भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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५३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| कौसल्यादेवकीगर्भे विष्ठामलसमाकुले।<br>स्वेच्छया प्रवदन्त्यद्धा गतो हि मधुसूदनः॥ ४९<br><br>वैकुण्ठसदनं त्यक्त्वा गर्भवासे सुखं नु किम्।<br>चिन्ताकोटिसमुत्थाने दुःखदे विषसम्मिते॥ ५० | कुछ लोग कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे कौसल्या तथा देवकीके मल-मूत्रसे परिपूर्ण गर्भमें आये थे। किंतु वैकुण्ठ-भवन छोड़कर करोड़ों चिन्ताओंके आगार विषतुल्य दुःखदायक गर्भवासमें आनेसे उन्हें कौन-सा सुख प्राप्त हुआ होगा?॥ ४९-५०॥ | | तपस्तप्त्वा क्रतून्कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः।<br>न वाञ्छन्ति यतो लोका गर्भवासं सुदुःखदम्॥ ५१<br><br>स कथं भगवान्विष्णुः स्ववशश्चेज्जनार्दनः।<br>गर्भवासरुचिर्भूयाद्भवेत्स्ववशता यदि॥ ५२ | जब साधारण प्राणी भी तपस्या करके, विविध प्रकारके यज्ञ सम्पन्न करके तथा नाना प्रकारके दान देकर अत्यन्त दुःखद गर्भवास नहीं चाहते तब यदि भगवान् विष्णु स्वतन्त्र होते तो उस गर्भवासको क्यों चाहते? यदि वे अपने वशमें होते तो गर्भवासके प्रति उनकी रुचि क्यों होती?॥ ५१-५२॥ | | जानीहि त्वं महाराज योगमायावशे जगत्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवमानुषतिर्यगम्॥ ५३ | अतः हे महाराज! आप यह जान लीजिये कि ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, सभी देव, मानव तथा पशु-पक्षी योगमाया आदिशक्ति भगवतीके वशमें हैं॥ ५३॥ | | मायातन्त्रीनिबद्धा ये ब्रह्मविष्णुहरादयः।<br>भ्रमन्ति बन्धमायान्ति लीलया चोर्णनाभवत्॥ ५४ | मकड़ीके तन्तुजालमें फँसे कीटकी भाँति ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ये सभी देव उन भगवतीकी लीलासे मायारूपी बन्धनमें पड़ जाते हैं और आवागमनके चक्रमें भ्रमण करते रहते हैं॥ ५४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे योगमायाप्रभाववर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


अथ द्वितीयोऽध्यायः

महिषासुरके जन्म, तप और वरदान-प्राप्तिकी कथा

| राजोवाच<br>योगेश्वर्याः प्रभावोऽयं कथितश्चातिविस्तरात्।<br>ब्रूहि तच्चरितं स्वामिञ्छ्रोतुं कौतूहलं मम॥ १<br><br>महादेवीप्रभावं वै श्रोतुं को नाभिवाञ्छति।<br>यो जानाति जगत्सर्वं तदुत्पन्नं चराचरम्॥ २ | राजा बोले—हे स्वामिन्! आपने भगवती योगेश्वरीका यह प्रभाव विस्तारपूर्वक कहा। अब आप उन महामायाका चरित्र कहिये, उसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है। जो मनुष्य इस बातको भलीभाँति जानता है कि यह स्थावर-जंगमात्मक संसार उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, वह उन महादेवीके प्रभावको क्यों नहीं सुनना चाहेगा?॥ १-२॥ | | व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि विस्तरेण महामते।<br>श्रद्दधानाय शान्ताय न ब्रूयात्स तु मन्दधीः॥ ३ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं विस्तारके साथ वर्णन करूँगा। हे महामते! जो वक्ता श्रद्धालु एवं शान्तचित्त श्रोतासे भगवतीकी कथा नहीं कहता, वह तो मन्द बुद्धिका होता है॥ ३॥ |