देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 537, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 537
| ५२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लज्जा भवति देवेश प्रार्थनायां जगद्गुरो।<br>कस्त्वामाराध्य देवेशं मुक्तिदं भक्तवत्सलम्॥ ५२<br><br>प्रसन्नं याचते मूढः फलं तुच्छं विनाशि यत्।<br>सोऽयं मायाविमूढात्मा याचे पुत्रसुखं विभो॥ ५३ | प्रसन्न हो जानेपर कौन मूर्ख ऐसे विनाशशील तथा तुच्छ फलकी कामना करेगा ? हे शम्भो ! हे जगत्पते ! हे विभो ! अपनी भार्या जाम्बवतीसे प्रेरित होकर आपकी मायासे विमूढचित्त यह मैं आप मुक्तिदातासे पुत्र-सुखकी याचना कर रहा हूँ॥ ५०–५३ १/२ ॥ |
| कामिन्या प्रेरितः शम्भो मुक्तिदं त्वां जगत्पते।<br>जानामि दुःखदं शम्भो संसारं दुःखसाधनम्॥ ५४<br><br>अनित्यं नाशधर्माणं तथापि विरतिर्न मे।<br>शापान्नारायणांशोऽहं जातोऽस्मि क्षितिमण्डले॥ ५५<br><br>भोक्तुं बहुतरं दुःखं मायापाशेन यन्त्रितः। | हे शम्भो! मैं जानता हूँ कि यह संसार कष्टदायक, दुःखोंका आगार, अनित्य तथा विनाशशील है, फिर भी इसके प्रति मेरे मनमें वैराग्य-भावका उदय नहीं हो पा रहा है। नारायणका अंश होते हुए भी पूर्वजन्मके शापके कारण मायापाशमें आबद्ध होकर नानाविध कष्ट भोगनेके लिये मुझे पृथ्वीतलपर जन्म लेना पड़ा॥ ५४–५५ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तवन्तं गोविन्दं प्रत्युवाच महेश्वरः॥ ५६<br><br>बहवस्ते भविष्यन्ति पुत्राः शत्रुनिषूदन।<br>स्त्रीणां षोडशसाहस्रं भविष्यति शतार्धकम्॥ ५७<br><br>तासु पुत्रा दश दश भविष्यन्ति महाबलाः।<br>इत्युक्त्वोपररामाशु शङ्करः प्रियदर्शनः॥ ५८ | व्यासजी बोले—भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर महेश्वरने उनसे कहा—हे शत्रुदमन! आपके बहुतसे पुत्र होंगे; आपकी सोलह हजार पचास भार्याएँ भी होंगी। उनमेंसे प्रत्येक स्त्रीसे दस-दस महाबलवान् पुत्र उत्पन्न होंगे—ऐसा कहकर प्रियदर्शन शिवजी चुप हो गये॥ ५६–५८॥ |
| उवाच गिरिजा देवी प्रणतं मधुसूदनम्।<br>कृष्ण कृष्ण महाबाहो संसारेऽस्मिन्नराधिप॥ ५९<br><br>गृहस्थप्रवरो लोके भविष्यति भवानिह।<br>ततो वर्षशतान्ते तु द्विजशापाज्जनार्दन॥ ६०<br><br>गान्धार्याश्च तथा शापाद्भविता ते कुलक्षयः।<br>परस्परं निहत्याजौ पुत्रास्ते शापमोहिताः॥ ६१<br><br>गमिष्यन्ति क्षयं सर्वे यादवाश्च तथापरे।<br>सानुजस्त्वं तथा देहं त्यक्त्वा यास्यसि वै दिवम्॥ ६२ | तत्पश्चात् प्रणाम करते हुए श्रीकृष्णसे देवी पार्वतीने कहा—हे कृष्ण! हे महाबाहो! हे नराधिप! इस संसारमें आप सर्वश्रेष्ठ गृहस्थ होंगे। इसके बाद हे जनार्दन! सौ वर्ष व्यतीत होनेपर एक विप्र तथा गान्धारीके शापके कारण आपके कुलका नाश हो जायगा। शापवश अज्ञानमें पड़कर आपके वे पुत्र तथा अन्य सभी यादव आपसमें एक दूसरेको मारकर रणभूमिमें विनष्ट हो जायँगे और आप अपने भाई बलरामके साथ यह शरीर छोड़कर दिव्य लोकको प्रयाण करेंगे॥ ५९–६२॥ |
| शोकस्तत्र न कर्तव्यो भवितव्यं प्रति प्रभो।<br>अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते॥ ६३<br><br>तत्र शोको न कर्तव्यो नूनं मम मतं सदा।<br>अष्टावक्रस्य शापेन भार्यास्ते मधुसूदन॥ ६४<br>चौरैभ्यो ग्रहणं कृष्ण गमिष्यन्ति मृते त्वयि। | हे प्रभो! आपको होनहारके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि अवश्यम्भावी घटनाओंका कोई भी प्रतीकार सम्भव नहीं है। हे मधुसूदन! मेरा सर्वदा यही निश्चित मन्तव्य रहा है कि भावीके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये। हे कृष्ण! आपके प्रयाण कर जानेपर अष्टावक्रके शापके कारण आपकी भार्याएँ चोरोंद्वारा हर ली जायँगी॥ ६३–६४ १/२ ॥ |