भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 889 में से

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पृष्ठ 526

अ० २४ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१७

इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसो ययौ निजगृहं खलः॥ ५२<br><br>चिन्ताविष्टोऽतिदीनात्मा चिन्तयित्वैव तं पुनः॥ ५३इस प्रकार सभी दैत्योंको आदेश देकर वह दुष्ट कंस अपने भवनमें चला गया। अपने शत्रुरूप उस बालकके विषयमें बार-बार सोचकर वह अत्यन्त चिन्तातुर तथा खिन्नमनस्क हो गया॥ ५२-५३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कंसं प्रति योगमायावाक्यं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥


अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
प्रातर्नन्दगृहे जातः पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>किंवदन्त्यथ कंसेन श्रुता चारमुखादपि॥ १[हे राजन्!] प्रातःकाल नन्दजीके घरमें पुत्रजन्मका बड़ा भारी समारोह सम्पन्न हुआ, यह बात चारों ओर फैल गयी और कंसने भी किसी दूतके मुखसे यह सुन लिया॥ १॥
जानाति वसुदेवस्य दारास्तत्र वसन्ति हि।<br>पशवो दासवर्गश्च सर्वे ते नन्दगोकुले॥ २<br><br>तेन शङ्कासमाविष्टो गोकुलं प्रति भारत।<br>नारदेनापि तत्सर्वं कथितं कारणं पुरा॥ ३<br><br>गोकुले ये च नन्दाद्यास्तत्पत्न्यश्च सुरांशजाः।<br>देवकीवसुदेवाद्याः सर्वे ते शत्रवः किल॥ ४कंस यह पहलेसे ही जानता था कि वसुदेवकी अन्य भार्या, पशु तथा सेवकगण—सब-के-सब गोकुलमें नन्दके यहाँ रह रहे हैं। हे भारत! इस कारणसे गोकुलके प्रति कंसका सन्देह और बढ़ गया। नारदजीने भी सभी कारण पहले ही बता दिये थे। उन्होंने कह दिया था कि गोकुलमें नन्द आदि गोप, उनकी पत्नियाँ, देवकी तथा वसुदेव आदि जो भी लोग हैं, वे सब देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये वे निश्चितरूपसे तुम्हारे शत्रु हैं॥ २—४॥
इति नारदवाक्येन बोधितोऽसौ कुलाधमः।<br>जातः कोपमना राजन् कंसः परमपापकृत्॥ ५हे राजन्! देवर्षि नारदने जब यह बात बतायी थी तो बड़े-से-बड़े पापकर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाला वह कुलकलंकी कंस अत्यधिक कुपित हो गया था॥ ५॥
पूतना निहता तत्र कृष्णेनामिततेजसा।<br>बको वत्सासुरश्चापि धेनुकश्च महाबलः॥ ६<br><br>प्रलम्बो निहतस्तेन तथा गोवर्धनो धृतः।<br>श्रुत्वैतत्कर्म कंसस्तु मेने मरणमात्मनः॥ ७अपरिमित तेजवाले श्रीकृष्णने पूतना, बकासुर, वत्सासुर, महाबली धेनुकासुर तथा प्रलम्बासुरको मार डाला और गोवर्धनपर्वतको उठा लिया—इस अद्भुत कर्मको सुनकर कंसने यह अनुमान लगा लिया कि मेरा भी मरण अब सुनिश्चित है॥ ६-७॥
तथा विनिहतः केशी ज्ञात्वा कंसोऽतिदुर्मनाः।<br>धनुर्यागमिषेणाशु तावानेतुं प्रचक्रमे॥ ८[महान् बलशाली] केशी भी मार डाला गया—यह जानकर कंस अत्यधिक खिन्नमनस्क हो गया, तब उसने धनुष-यज्ञके बहाने [कृष्ण तथा बलराम] दोनोंको शीघ्र ही मथुरामें बुलानेकी योजना बनायी॥ ८॥
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