भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 560

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१


अथ पञ्चमोऽध्यायः

इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना, तीनों देवताओंसहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना

व्यास उवाच
इति श्रुत्वा सहस्राक्षः पुनराह बृहस्पतिम्।<br>युद्धोद्योगं करिष्यामि हयारेर्नाशनाय वै॥ १<br><br>नोद्यमेन विना राज्यं न सुखं न च वै यशः।<br>निरुद्यमं न शंसन्ति कातरा न च सोद्यमाः॥ २व्यासजी बोले— हे महाराज! यह सुनकर सहस्रनेत्र इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा कि मैं महिषासुरके विनाशके लिये अब युद्धकी तैयारी अवश्य करूँगा; क्योंकि उद्योगके बिना न राज्य, न सुख और न तो यशकी ही प्राप्ति होती है। उद्यमहीनकी प्रशंसा न तो कायर लोग करते हैं और न उद्योगपरायण॥ १-२॥
यतीनां भूषणं ज्ञानं सन्तोषो हि द्विजन्मनाम्।<br>उद्यमः शत्रुहननं भूषणं भूतिमिच्छताम्॥ ३संन्यासियोंका आभूषण ज्ञान है तथा ब्राह्मणोंका आभूषण सन्तोष है; किंतु अपनी उन्नतिकी आकांक्षा रखनेवाले लोगोंके लिये उद्योगपरायण रहते हुए शत्रुसंहारका कार्य ही आभूषण है॥ ३॥
उद्यमेन हतस्त्वाष्ट्रो नमुचिर्बल एव च।<br>तथैनं निहनिष्यामि महिषं मुनिसत्तम॥ ४हे मुनिश्रेष्ठ! उद्यमका आश्रय लेकर ही मैंने वृत्रासुर, नमुचि तथा बल आदि दैत्योंका संहार किया था; उसी प्रकार मैं महिषासुरका भी वध करूँगा॥ ४॥
बलं देवगुरुस्त्वं मे वज्रमायुधमुत्तमम्।<br>सहायस्तु हरिनूंनं तथोमापतिरव्ययः॥ ५आप देवगुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ आयुध वज्र मेरे महान् बलके रूपमें सुलभ हैं। साथ ही भगवान् विष्णु तथा अविनाशी शिवजी मेरी सहायता अवश्य करेंगे॥ ५॥
रक्षोघ्नान्यथ मे साधो करोम्यद्य समुद्यमम्।<br>स्वसैन्याभिनिवेशञ्च महिषं प्रति मानद॥ ६हे मानद! अब मैं महिषासुरके साथ युद्ध करनेके लिये सेनाकी तैयारीके उद्योगमें लग रहा हूँ। हे साधो! अब आप मेरे कल्याणार्थ रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ कीजिये॥ ६॥
व्यास उवाच
इत्युक्तो देवराजेन वाचस्पतिरुवाच ह।<br>सुरेन्द्रं युद्धसंरक्तं स्मितपूर्वं वचस्तदा॥ ७व्यासजी बोले— हे राजन्! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्धके लिये सर्वथा तत्पर उन सुरेन्द्रसे मुसकराकर बृहस्पतिने यह वचन कहा—॥ ७॥
बृहस्पतिरुवाच
प्रेर्यामि न चाहं त्वां न च निवारयाम्यहम्।<br>सन्दिग्धेऽत्र जये कामं युध्यतश्च पराजये॥ ८बृहस्पति बोले— इस समय मैं आपको युद्धके लिये न तो प्रेरित करूँगा और न तो इससे आपको रोकूँगा ही; क्योंकि युद्ध करनेवालेकी हार तथा जीत दोनों ही अनिश्चित रहती हैं॥ ८॥
न तेऽत्र दूषणं किञ्चिद्भवितव्ये शचीपते।<br>सुखं वा यदि वा दुःखं विहितं च भविष्यति॥ ९हे शचीपते! इस होनहारके विषयमें आपका कोई दोष नहीं है। जो भी सुख-दुःख पूर्वतः निर्धारित है, वह तो अवश्य ही प्राप्त होगा॥ ९॥