देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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५२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रूहि तत्कारणं ब्रह्मन् ज्ञातं केशवेन यत्।<br>हरणं तत्रसंस्थेन शिशोर्वा सूतिकागृहात्॥ ५ | हे ब्रह्मन्! वहाँ द्वारकापुरीमें वासुदेव श्रीकृष्णके विद्यमान रहते हुए भी सूतिका-गृहसे बच्चेके हरणकी जानकारी उन्हें नहीं हो सकी; मुझे इसका कारण बताइये॥ ५॥ |
| व्यास उवाच<br>माया बलवती राजन्नराणां बुद्धिमोहिनी।<br>शाम्भवी विश्रुता लोके को वा मोहं न गच्छति॥ ६ | व्यासजी बोले—हे राजन्! प्राणियोंके बुद्धिको विमोहित कर देनेवाली माया बड़ी बलवती होती है; यह शाम्भवी नामसे प्रसिद्ध है। संसारमें कौन-सा प्राणी है, जो [इस मायाके प्रभावसे] मोहित नहीं हो जाता है॥ ६॥ |
| मानुषं जन्म सम्प्राप्य गुणाः सर्वेऽपि मानुषाः।<br>भवन्ति देहजाः कामं न देवा नासुरास्तदा॥ ७ | मनुष्य-जन्म पाते ही प्राणीमें समस्त मानवोचित गुण उत्पन्न हो जाते हैं। ये सभी गुण देहसे सम्बन्ध रखते हैं। देवता अथवा दानव—कोई भी इससे परे नहीं है॥ ७॥ |
| क्षुत्तृण्निद्रा भयं तन्द्रा व्यामोहः शोकसंशयः।<br>हर्षश्चैवाभिमानश्च जरामरणमेव च॥ ८<br><br>अज्ञानं ग्लानिरप्रीतिरीर्ष्यासूया मदः श्रमः।<br>एते देहभवा भावाः प्रभवन्ति नराधिप॥ ९ | भूख, प्यास, निद्रा, भय, तन्द्रा, व्यामोह, शोक, सन्देह, हर्ष, अभिमान, बुढ़ापा, मृत्यु, अज्ञान, ग्लानि, वैर, ईर्ष्या, परदोषदृष्टि, मद और थकावट—ये देहके साथ उत्पन्न होते हैं। हे राजन्! ये भाव सभीपर अपना प्रभाव डालते हैं॥ ८-९॥ |
| यथा हेममृगं रामो न बुबोध पुरोगतम्।<br>जानक्या हरणञ्चैव जटायुमरणं तथा॥ १० | जिस प्रकार श्रीराम अपने समक्ष विचरणशील स्वर्ण-मृगकी वास्तविकताको नहीं जान पाये और वे सीताहरण तथा जटायुमरणकी घटना भी नहीं जान सके॥ १०॥ |
| अभिषेकदिने रामो वनवासं न वेद च।<br>तथा न ज्ञातवान् रामः स्वशोकान्मरणं पितुः॥ ११ | श्रीराम यह भी नहीं जान सके कि अभिषेकके दिन ही उन्हें वनवास होगा और वे अपने वियोगजनित शोकसे पिताकी मृत्यु भी नहीं जान पाये॥ ११॥ |
| अज्ञवद्विचचारासौ पश्यमानो वने वने।<br>जानकीं न विवेदाथ रावणेन हृतां बलात्॥ १२ | रावणके द्वारा बलपूर्वक हरी गयी सीताके सम्बन्धमें श्रीराम कुछ भी नहीं जान सके थे और एक अज्ञानी पुरुषकी भाँति उन्हें खोजते हुए वन-वनमें भटकते रहे॥ १२॥ |
| सहायान् वानरान्कृत्वा हत्वा शक्रसुतं बलात्।<br>सागरे सेतुबन्धञ्च कृत्वोत्तीर्य सरित्पतिम्॥ १३<br><br>प्रेषयामास सर्वासु दिक्षु तान्कपिपुङ्गवान्।<br>संग्रामं कृतवान्घोरं दुःखं प्राप रणाजिरे॥ १४ | तदनन्तर उन्होंने बलपूर्वक वालीका वध करके वानरोंको अपना सहायक बनाकर सागरपर सेतु बाँधा और पुनः उस समुद्रको पार करके उन्होंने सभी दिशाओंमें बड़े-बड़े शूरवीर वानरोंको भेजा। तत्पश्चात् संग्रामभूमिमें रावणके साथ घोर युद्ध किया, जिसमें उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ा॥ १३-१४॥ |
| बन्धनं नागपाशेन प्राप रामो महाबलः।<br>गरुडान्मोक्षणं पश्चादन्वभूद्रघुनन्दनः॥ १५ | महाबली होते हुए भी श्रीरामको नागपाशमें बँधना पड़ा; बादमें गरुड़की सहायतासे वे रघुनन्दन बन्धनमुक्त हुए॥ १५॥ |