देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| कंस उवाच<br>सुतमानय देवक्या वसुदेव महामते॥ ३९<br>मृत्युर्मे चाष्टमो गर्भस्तन्निहन्मि रिपुं हरिम्। | कंस बोला—हे महामतिसम्पन्न वसुदेव! देवकीके पुत्रको यहाँ ले आओ। देवकीका आठवाँ गर्भ मेरी मृत्यु है, अतः मैं उस विष्णुरूप अपने शत्रु का वध करूँगा॥ ३९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा कंसवचः शौरिर्भयत्रस्तविलोचनः॥ ४०<br>तामादाय सुतां पाणौ ददौ चाशु रुदन्निव।<br>दृष्ट्वाथ दारिकां राजा विस्मयं परमं गतः॥ ४१ | व्यासजी बोले—कंसका वचन सुनकर भयसे सन्त्रस्त नयनोंवाले वसुदेवजीने शीघ्र ही उस कन्याको ले जाकर कंसके हाथोंमें रोते हुए रख दिया। उस बालिकाको देखकर राजा कंस बड़ा विस्मित हुआ॥ ४०-४१॥ |
| देववाणी वृथा जाता नारदस्य च भाषितम्।<br>वसुदेवः कथं कुर्यादनृतं सङ्कटे स्थितः॥ ४२<br>रक्षपालाश्च मे सर्वे सावधाना न संशयः।<br>कुतोऽत्र कन्यका कामं क्व गतः स सुतः किल॥ ४३<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः कालस्य विषमा गतिः। | आकाशवाणी तथा नारदजीका वचन—दोनों ही मिथ्या सिद्ध हुए और यहाँ संकटकी स्थितिमें पड़ा हुआ यह वसुदेव भी झूठी बात भला कैसे बना सकता है? मेरे सभी रक्षक भी सावधान थे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। तब यह बालिका कहाँसे आ गयी और वह बालक कहाँ चला गया? कालकी बड़ी विषम गति होती है, अतएव इसके सम्बन्धमें अब किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४२-४३ १/२॥ |
| इति सञ्चिन्त्य तां बालां गृहीत्वा पादयोः खलः॥ ४४<br>पोथयामास पाषाणे निर्घृणः कुलपांसनः।<br>सा करान्निःसृता बाला ययावाकाशमण्डलम्॥ ४५<br>दिव्यरूपा तदा भूत्वा तमुवाच मृदुस्वना।<br>किं मया हतया पाप जातस्ते बलवान् रिपुः॥ ४६<br>हनिष्यति दुराराध्यः सर्वथा त्वां नराधमम्।<br>इत्युक्त्वा सा गता कन्या गगनं कामगा शिवा॥ ४७ | ऐसा सोचकर उस दुष्ट, निर्मम तथा कुलकलंकी कंसने बालिकाके दोनों पैर पकड़कर पत्थरपर पटका। किंतु वह कन्या कंसके हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी। वहाँ दिव्य रूप धारण करके उस कन्याने मधुर स्वरमें उससे कहा—'अरे पापी! मुझे मारनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा; तेरा महाबलशाली शत्रु तो जन्म ले चुका है। वे दुराराध्य परमपुरुष तुझ नराधमका वध अवश्य करेंगे।' ऐसा कहकर स्वेच्छा-विहारिणी तथा कल्याणकारिणी भगवतीस्वरूपा वह कन्या आकाशमें चली गयी॥ ४४—४७॥ |
| कंसस्तु विस्मयाविष्टो गतो निजगृहं तदा।<br>आनाय्य दानवान्सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥ ४८ | यह सुनकर आश्चर्यसे युक्त कंस अपने महलके लिये प्रस्थान कर गया। वहाँ बकासुर, धेनुकासुर तथा वत्सासुर आदि दानवोंको बुलवाकर अत्यन्त कुपित तथा भयाक्रान्त कंसने उनसे कहा—हे दानवो! मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम सभी यहाँसे अभी प्रस्थान करो और जहाँ कहीं भी तुमलोगोंको नवजात शिशु मिलें, उन्हें अवश्य मार डालना। बालघातिनी यह पूतना अभी नन्दराजके गोकुलमें चली जाय। वहाँ सद्यःप्रसूत जितने बालक मिलें, उन्हें यह पूतना मेरी आज्ञासे मार डाले। धेनुक, वत्सक, केशी, प्रलम्ब और बक—ये समस्त असुर मेरा कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ निरन्तर विद्यमान रहें॥ ४८—५१ १/२॥ |
| बकधेनुकवत्सादीन्क्रोधाविष्टो भयातुरः।<br>गच्छन्तु दानवाः सर्वे मम कार्यार्थसिद्धये॥ ४९<br>जातमात्राश्च हन्तव्या बालका यत्र कुत्रचित्।<br>पूतनैषा व्रजत्वद्य बालघ्नी नन्दगोकुलम्॥ ५०<br>जातमात्रान्विनिघ्नन्ती शिशूंस्तत्र ममाज्ञया।<br>धेनुको वत्सकः केशी प्रलम्बो बक एव च॥ ५१<br>सर्वे तिष्ठन्तु तत्रैव मम कार्यचिकीर्षया। |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 D