देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १९] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९१ | | :--- | :--- |
| अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शिवोऽहमिति मोहिताः।<br>न जानीमो वयं धातः परं वस्तु सनातनम्॥ ३ | हे ब्रह्मन्! मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, मैं शिव हूँ—इसी [अभिमानसे] मोहित हमलोग उस सनातन परम-तत्त्वको नहीं जान पाते॥ ३॥ | | यन्मायामोहितश्चाहं सदा वर्ते परात्मनः।<br>परवान्दारुपाञ्चाली मायिकस्य यथा वशे॥ ४ | उस परमात्माकी मायासे मोहित मैं उसी प्रकार सदा उसके अधीन रहता हूँ, जैसे कठपुतली बाजीगरके अधीन रहती है॥ ४॥ | | भवतापि तथा दृष्टा विभूतिस्तस्य चाद्भुता।<br>कल्पादौ भवयुक्तेन मयापि च सुधार्णवे॥ ५<br><br>मणिद्वीपेऽथ मन्दारविटपे रासमण्डले।<br>समाजे तत्र सा दृष्टा श्रुता न वचसापि च॥ ६ | कल्पके आरम्भमें आप (ब्रह्मा)-ने, शिवने तथा मैंने भी सुधासागरमें उस परमात्माकी अद्भुत विभूतिका दर्शन किया था। मणिद्वीपमें मन्दारवृक्षके नीचे चल रहे रासमण्डलमें एकत्रित सभामें भी वह विभूति साक्षात् देखी गयी थी; न कि वह केवल कही-सुनी गयी बात है॥ ५-६॥ | | तस्मात्तां परमां शक्तिं स्मरन्त्वद्य सुराः शिवाम्।<br>सर्वकामप्रदां मायामाद्यां शक्तिं परात्मनः॥ ७ | अतएव इस अवसरपर सभी देवता उसी परमा शक्ति, कल्याणकारिणी, सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली, माया-स्वरूपिणी तथा परमात्माकी आद्याशक्ति भगवतीका स्मरण करें॥ ७॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता हरिणा देवा ब्रह्माद्या भुवनेश्वरीम्।<br>सस्मरुर्मनसा देवीं योगमायां सनातनीम्॥ ८ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि देवता सदा विराजमान रहनेवाली भगवती योगमायाका एकाग्र मनसे ध्यान करने लगे॥ ८॥ | | स्मृतमात्रा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>पाशाङ्कुशवराभीतिधरा देवी जपारुणा।<br>दृष्ट्वा प्रमुदिता देवास्तुष्टुवुस्तां सुदर्शनाम्॥ ९ | उनके स्मरण करते ही भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन प्रदान किया। उस समय वे देवी जपाकुसुमके समान रक्तवर्णसे सुशोभित थीं और उन्होंने पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्रा धारण कर रखी थी। उन परम सुन्दर भगवतीको देखकर सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनकी स्तुति करने लगे॥ ९॥ | | देवा ऊचुः<br>ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिङ्गा विभावसोः।<br>तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम्॥ १० | देवता बोले— जिस प्रकार मकड़ीकी नाभिसे तन्तु तथा अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार यह जगत् जिनसे प्रकट हुआ है, उन भगवतीको हम नमस्कार करते हैं॥ १०॥ | | यन्मायाशक्तिसंकॢप्तं जगत्सर्वं चराचरम्।<br>तां चितं भुवनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम्॥ ११ | जिनकी मायाशक्तिसे सम्पूर्ण चराचर जगत् पूर्णतः ओत-प्रोत है, उन चित्स्वरूपिणी करुणासिन्धु भुवनेश्वरीका हम स्मरण करते हैं॥ ११॥ | | यदज्ञानाद्भवोत्पत्तिर्ज्ञानाद्भवनाशनम् ।<br>संविद्रूपां च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात्॥ १२ | जिन्हें न जाननेसे संसारमें बार-बार जन्म होता रहता है और जिनका ज्ञान हो जानेसे भव-बन्धनका नाश हो जाता है, उन ज्ञानस्वरूपिणी भगवतीका हम स्मरण करते हैं। वे हमें [सन्मार्गपर चलनेके लिये] |