भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 534
अ० २५ ]चतुर्थ स्कन्ध५२५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहनद्रावणं संख्ये कुम्भकर्णं महाबलम्।<br>मेघनादं निकुम्भञ्च कुपितो रघुनन्दनः॥ १६श्रीरामने कोप करके समरभूमिमें रावण, महाबली कुम्भकर्ण, मेघनाद तथा निकुम्भका संहार किया॥ १६॥
अदूष्यत्वञ्च जानक्या न विवेद जनार्दनः।<br>दिव्यञ्च कारयामास ज्वलितेऽग्नौ प्रवेशनम्॥ १७भगवान् श्रीरामको जानकीकी निर्दोषताका भी परिज्ञान नहीं हो सका और उन्होंने शुद्धताकी परीक्षाहेतु प्रज्वलित अग्निमें उनका प्रवेश कराया॥ १७॥
लोकापवादाच्च परं ततस्तत्याज तां प्रियाम्।<br>अदूष्यां दूषितां मत्वा सीतां दशरथात्मजः॥ १८तत्पश्चात् दशरथपुत्र श्रीरामने परम पवित्र तथा प्रिय सीताको लोकनिन्दाके भयसे दूषित मानकर उनका परित्याग कर दिया॥ १८॥
न ज्ञातौ स्वसुतौ तेन रामेण च कुशीलवौ।<br>मुनिना कथितौ तौ तु तस्य पुत्रौ महाबलौ॥ १९वे श्रीराम अपने पुत्रों लव-कुशको नहीं पहचान सके। बादमें महर्षि वाल्मीकिने उन्हें बताया कि वे दोनों महाबली बालक उन्हींके पुत्र हैं॥ १९॥
पातालगमनं चैव जानक्या ज्ञातवान्न च।<br>राघवः कोपसंयुक्तो भ्रातरं हन्तुमुद्यतः॥ २०वे रघुनन्दन श्रीराम सीताके पाताल जानेकी भी बात नहीं जान पाये। वे कुपित होकर भाईका वध करनेको उद्यत हो गये॥ २०॥
कालस्यागमनञ्चैव न विवेद खरान्तकः।<br>मानुषं देहमाश्रित्य चक्रे मानुषचेष्टितम्॥ २१दानव खरके संहारक श्रीरामको कालके आगमनका भी ज्ञान नहीं हो सका। मानव-शरीर धारण करके उन्होंने मनुष्योंके समान कार्य किये॥ २१॥
तथैव मानुषान्भावान्नात्र कार्या विचारणा।<br>पूर्वं कंसभयात्प्राप्तो गोकुले यदुनन्दनः॥ २२<br><br>जरासन्धभयात्पश्चाद् द्वारवत्यां गतो हरिः।<br>अधर्मं कृतवान्कृष्णो रुक्मिण्या हरणञ्च यत्॥ २३<br><br>शिशुपालवृतायाश्च जानन्धर्मं सनातनम्।<br>शुशोच बालकं कृष्णः शम्बरेण हतं बलात्॥ २४<br><br>मुमोद जानन्पुत्रं तं हर्षशोकयुतस्ततः।ऐसे ही श्रीकृष्णने भी सभी मानवोचित भाव प्रदर्शित किये, इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। यदुनन्दन श्रीकृष्ण पहले कंसके भयसे गोकुल जानेको विवश हुए। कुछ समयके पश्चात् जरासन्धके भयसे मथुरा छोड़कर श्रीकृष्णको द्वारका जाना पड़ा। वे ही श्रीकृष्ण अधर्मपूर्ण कार्य करनेमें प्रवृत्त हुए जो कि उन्होंने सनातन धर्मको जानते हुए भी शिशुपालके द्वारा वरण की गयी रुक्मिणीका हरण कर लिया। शम्बरासुरके द्वारा पुत्रका बलपूर्वक हरण कर लिये जानेपर उसके लिये श्रीकृष्ण शोकाकुल हो उठे और [ भगवतीसे ] पुत्रके जीवित होनेकी बात जानकर वे प्रसन्न हो गये। इस प्रकार हर्ष तथा शोक—इन दोनोंसे वे प्रभावित रहे॥ २२—२४ १/२॥
सत्यभामाज्ञया यत्तु युयुधे स्वर्गतः किल॥ २५<br><br>इन्द्रेण पादपार्थं तु स्त्रीजितत्वं प्रकाशयन्।<br>जहार कल्पवृक्षं यः पराभूय शतक्रतुम्॥ २६<br><br>मानिनीमानरक्षार्थं हरिश्चित्रधरः प्रभुः।<br>बद्ध्वा वृक्षे हरिं सत्या नारदाय ददौ पतिम्॥ २७<br>दत्त्वाथ कनकं कृष्णं मोचयामास भामिनी।सत्यभामाकी आज्ञासे स्वर्गमें जाकर कल्पवृक्षके लिये उन्होंने इन्द्रके साथ युद्ध किया। युद्धमें इन्द्रको परास्त करके अपना स्त्रीवशित्व प्रकट करते हुए श्रीकृष्णने इन्द्रसे वह कल्पवृक्ष छीन लिया था। मानिनी सत्यभामाका मान रखनेके लिये प्रभु श्रीकृष्ण काष्ठमूर्तिके रूपमें चित्रित हो गये और सत्यभामाने पति कृष्णको वृक्षमें बाँधकर उन्हें नारदको दान कर दिया। तत्पश्चात् सत्यभामाने सोनेका कृष्ण दानमें देकर उन्हें नारदजीसे मुक्त कराया॥ २५—२७ १/२॥