देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १९ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९३ | | :--- | :--- |
| विष्णुरुवाच<br>कर्तुं प्रभुनं द्रुहिणो न कदाचनाहं<br>नापीश्वरस्तव कलारहितस्त्रिलोक्याः।<br>कर्तुं प्रभुत्वमनघेऽत्र तथा विहर्तुं<br>त्वं वै समस्तविभवेश्वरि भासि नूनम्॥ २० | विष्णु बोले—हे अनघे! आपकी कलासे रहित होकर न तो ब्रह्मा इस त्रिलोकीकी रचना कर सकनेमें, न तो मैं इसका पालन कर सकनेमें और न तो शिव इसका संहार कर सकनेमें समर्थ हैं। हे समस्त विभवोंकी स्वामिनि! इसका सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ निश्चितरूपसे आप ही प्रतीत होती हैं॥ २०॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी तानाह विबुधेश्वरान्।<br>किं तत्कार्यं वदन्त्वद्य करोमि विगतज्वराः॥ २१<br>असाध्यमपि लोकेऽस्मिंस्तत्करोमि सुरेप्सितम्।<br>शंसन्तु भवतां दुःखं धरायाश्च सुरोत्तमाः॥ २२ | व्यासजी बोले—इस प्रकार उन देवताओंने जब देवीकी स्तुति की, तब उन्होंने उन देवेश्वरोंसे कहा—वह कौन-सा कार्य है? आपलोग सन्तापरहित होकर बतायें, मैं अभी करूँगी। इस संसारमें देवताओंके द्वारा अभिलषित जो असाध्य कार्य भी होगा, उसे मैं करूँगी। हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग अपना तथा पृथ्वीका दुःख मुझे बताइये॥ २१-२२॥ | | देवा ऊचुः<br>वसुधेयं भराक्रान्ता सम्प्राप्ता विबुधान्प्रति।<br>रुदती वेपमाना च पीडिता दुष्टभूभुजैः॥ २३<br>भारापहरणं चास्याः कर्तव्यं भुवनेश्वरि।<br>देवानामीप्सितं कार्यमेतदेवाधुना शिवे॥ २४<br>घातितस्तु पुरा मातस्त्वया महिषरूपधृक्।<br>दानवोऽतिबलाक्रान्तस्तत्सहायाश्च कोटिशः॥ २५<br>तथा शुम्भो निशुम्भश्च रक्तबीजस्तथापरः।<br>चण्डमुण्डौ महावीर्यौ तथैव धूम्रलोचनः॥ २६<br>दुर्मुखो दुःसहश्चैव करालश्चाति वीर्यवान्।<br>अन्ये च बहवः क्रूरास्त्वयैव च निपातिताः॥ २७<br>तथैव च सुरारींश्च जहि सर्वान्महीश्वरान्।<br>(भारं हर धरायाश्च दुर्धरं दुष्टभूभुजाम्।) | देवता बोले—दुष्ट राजाओंसे पीड़ित यह पृथ्वी उनके भारसे व्याकुल होकर रोती तथा थर-थर काँपती हुई हम देवताओंके पास आयी। हे भुवनेश्वरि! आप इसका भार उतार दें। हे शिवे! इस समय हम देवताओंका यही अभीष्ट कार्य है॥ २३-२४॥<br>हे माता! पूर्वकालमें आप अत्यधिक बलसम्पन्न दानव महिषासुरका वध कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त आप उसके करोड़ों सहायकों, शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज, महाबली चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, दुर्मुख, दुःसह, अतिशय बलवान् कराल तथा दूसरे भी अनेक क्रूर दानवोंको मार चुकी हैं। उसी प्रकार आप हम देवताओंके शत्रुरूप सभी दुष्ट राजाओंका वध कीजिये। (दुष्ट राजाओंका वध करके पृथ्वीका दुःसह भार उतार दीजिये)॥ २५-२७ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी देवानाहाम्बिका शिवा॥ २८<br>सम्प्रहस्यासितापाङ्गी मेघगम्भीरया गिरा। | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] देवताओंके ऐसा कहनेपर नीले नेत्रप्रान्तवाली कल्याणमयी भगवती हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे कहने लगीं—॥ २८ १/२॥ | | श्रीदेव्युवाच<br>मयेदं चिन्तितं पूर्वमंशावतरणं सुराः॥ २९<br>भारावतरणं चैव यथा स्याद्दुष्टभूभुजाम्।<br>मया सर्वे निहन्तव्या दैत्येशा ये महीभुजः॥ ३० | श्रीदेवी बोलीं—हे देवताओ! मैंने यह पहलेसे ही सोच रखा है कि मैं अंशावतार धारण करूँ, जिससे पृथ्वीपरसे दुष्ट राजाओंका भार उतर जाय। हे महाभाग देवताओ! मन्द तेजवाले जरासन्ध आदि जो बड़े-बड़े दैत्य राजागण हैं, उन सबको मैं अपनी |