देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि।<br>तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ १३ | प्रेरित करें। हम उन महालक्ष्मीको जानें। हम सर्वशक्तिमयी भगवतीका ध्यान करते हैं। वे भगवती हमें [सत्कर्ममें प्रवृत्त होनेकी] प्रेरणा प्रदान करें॥ १२-१३॥ |
| मातर्नताः स्म भुवनार्तिहरे प्रसीद<br>शन्नो विधेहि कुरु कार्यमिदं दयार्द्रे।<br>भारं हरस्व विनिहत्य सुरारिवर्गं<br>मह्या महेश्वरि सतां कुरु शं भवानि॥ १४ | संसारका कष्ट हरनेवाली हे माता! हम आपको प्रणाम करते हैं, आप प्रसन्न होइये। हे दयासे आर्द्र हृदयवाली! हमारा कल्याण कीजिये; हमारा यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये। हे महेश्वरि! असुर-समुदायका संहार करके पृथ्वीका भार उतार दीजिये। हे भवानि! आप सज्जनोंका कल्याण करें॥ १४॥ |
| यद्यम्बुजाक्षि दयसे न सुरान्कदाचित्<br>किं ते क्षमा रणमुखेऽसिशरैः प्रहर्तुम्।<br>एतत्तथैव गदितं ननु यक्षरूपं<br>धृत्वा तृणं दह हुताश पदाभिलाषैः॥ १५ | हे कमलनयने! यदि आप देवताओंपर दया नहीं करेंगी तो वे समरांगणमें तलवारों तथा बाणोंसे [दैत्योंपर] प्रहार करनेमें समर्थ कैसे हो सकेंगे? इस बातको आपने स्वयं [यक्षोपाख्यान-प्रसंगमें] यक्षरूप धारण करके ‘हे हुताशन! आप इस तिनकेको जला दें’ इत्यादि पद-कथनोंके द्वारा व्यक्त कर दिया है॥ १५॥ |
| कंसः कुजोऽथ यवनेन्द्रसुतश्च केशी<br>बार्हद्रथो बकबकीखरशाल्वमुख्याः।<br>येऽन्ये तथा नृपतयो भुवि सन्ति तांस्त्वं<br>हत्वा हरस्व जगतो भरमाशु मातः॥ १६ | हे माता! कंस, भौमासुर, कालयवन, केशी, बृहद्रथ-पुत्र जरासन्ध, बकासुर, पूतना, खर और शाल्व आदि तथा इनके अतिरिक्त और भी जो दुष्ट राजागण पृथ्वीपर हैं, उन्हें मारकर आप शीघ्र ही पृथ्वीका भार उतार दीजिये॥ १६॥ |
| ये विष्णुना न निहताः किल शङ्करेण<br>ये वा विगृह्य जलजाक्षि पुरन्दरेण।<br>ते ते मुखं सुखकरं सुसमीक्षमाणाः<br>संख्ये शरैर्विनिहता निजलीलया ते॥ १७ | हे कमलनयने! जिन दैत्योंको भगवान् विष्णु, शिव और इन्द्र भी [कई बार] युद्ध करके नहीं मार सके, वे दैत्य युद्धभूमिमें आपका सुखदायक मुखमण्डल देखते हुए आपकी लीलासे आपके बाणोंके द्वारा मार डाले गये॥ १७॥ |
| शक्तिं विना हरिहरप्रमुखाः सुराश्च<br>नैवेश्वरा विचलितुं तव देवदेवि।<br>किं धारणाविरहितः प्रभुरप्यनन्तो<br>धर्तुं धराञ्च रजनीशकलावतंसे॥ १८ | चन्द्रकलाको मस्तकपर धारण करनेवाली हे देवदेवि! विष्णु, शिव आदि प्रमुख देवता भी आपकी शक्तिके बिना हिलने-डुलनेतकमें समर्थ नहीं हैं। इसी प्रकार क्या शेषनाग भी आपकी शक्तिके बिना पृथ्वीको धारण कर सकनेमें समर्थ हैं?॥ १८॥ |
| इन्द्र उवाच<br>वाचा विना विधिरलं भवतीह विश्वं<br>कर्तुं हरिः किमु रमारहितोऽथ पातुम्।<br>संहर्तुमीश उमयोज्झित ईश्वरः किं<br>ते ताभिरेव सहिताः प्रभवः प्रजेशाः॥ १९ | इन्द्र बोले— [हे माता!] क्या सरस्वतीके बिना ब्रह्मा इस विश्वकी सृष्टि करनेमें, लक्ष्मीके बिना विष्णु पालन करनेमें और पार्वतीके बिना शिवजी संहार करनेमें समर्थ हो सकते हैं? वे महान् देवगण उन्हीं [तीनों महाशक्तियों]-के साथ अपना-अपना कार्य कर सकनेमें समर्थ होते हैं॥ १९॥ |