भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 503
४९४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मागधाद्या महाभागाः स्वशक्त्या मन्दतेजसः।<br>भवद्भिरपि स्वैरंशैरवतीर्य धरातले॥ ३१शक्तिसे मार डालूँगी। हे देवतागण! आपलोग भी अपने-अपने अंशोंसे पृथ्वीपर अवतार लेकर मेरी शक्तिसे युक्त होकर भार उतारें॥ २९-३१ १/२॥
मच्छक्तियुक्तैः कर्तव्यं भारावतरणं सुराः।<br>कश्यपो भार्यया सार्धं दिविजानां प्रजापतिः॥ ३२मेरे अवतार लेनेसे पूर्व देवताओंके प्रजापति कश्यप अपनी पत्नीके साथ यदुकुलमें वसुदेव नामसे अवतीर्ण होंगे। उसी प्रकार भृगुके शापसे अविनाशी भगवान् विष्णु अपने अंशसे वहींपर वसुदेवके पुत्रके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ३२-३३ १/२॥
यादवानां कुले पूर्वं भवितानकदुन्दुभिः।<br>तथैव भृगुशापाद्वै भगवान्विष्णुरव्ययः॥ ३३
अंशेन भविता तत्र वसुदेवसुतो हरिः।<br>तदाहं प्रभविष्यामि यशोदायां च गोकुले॥ ३४हे श्रेष्ठ देवताओ! उस समय मैं भी गोकुलमें यशोदाके गर्भसे उत्पन्न होऊँगी और देवताओंका सारा कार्य सिद्ध करूँगी। कारागारमें अवतीर्ण हुए [कृष्णरूपधारी] विष्णुको मैं गोकुलमें पहुँचा दूँगी और देवकीके गर्भसे शेषभगवान्‌को खींचकर रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दूँगी। मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे दोनों ही दुष्टोंका विनाश करेंगे। द्वापरके व्यतीत होते ही दुष्ट राजाओंका पूर्णरूपसे संहार बिलकुल निश्चित है॥ ३४-३६ १/२॥
कार्यं सर्वं करिष्यामि सुराणां सुरसत्तमाः।<br>कारागारे गतं विष्णुं प्रापयिष्यामि गोकुले॥ ३५
शेषं च देवकीगर्भात्प्रापयिष्यामि रोहिणीम्।<br>मच्छक्त्योपचितौ तौ च कर्तारौ दुष्टसंक्षयम्॥ ३६
दुष्टानां भूभुजां कामं द्वापरान्ते सुनिश्चितम्।<br>इन्द्रांशोऽप्यर्जुनः साक्षात्करिष्यति बलक्षयम्॥ ३७साक्षात् इन्द्रके अंशस्वरूप अर्जुन भी [उन दुष्ट राजाओंके] बलका नाश करेंगे। धर्मके अंशरूप महाराज युधिष्ठिर, वायुके अंशरूप भीमसेन तथा दोनों अश्विनीकुमारोंके अंशरूप नकुल-सहदेव भी उत्पन्न होंगे। [उसी समय] वसुके अंशसे अवतीर्ण गङ्गापुत्र भीष्म उन दुष्ट राजाओंकी शक्ति नष्ट करेंगे॥ ३७-३८ १/२॥
धर्मांशोऽपि महाराजो भविष्यति युधिष्ठिरः।<br>वाय्वंशो भीमसेनश्चाश्विन्यंशौ च यमावपि॥ ३८
वसोरांशोऽथ गाङ्गेयः करिष्यति बलक्षयम्।<br>व्रजन्तु च भवन्तोऽद्य धरा भवतु सुस्थिरा॥ ३९हे श्रेष्ठ देवतागण! अब आपलोग जायँ और पृथ्वी भी निश्चिन्त होकर रहे। मैं उन अंशावतारी लोगोंको निमित्तमात्र बनाकर अपनी शक्तिसे इस पृथ्वीका भार दूर करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है। मैं क्षत्रियोंका यह संहार कुरुक्षेत्रमें करूँगी॥ ३९-४० १/२॥
भारावतरणं नूनं करिष्यामि सुरोत्तमाः।<br>कृत्वा निमित्तमात्रांस्तान्स्वशक्त्याहं न संशयः॥ ४०
कुरुक्षेत्रे करिष्यामि क्षत्रियाणां च संक्षयम्।<br>असूयेर्ष्या मतिस्तृष्णा ममताभिमता स्पृहा॥ ४१असूया, ईर्ष्या, बुद्धि, तृष्णा, ममता, अपनी प्रिय वस्तुकी इच्छा, स्पृहा, विजयकी अभिलाषा, काम और मोह—इन दोषोंके कारण सभी यादव नष्ट हो जायँगे। ब्राह्मणके शापसे उनके वंशका नाश हो जायगा और उसी शापवश भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने शरीरका त्याग कर देंगे। अब आपलोग भी अपनी शक्तिस्वरूपा भार्याओंसहित अपने-अपने अंशोंसे मथुरा तथा गोकुलमें अवतरित हों और शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णुके सहायक बनें॥ ४१-४३ १/२॥
जिगीषा मदनो मोहो दोषैर्नङ्क्ष्यन्ति यादवाः।<br>ब्राह्मणस्य च शापेन वंशनाशो भविष्यति॥ ४२
भगवानपि शापेन त्यक्ष्यत्येतत्कलेवरम्।<br>भवन्तोऽपि निजाङ्गैश्च सहायाः शार्ङ्गधन्वनः॥ ४३
प्रभवन्तु सनारीका मथुरायां च गोकुले।