ग जाना पड़ा। अतः कोई भी विद्वान् पराधीन व्यक्तिकी क्या बात करेगा? हे कमलोद्भव! आप यह जान लीजिये कि जैसे मैं परतन्त्र हूँ वैसे ही आप, शंकर तथा अन्य सभी बड़े-बड़े देवता भी निश्चितरूपसे परतन्त्र हैं॥ ५८-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ब्रह्माणं प्रति विष्णुवाक्यं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका आश्वासन देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह प्रजापतिम्।<br>यन्मायामोहितः सर्वस्तत्त्वं जानाति नो जनः॥ १<br><br>वयं मायावृताः कामं न स्मरामो जगद्गुरुम्।<br>परमं पुरुषं शान्तं सच्चिदानन्दमव्ययम्॥ २ | [हे राजन्!] ऐसा कहनेके उपरान्त भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे फिर कहा— जिन भगवतीकी मायासे मोहित रहनेके कारण सभी लोग परमतत्त्वको नहीं जान पाते, उन्हींकी मायासे आच्छादित रहनेके कारण हम लोग भी जगद्गुरु, शान्तस्वरूप, सच्चिदानन्द तथा अविनाशी परमपुरुषका स्मरण नहीं कर पाते ॥ १-२॥ |