भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

पञ्चमः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>भवता कथितं सूत महदाख्यानमुत्तमम्।<br>कृष्णस्य चरितं दिव्यं सर्वपातकनाशनम्॥ १ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने यह बहुत ही उत्तम कथा कही, जिसमें भगवान् श्रीकृष्णके सर्वपापविनाशक तथा अलौकिक चरित्रका वर्णन है॥ १॥
सन्देहोऽत्र महाभाग वासुदेवकथानके।<br>जायते नः प्रोच्यमाने विस्तरेण महामते॥ २हे महाभाग! हे महामते! [आपके द्वारा] विस्तारपूर्वक कहे जा रहे श्रीकृष्णके इस कथानकमें हमें सन्देह हो रहा है॥ २॥
वने गत्वा तपस्तप्तं वासुदेवेन दुष्करम्।<br>विष्णोरंशावतारेण शिवस्याराधनं कृतम्॥ ३<br><br>वरप्रदानं देव्या च पार्वत्या यत्कृतं पुनः।<br>जगन्मातुश्च पूर्णायाः श्रीदेवीव्या अंशभूतया॥ ४<br><br>ईश्वरेणापि कृष्णेन कुतस्तौ सम्प्रपूजितौ।<br>न्यूनता वा किमस्त्यस्य तदेवं संशयो मम॥ ५[एक तो] विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णने वनमें जाकर घोर तप किया और शिवकी आराधना की; पुनः जगज्जननी श्रीदेवी भगवती पूर्णाकी अंशस्वरूपा देवी पार्वती ने श्रीकृष्णको जो वरदान दिया; ईश्वर होते हुए भी श्रीकृष्णने शिव तथा पार्वतीकी उपासना क्यों की? क्या श्रीकृष्णमें शिवकी अपेक्षा कोई न्यूनता थी? यही हमारा सन्देह है॥ ३—५॥
सूत उवाच<br>शृणुध्वं कारणं तत्र मया व्यासश्रुतञ्च यत्।<br>प्रब्रवीमि महाभागाः कथां कृष्णगुणान्विताम्॥ ६सूतजी बोले—हे महाभाग मुनिगण! व्यासजीसे इसका जो कारण मैंने सुना है, उसे आपलोग सुनिये। अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंसे परिपूर्ण कथा कहता हूँ॥ ६॥
वृत्तान्तं व्यासतः श्रुत्वा वैराटीसुतजस्तदा।<br>पुनः पप्रच्छ मेधावी सन्देहं परमं गतः॥ ७व्यासजीसे यह वृत्तान्त सुनकर प्रतिभावान् राजा जनमेजय और भी अधिक सन्देहमें पड़ गये; तब उन्होंने फिर पूछा॥ ७॥
जनमेजय उवाच<br>सम्यक्सत्यवतीसूनो श्रुतं परमकारणम्।<br>तथापि मनसो वृत्तिः संशयं न विमुञ्चति॥ ८जनमेजय बोले—हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मैंने परमकारणस्वरूपा भगवतीके विषयमें सुना। फिर भी मनकी वृत्ति संशयसे मुक्त नहीं हो पा रही है॥ ८॥
कृष्णेनाराधितः शम्भुस्तपस्तप्त्वातिदारुणम्।<br>विस्मयोऽयं महाभाग देवदेवेन विष्णुना॥ ९हे महाभाग! मुझे यह महान् विस्मय है कि देवोंके भी देव विष्णुके अंशसे उत्पन्न श्रीकृष्णने अति उग्र तपस्या करके भगवान् शिवकी आराधना की। जो