देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 562, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 562
| अ० ५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य सहस्राक्षः कैलासं निर्जगाम ह।<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा लोकपालसमन्वितः॥ २१ ॥ | व्यासजी बोले—यह सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीको आगे करके समस्त लोकपालोंके साथ कैलासकी ओर चल पड़े॥ २१॥ |
| तुष्टाव शङ्करं गत्वा वेदमन्त्रैर्महेश्वरम्।<br>प्रसन्नं पुरतः कृत्वा ययौ विष्णुपुरं प्रति॥ २२ ॥ | कैलास पहुँचकर इन्द्रने वेदमन्त्रोंके द्वारा शिवजीकी स्तुति की। तत्पश्चात् [स्तुतिगानसे] अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त भगवान् शंकरको आगे करके वे विष्णुलोक गये॥ २२॥ |
| स्तुत्वा तं देवदेवेशं कार्यं प्रोवाच चात्मनः।<br>महिषात्तद्भयं चोग्रं वरदानमदोद्धतात्॥ २३ ॥ | उन देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी स्तुति करके उन्होंने वहाँ अपने आनेका उद्देश्य बताया तथा वरदान पानेके कारण गर्वोन्मत्त महिषासुरसे उत्पन्न उग्र भयके बारेमें उनसे कहा॥ २३॥ |
| तदाकर्ण्य भयं तस्य विष्णुर्देवानुवाच ह।<br>करिष्यामो वयं युद्धं हनिष्यामस्तु दुर्जयम्॥ २४ ॥ | उनके भयको सुनकर भगवान् विष्णुने देवताओंसे कहा कि हम देवगण युद्ध करेंगे और उस दुर्जयका वध कर डालेंगे॥ २४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ते निश्चयं कृत्वा ब्रह्मविष्णुहरीश्वराः।<br>स्वानि स्वानि समारुह्य वाहनानि ययुः सुराः॥ २५ ॥ | व्यासजी बोले—ऐसा निश्चय करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने वाहनोंपर चढ़कर चल पड़े॥ २५॥ |
| ब्रह्मा हंससमारूढो विष्णुर्गरुडवाहनः।<br>शङ्करो वृषभारूढो वृत्रहा गजसंस्थितः॥ २६ ॥<br>मयूरवाहनः स्कन्दो यमो महिषवाहनः।<br>कृत्वा सैन्यसमायोगं यावत्ते निर्ययुः सुराः॥ २७ ॥<br>तावद्दैत्यबलं प्राप्तं दृप्तं महिषपालितम्।<br>तत्राभूत्तुमुलं युद्धं देवदानवसैन्ययोः॥ २८ ॥ | ब्रह्माजी हंसपर चढ़े, विष्णुभगवान्ने गरुडको अपना वाहन बनाया, शंकरजी वृषभपर सवार हुए, इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे, स्वामी कार्तिकेय मोरपर चढ़े और यमराज महिषपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार अपनी सैन्य तैयारी करके देवता लोग ज्यों ही आगे बढ़े, तभी उन्हें महिषासुरके द्वारा पालित मदोन्मत्त दानवी-सेना सामने मिल गयी। इसके बाद वहींपर देवताओं तथा दानवोंकी सेनामें भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ २६—२८॥ |
| बाणैः खड्गैस्तथा प्रासैर्मुसलैश्च परश्वधैः।<br>गदाभिः पट्टिशैः शूलैश्चक्रैश्च शक्तितोमरैः॥ २९ ॥<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च हलैश्चैवातिदारुणैः।<br>अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुस्ते परस्परम्॥ ३० ॥ | वे एक-दूसरेपर बाण, तलवार, भाला, मूसल, परशु, गदा, पट्टिश, शूल, चक्र, शक्ति, तोमर, मुद्गर, भिन्दिपाल, हल तथा अन्य अति भयंकर शस्त्रोंसे प्रहार करने लगे॥ २९-३०॥ |
| सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य गजारूढो महाबलः।<br>मघवन्तं पञ्चभिस्तैः सायकैः समताडयत्॥ ३१ ॥ | महिषासुरके सेनापति महाबली चिक्षुरने हाथीपर चढ़कर इन्द्रपर पाँच बाणोंसे प्रहार किया॥ ३१॥ |
| तुराषाडपि तांश्छित्त्वा बाणैर्बाणांस्त्वरान्वितः।<br>हृदये चार्धचन्द्रेण ताडयामास तं कृती॥ ३२ ॥ | युद्धकुशल इन्द्रने भी तत्काल अपने बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर अपने अर्धचन्द्र नामक बाणसे उसके हृदय-स्थलपर आघात किया॥ ३२॥ |
| बाणाहतस्तु सेनानीः प्राप मूर्च्छां गजोपरि।<br>करिणं वज्रघातेन स जघान करे ततः॥ ३३ ॥ | उस बाणसे आहत होकर सेनानायक चिक्षुर हाथीपर बैठे-बैठे ही मूर्च्छित हो गया। इसके बाद इन्द्रने हाथीकी सूँडपर वज्रसे प्रहार किया॥ ३३॥ |