देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 528, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 528
अ० २४] चतुर्थ स्कन्ध ५१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा यवनमायान्तं कृष्णः सर्वान् यदूत्तमान्।<br>आनाय्य च तथा राममुवाच मधुसूदनः॥ २०<br><br>भयं नोऽत्र समुत्पन्नं जरासन्धान्महाबलात्।<br>किं कर्तव्यं महाभाग यवनः समुपैति वै॥ २१ | कालयवनको आता सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने सभी प्रसिद्ध यादवों तथा बलरामको बुलाकर कहा— महाबलशाली जरासन्धसे हमलोगोंको यहाँ बराबर भय बना हुआ है। [उसीकी प्रेरणासे] कालयवन यहाँ आ रहा है। हे महाभाग! ऐसी स्थितिमें हमलोगोंको क्या करना चाहिये?॥ २०–२१॥ |
| प्राणत्राणं प्रकर्तव्यं त्यक्त्वा गेहं बलं धनम्।<br>सुखेन स्थीयते यत्र स देशः खलु पैतृकः॥ २२ | इस समय घर, सेना और धन छोड़कर हमें प्राण बचा लेना चाहिये। जहाँ भी सुखपूर्वक रहनेका प्रबन्ध हो जाय, वही पैतृक देश होता है॥ २२॥ |
| सदोद्वेगकरः कामं किं कर्तव्यः कुलोचितः।<br>शैलसागरसान्निध्ये स्थातव्यं सुखमिच्छता॥ २३ | इसके विपरीत उत्तम कुलके निवास करनेयोग्य पैतृक भूमिमें भी यदि सदा अशान्ति बनी रहती हो तो ऐसे स्थानपर रहनेसे क्या लाभ? अतः सुखकी कामना करनेवालेको पर्वत या समुद्रके पास निवास कर लेना चाहिये॥ २३॥ |
| यत्र वैरिभयं न स्यात्स्थातव्यं तत्र पण्डितैः।<br>शेषशय्यां समाश्रित्य हरिः स्वपिति सागरे॥ २४<br><br>तथैव च भयाद्धीतः कैलासे त्रिपुरार्दनः।<br>तस्मान्नात्रैव स्थातव्यमस्माभिः शत्रुतापितैः॥ २५<br><br>द्वारवत्यां गमिष्यामः सहिताः सर्व एव वै।<br>कथिता गरुडेनाद्य रम्या द्वारवती पुरी॥ २६<br><br>रैवताचलासान्निध्ये सिन्धुकूले मनोहरा। | जिस स्थानपर शत्रुओंका भय नहीं रहता, ऐसे स्थानपर ही विज्ञजनोंको रहना चाहिये। भगवान् विष्णु शेषशय्याका आश्रय लेकर समुद्रमें शयन करते हैं और इसी प्रकार त्रिपुरदमन भगवान् शंकर भी कैलासपर्वतपर निवास करते हैं। अतएव शत्रुओंद्वारा निरन्तर सन्तप्त किये गये हमलोगोंको अब यहाँ नहीं रहना चाहिये। अब हम सभी लोग एक साथ द्वारकापुरी चलेंगे। गरुडने मुझसे बताया है कि द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीक तथा मनोहर है, जो समुद्रके तटपर तथा रैवतपर्वतके समीप विराजमान है॥ २४–२६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br><br>तच्छ्रुत्वा वचनं तथ्यं सर्वे यादवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>गमनाय मतिं चक्रुः सकुदुम्बाः सवाहनाः।<br>शकटानि तथोष्ट्रांश्च वाम्यश्च महिषास्तथा॥ २८<br><br>धनपूर्णानि कृत्वा ते निर्ययुर्नगराद् बहिः।<br>रामकृष्णौ पुरस्कृत्य सर्वे ते सपरिच्छदाः॥ २९<br><br>अग्रे कृत्वा प्रजाः सर्वाश्चेलुः सर्वे यदूत्तमाः।<br>कतिचिद्दिवसैः प्रापुः पुरीं द्वारवतीं किल॥ ३० | व्यासजी बोले— श्रीकृष्णकी यह युक्तिपूर्ण बात सुनकर सभी श्रेष्ठ यादवोंने अपने परिवारजनों तथा वाहनोंके साथ जानेका निश्चय कर लिया। गाड़ियों, ऊँटों, घोड़ियों और भैंसोंपर धन-सामग्री लादकर तथा श्रीकृष्ण और बलरामको आगे करके वे सभी यादवश्रेष्ठ अपने परिजनोंको साथ लेकर नगरसे बाहर हो गये। समस्त प्रजाजनोंको आगे-आगे करके सभी श्रेष्ठ यादव चल पड़े। वे सब कुछ ही दिनोंमें द्वारकापुरी पहुँच गये॥ २७–३०॥ |
| शिल्पिभिः कारयामास जीर्णोद्धारं हि माधवः।<br>संस्थाप्य यादवांस्तत्र तावेतौ बलकेशवौ॥ ३१ | श्रीकृष्णने कुशल शिल्पकारोंसे द्वारकापुरीका जीर्णोद्धार कराया, सभी यादवोंको वहाँ बसाकर वे श्रीकृष्ण और बलराम तत्काल मथुरा लौटकर उस |