भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 561
५५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न मया तत्परिज्ञातं भावि दुःखं सुखं तथा।<br>यद्भार्याहरणे प्राप्तं पुरा वासव वेत्सि हि॥ १०भविष्यमें आपको प्राप्त होनेवाले सुख या दुःखके विषयमें मुझे कोई भी ज्ञान नहीं है; क्योंकि हे वासव ! आप यह बात भलीभाँति जानते हैं कि पूर्व समयमें अपनी भार्याके हरणके अवसरपर मुझे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ा था॥ १०॥
शशिना मे हृता भार्या मित्रेणामित्रकर्शन।<br>स्वाश्रमस्थेन सम्प्राप्तं दुःखं सर्वसुखापहम्॥ ११हे शत्रुनिषूदन! चन्द्रमाने मेरी पत्नीका हरण कर लिया था, जिसके फलस्वरूप अपने आश्रममें रहते हुए मुझे सभी सुखोंका विनाश करनेवाला महान् कष्ट झेलना पड़ा॥ ११॥
बुद्धिमान्सर्वलोकेषु विदितोऽहं सुराधिप।<br>क्व मे गता तदा बुद्धिर्यदा भार्या हृता बलात्॥ १२हे सुराधिप ! मैं सभी लोकोंमें परम बुद्धिमान्‌के रूपमें विश्रुत हूँ; किंतु जब मेरी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया गया था तो उस समय मेरी बुद्धि कहाँ चली गयी थी?॥ १२॥
तस्मादुपायः कर्तव्यो बुद्धिमद्भिः सदा नरैः।<br>कार्यसिद्धिः सदा नूनं दैवाधीना सुराधिप॥ १३अतएव हे सुराधिप ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा यत्नपरायण होना चाहिये। कार्यकी सिद्धि तो निश्चितरूपसे सदा दैवके ही अधीन रहती है॥ १३॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं गुरोः सार्थं शचीपतिः।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा नत्वा वचनमब्रवीत्॥ १४व्यासजी बोले— गुरु बृहस्पतिका यह सत्य तथा अर्थयुक्त वचन सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीकी शरणमें जाकर उन्हें प्रणाम करके बोले—॥ १४॥
पितामह सुराध्यक्ष दैत्यो महिषसंज्ञकः।<br>ग्रहीतुकामः स्वर्गं मे बलोद्योगं करोत्यलम्॥ १५हे पितामह ! हे देवाध्यक्ष ! इस समय महिषासुर नामक दैत्य मेरे स्वर्गलोकपर अपना अधिकार स्थापित करनेकी कामनासे सैन्यबलकी तैयारी कर रहा है॥ १५॥
अन्ये च दानवाः सर्वे तत्सैन्यं समुपस्थिताः।<br>योद्धुकामा महावीर्याः सर्वे युद्धविशारदाः॥ १६अन्य दानव भी उसकी सेनामें सम्मिलित हो रहे हैं। वे सब-के-सब सदा युद्धके लिये आतुर रहनेवाले, महान् पराक्रमी तथा युद्धकलामें अत्यन्त प्रवीण हैं॥ १६॥
तेनाहं भीतभीतोऽस्मि त्वत्सकाशमिहागतः।<br>सर्वज्ञोऽसि महाप्राज्ञ साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १७उस दानवसे भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें यहाँ आया हूँ। हे महाप्राज्ञ ! आप तो सर्ववेत्ता हैं तथा मेरी सहायता करनेमें पूर्ण समर्थ हैं॥ १७॥
ब्रह्मोवाच<br>गच्छामः सर्व एवाद्य कैलासं त्वरिता वयम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा विष्णुं च बलिनां वरम्॥ १८<br><br>ततो युद्धं प्रकर्तव्यं सर्वैः सुरगणैः सह।<br>मिलित्वा मन्त्रमाधाय देशं कालं विचिन्त्य च॥ १९<br><br>बलाबलमविज्ञाय विवेकमपहाय च।<br>साहसं तु प्रकुर्वाणो नरः पतनमृच्छति॥ २०ब्रह्माजी बोले— हमलोग इसी समय शीघ्रतापूर्वक कैलास चलें और वहाँसे शंकरजीको आगे करके बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णुभगवान्‌के पास चलें। तत्पश्चात् सभी देवगणोंके साथ परस्पर मिलकर देश-कालके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करके एक समुचित निर्णय लेकर ही युद्ध करना चाहिये। अपनी शक्ति तथा निर्बलताका सम्यक् ज्ञान किये बिना विवेकका त्याग करके दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेवाला व्यक्ति पतनको प्राप्त होता है॥ १८-२०॥