भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 505
४९६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अहं ममेति पाशेन सुदृढेन नराधिप।<br>योगिनो मुक्तसङ्गाश्च भुक्तिकाम मुमुक्षवः ॥ ७<br><br>तामेव समुपासन्ते देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्।<br>यद्भक्तिलेशलेशांशलेशलेशलवांशकम् ॥ ८<br><br>लब्ध्वा मुक्तो भवेजन्तुस्तां न सेवेत को जनः।<br>भुवनेशीत्येव वक्त्रे ददाति भुवनत्रयम्॥ ९<br><br>मां पाहीत्यस्य वचसो देयाभावादृणान्विता।<br>विद्याविद्येति तस्या द्वे रूपे जानीहि पार्थिव ॥ १०हे महाराज ! अहंता और ममताके इस सुदृढ़ बन्धनसे सभी लोग आबद्ध हैं। अतः अनासक्त तथा मोक्षकी इच्छा रखनेवाले योगीजन और भोगकी कामना करनेवाले लोग भी उन्हीं कल्याणकारिणी भगवती जगदम्बाकी उपासना करते हैं। जिन योगमायाकी भक्तिके लेशलेशांशके लेशलेशलवांशको प्राप्त करके प्राणी मुक्त हो जाता है, उनकी उपासना कौन व्यक्ति नहीं करेगा ? ‘हे भुवनेशि!’ ऐसा उच्चारण करनेवालेको वे भगवती तीनों लोक प्रदान कर देती हैं और ‘मेरी रक्षा कीजिये’ इस वाक्यके कहनेपर [उसे पहले ही त्रिलोक दे देनेके कारण] अब कुछ भी न दे पानेसे वे उस भक्तकी ऋणी हो जाती हैं। हे राजन् ! आप उन भगवतीके विद्या तथा अविद्या—ये दो रूप जानिये। विद्यासे प्राणी मुक्त होता है और अविद्यासे बन्धनमें पड़ता है॥ ७—१० १/२ ॥
विद्याया मुच्यते जन्तुर्बध्यतेऽविद्यया पुनः।<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वे तस्या वशानुगाः ॥ ११<br><br>अवताराः सर्व एव यन्त्रिता इव दामभिः।<br>कदाचिच्च सुखं भुंक्ते वैकुण्ठे क्षीरसागरे ॥ १२<br><br>कदाचित्कुरुते युद्धं दानवैर्बलवत्तरैः।<br>हरिः कदाचिद्यज्ञान्वै विततान्प्रकरोति च ॥ १३<br><br>कदाचिच्च तपस्तीव्रं तीर्थे चरति सुव्रत।<br>कदाचिच्छयने शेते योगनिद्रामुपाश्रितः ॥ १४ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये सब उनके अधीन रहते हैं। भगवान्‌के सभी अवतार रस्सीसे बँधे हुएके समान भगवतीसे ही नियन्त्रित रहते हैं। भगवान् विष्णु कभी वैकुण्ठमें और कभी क्षीरसागरमें आनन्द लेते हैं, कभी अत्यधिक बलशाली दानवोंके साथ युद्ध करते हैं, कभी बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं, कभी तीर्थमें कठोर तपस्या करते हैं और हे सुव्रत ! कभी योगनिद्राके वशीभूत होकर शय्यापर सोते हैं। वे भगवान् मधुसूदन कभी भी स्वतन्त्र नहीं रहते॥ ११—१४ १/२ ॥
न स्वतन्त्रः कदाचिच्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तथा ब्रह्मा तथा रुद्रस्तथेन्द्रो वरुणो यमः॥ १५<br><br>कुबेरोऽग्नी रवीन्दू च तथान्ये सुरसत्तमाः।<br>मुनयः सनकाद्याश्च वसिष्ठाद्यास्तथापरे॥ १६<br><br>सर्वेऽम्बावशगा नित्यं पाञ्चालीव नरस्य च।<br>नसि प्रोता यथा गावो विचरन्ति वशानुगाः॥ १७ऐसे ही ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अन्य श्रेष्ठ देवतागण, सनक आदि मुनि और वसिष्ठ आदि महर्षि—ये सब-के-सब बाजीगरके अधीन कठपुतलीकी भाँति सदा भगवतीके वशमें रहते हैं। जिस प्रकार नथे हुए बैल अपने स्वामीके अधीन रहकर विचरण करते हैं, उसी प्रकार सभी देवता कालपाशमें आबद्ध रहते हैं॥ १५—१७ १/२ ॥
तथैव देवताः सर्वाः कालपाशनियन्त्रिताः।<br>हर्षशोकादयो भावा निद्रातन्द्रालसादयाः ॥ १८<br><br>सर्वेषां सर्वदा राजन्देहिनां देहसंश्रिताः।<br>अमरा निर्जराः प्रोक्ता देवाश्च ग्रन्थकारकैः॥ १९हे राजन् ! हर्ष, शोक, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य आदि भाव सभी देहधारियोंके शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं। ग्रन्थकारोंने देवताओंको अमर (मृत्युरहित) तथा निर्जर (बुढ़ापारहित) कहा है, किंतु वे निश्चय ही केवल नामसे अमर हैं, अर्थसे कभी भी वैसे नहीं हैं।