देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 504, कुल 889 में से
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| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४१५ |
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| व्यास उवाच | |
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| इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी योगमाया परात्मनः ॥ ४४<br>सधरा वै सुराः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि च।<br>धरापि सुस्थिरा जाता तस्या वाक्येन तोषिता ॥ ४५<br>ओषधीवीरुधोपेता बभूव जनमेजय।<br>प्रजाश्च सुखिनो जाता द्विजाश्चापुर्महोदयम्।<br>सन्तुष्टा मुनयः सर्वे बभूवुर्धर्मतत्पराः ॥ ४६ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर परमात्माकी योगमाया भगवती अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर पृथ्वीसहित सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। पृथ्वी भी उन भगवतीकी वाणीसे सन्तुष्ट होकर शान्तचित्त हो गयी। हे जनमेजय! वह औषधियों और लताओंसे सम्पन्न हो गयी। प्रजाएँ सुखी हो गयीं, द्विजगणोंकी महान् उन्नति होने लगी और सभी मुनिगण सन्तुष्ट होकर धर्मपरायण हो गये ॥ ४४—४६ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवान् प्रति देवीवाक्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
अथ विंशोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा जनमेजयको भगवतीकी महिमा सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| शृणु भारत वक्ष्यामि भारावतरणं तथा।<br>कुरुक्षेत्रे प्रभासे च क्षपितं योगमायया ॥ १ | हे भारत! सुनिये, अब मैं आपको पृथ्वीका भार उतारने और कुरुक्षेत्र तथा प्रभासक्षेत्रमें योगमायाके द्वारा सेनाके संहारका वृत्तान्त बताऊँगा ॥ १ ॥ |
| यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरमिततेजसः।<br>भृगुशापप्रतापेन महामायाबलेन च ॥ २<br><br>क्षितिभारसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः।<br>मायया विहितो योगो विष्णोर्जन्म धरातले ॥ ३ | भृगुके शापके प्रताप तथा महामायाकी शक्तिसे ही अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुका आविर्भाव यदुवंशमें हुआ था। मेरा यह मानना है कि पृथ्वीका भार उतारना तो निमित्तमात्र था, वस्तुतः योगमायाने ही इस संयोगका विधान कर दिया था कि धरातलपर भगवान् विष्णुका अवतार हो ॥ २-३ ॥ |
| किं चित्रं नृप देवी सा ब्रह्मविष्णुसुरानपि।<br>नर्तयत्यनिशं माया त्रिगुणानपरानकिमु ॥ ४ | हे राजन्! इसमें आश्चर्य कैसा! वे भगवती योगमाया जब ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंको भी निरन्तर नचाती रहती हैं, तब त्रिगुणात्मक सामान्यजनकी क्या बात ! ॥ ४ ॥ |
| गर्भवासोद्भवं दुःखं विण्मूत्रस्नायुसंयुतम्।<br>विष्णोरापादितं सम्यग्यया विगतलीलया ॥ ५ | उन भगवतीने अपनी रहस्यमयी लीलासे भगवान् विष्णुको भी सम्यक् रूपसे मल, मूत्र तथा स्नायुसे भरे गर्भवाससे होनेवाला दुःख भोगनेको विवश कर दिया था ॥ ५ ॥ |
| पुरा रामावतारेऽपि निर्जरा वानराः कृताः।<br>विदितं ते यथा विष्णुर्दुःखपाशेन मोहितः ॥ ६ | पूर्वकालमें रामावतारके समय भी उन्हीं योगमायाने जिस प्रकार देवताओंको वानर बना दिया था और [राम-रूपमें अवतीर्ण] भगवान् विष्णुको दुःखपाशसे व्यथित कर दिया था, वह तो आपको विदित ही है ॥ ६ ॥ |