देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 541, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 541
| ५३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ ] |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यः सर्वात्मापि सर्वेशः सर्वसिद्धिप्रदः प्रभुः।<br>स कथं कृतवान्घोरं तपः प्राकृतवद्धरिः॥ १०<br>जगत्कर्तुं क्षमः कृष्णस्तथा पालयितुं क्षमः।<br>संहर्तुमपि कस्मात्स दारुणं तप आचरत्॥ ११ | सभी जीवोंकी आत्मा, सभीके ईश्वर और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं—उन भगवान् कृष्णने भी सामान्य प्राणियोंकी भाँति घोर तप क्यों किया? भगवान् श्रीकृष्ण तो जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ हैं; तब भी उन्होंने इतनी उग्र तपस्या किसलिये की?॥ ९—११॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| सत्यमुक्तं त्वया राजन् वासुदेवो जनार्दनः।<br>क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसूदनः॥ १२<br>तथापि मानुषं देहमाश्रितः परमेश्वरः।<br>कृतवान्मानुषान्भावान्वर्णाश्रमसमाश्रितान्॥ १३<br>वृद्धानां पूजनं चैव गुरुपादाभिवन्दनम्।<br>ब्राह्मणानां तथा सेवा देवताराधनं तथा॥ १४<br>शोके शोकाभियोगश्च हर्षे हर्षसमुन्नतिः।<br>दैन्यं नानापवादाश्च स्त्रीषु कामोपसेवनम्॥ १५<br>कामः क्रोधस्तथा लोभः काले काले भवन्ति हि।<br>तथा गुणमये देहे निर्गुणत्वं कथं भवेत्॥ १६ | हे राजन्! आपने सत्य कहा है। दैत्यदमन भगवान् वासुदेव देवताओंके सभी कार्य करनेमें समर्थ थे; फिर भी उन परमेश्वर श्रीकृष्णने मानव-देह धारण करनेके कारण वर्णाश्रमधर्मसे सम्बन्धित मानवोचित कार्य सम्पादित किये थे। उन्होंने वृद्धजनोंकी पूजा, गुरु-जनोंकी चरण-वन्दना, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा देवताओंकी आराधना की। शोकके अवसरपर वे शोकाकुल हुए तथा हर्षकी स्थितिमें हर्षित हुए। [अवसरके अनुसार] उन्होंने दीनताका प्रदर्शन किया, नानाविध लोकापवादोंको सहन किया तथा अपनी स्त्रियोंके साथ लीला-विहार किया। जिस प्रकार मानवमें समय-समयपर काम, क्रोध तथा लोभ होते रहते हैं, उसी प्रकारके भाव उनके भी मनमें जाग्रत् हुए; क्योंकि गुणमय देहमें निर्गुणत्व कैसे हो सकता है?॥ १२—१६॥ |
| सौबलीशापजाद्दोषत्तथा ब्राह्मणशापजात्।<br>निधनं यादवानां तु कृष्णदेहस्य मोचनम्॥ १७ | सुबलसुता गान्धारी तथा ब्राह्मण अष्टावक्रके शापजनित दोषके कारण यादवोंका विनाश हुआ और भगवान् कृष्णको देह-त्याग करना पड़ा॥ १७॥ |
| हरणं लुण्ठनं तद्वत्तत्पत्नीनां नराधिप।<br>अर्जुनस्यास्त्रमोक्षे च क्लीबत्वं तस्करेषु च॥ १८ | हे राजन्! उसी प्रकार उनकी स्त्रियोंका हरण हुआ, उनका धन लूट लिया गया तथा अर्जुन उन लुटेरोंपर अपना अस्त्र चलानेमें पुरुषार्थहीन हो गये॥ १८॥ |
| अज्ञत्वं हरणे गेहात्तत्प्रद्युम्नानिरुद्धयोः।<br>एवं मानुषदेहेऽस्मिन्मानुषं खलु चेष्टितम्॥ १९ | श्रीकृष्णको अपने घरसे प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके हरणकी जानकारी नहीं हो पायी। इस प्रकार यह मानव-शरीर पाकर उन्होंने साधारण प्राणीकी भाँति सभी मानवीय चेष्टाओंका प्रदर्शन किया॥ १९॥ |
| विष्णोरंशावतारेऽस्मिन्नारायणमुनेस्तथा ।<br>अंशजे वासुदेवेऽत्र किं चित्रं शिवसेवने॥ २० | तब भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा साक्षात् नारायणके अंशसे उत्पन्न इन श्रीकृष्णने यदि शिवजीकी उपासना की तो इसमें आश्चर्य क्या?॥ २०॥ |
| स हि सर्वेश्वरो देवो विष्णोरपि च कारणम्।<br>सुषुप्तस्थाननाथः स विष्णुना च प्रपूजितः॥ २१ | वे प्रभु सबके ईश्वर हैं तथा विष्णुकी भी उत्पत्तिके कारण हैं। वे सुषुप्तस्थान (कारण-देह)-के स्वामी हैं। इसीलिये वे विष्णुके द्वारा भी पूजित |