देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 539, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २५ |
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| इत्यभेदेन तां नित्यां चिन्तयेज्जगदम्बिकाम्।<br>ज्ञात्वा गुरुमुखादेनां वेदान्तश्रवणादिभिः॥ ७६<br>नित्यमेकाग्रमनसा भावयेदात्मरूपिणीम्।<br>मुक्तो भवति तेनाशु नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ ७७ | हो सकता। इस अभेदबुद्धिसे युक्त रहते हुए उन सनातन जगदम्बाका चिन्तन करना चाहिये। गुरुके उपदेशसे वेदान्तश्रवण आदिके द्वारा भगवतीके स्वरूपको जानकर नित्य एकाग्र मनसे उन आत्म-स्वरूपिणी योगमायाकी भावना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे प्राणी भव-बन्धनसे शीघ्र ही छूट जाता है, अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी नहीं छूट सकता॥ ७५-७७॥ | | श्वेताश्वतरादयः सर्वे ऋषयो निर्मलाशायाः।<br>आत्मरूपां हृदा ज्ञात्वा विमुक्ता भवबन्धनात्॥ ७८<br>ब्रह्मविष्ण्वादयस्तद्वद् गौरीलक्ष्म्पादद्यस्तथा।<br>तामेव समुपासन्ते सच्चिदानन्दरूपिणीम्॥ ७९ | निर्मल अन्तःकरणवाले सभी श्वेताश्वतर आदि ऋषिगण उन्हीं आत्मस्वरूपिणी भगवतीका अपने हृदयमें साक्षात्कार करके भव-बन्धनसे मुक्त हुए हैं। उन्हींकी भाँति ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा गौरी, लक्ष्मी आदि देवियाँ—ये सब उन्हीं सच्चि-दानन्दस्वरूपिणी भगवतीकी उपासना करते हैं॥ ७८-७९॥ | | इति ते कथितं राजन् यद्यत्पृष्टं त्वयानघ।<br>प्रपञ्चतापत्रस्तेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ८० | हे राजन्! हे अनघ! नानाविध प्रपंचोंके तापसे त्रस्त आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, मैंने वह सब बता दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ८०॥ | | एतत्ते कथितं राजन्मयाख्यानमनुत्तमम्।<br>सर्वपापहरं पुण्यं पुराणं परमाद्भुतम्॥ ८१ | हे महाराज! मैंने आपको यह परमश्रेष्ठ आख्यान सुनाया है; जो सर्वपापविनाशक, पुण्यदायक, पुरातन तथा अत्यन्त अद्भुत कथानक है॥ ८१॥ | | य इदं शृणुयान्नित्यं पुराणं वेदसम्मितम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो देवीलोके महीयते॥ ८२ | जो इस वेदतुल्य पुराणका नित्य श्रवण करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर देवीलोकमें महान् आनन्द प्राप्त करता है॥ ८२॥ | | सूत उवाच<br>एतन्मया श्रुतं व्यासात्कथ्यमानं सविस्तरम्।<br>पुराणं पञ्चमं नूनं श्रीमद्भागवताभिधम्॥ ८३ | सूतजी बोले— [हे मुनियो!] मैंने व्यासजीद्वारा विस्तारपूर्वक कहे गये इस श्रीमद् [देवी] भागवत नामक पंचम महापुराणको उनसे सुना था॥ ८३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पराशक्तेः सर्वज्ञत्वकथनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
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॥ चतुर्थः स्कन्धः समाप्तः ॥