भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 564

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५५

इन्द्रस्तु बलिनं दृष्ट्वा कोपेनाकुलितेन्द्रियः।<br>जयन्तमग्रतः कृत्वा युयुधे तेन संयुतः॥४५क्रोधके प्रभावसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले इन्द्रने बिडालको विशेष बलवान् देखकर जयन्तको अपना अग्रणी बना लिया और अब उसके साथ मिलकर वे युद्ध करने लगे॥४५॥
जयन्तस्तु शितैर्बाणैस्तं जघान स्तनान्तरे।<br>पञ्चभिः प्रबलाकृष्टैरसुरं मदगर्वितम्॥४६जयन्तने धनुषपर चढ़ाकर प्रबलतापूर्वक खींचे गये पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे मदोन्मत्त उस दानव बिडालके वक्षःस्थलपर आघात किया॥४६॥
स बाणाभिहतस्तावन्निपपात रथोपरि।<br>अतिवाह्य रथं सूतो निर्जगाम रणाजिरात्॥४७उन बाणोंके आघातसे मूर्च्छित होकर बिडाल रथपर गिर पड़ा, तब उसका सारथि तत्काल रथ लेकर रण-भूमिसे बाहर निकल गया॥४७॥
तस्मिन्निर्गते दैत्ये बिडालाख्येऽथ मूर्च्छिते।<br>जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निःस्वनः॥४८उस बिडालके मूर्च्छित होकर युद्धभूमिसे बाहर चले जानेपर देवसेनामें महान् विजय-घोष तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी॥४८॥
सुराः प्रमुदिताः सर्वे तुष्टुवुस्तं शचीपतिम्।<br>जगूर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४९सभी देवता प्रसन्न होकर इन्द्रकी स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं॥४९॥
चुकोप महिषः श्रुत्वा जयशब्दं सुरैः कृतम्।<br>प्रेषयामास तत्रैव ताम्रं परमदापहम्॥५०तत्पश्चात् देवताओंके द्वारा किये गये उस विजय-घोषको सुनकर महिषासुर कुपित हो उठा। उसने शत्रुओंके अभिमानको चूर-चूर कर देनेवाले ताम्र नामक दानवको युद्धक्षेत्रमें भेजा॥५०॥
ताम्रस्तु बहुभिः सार्धं समागम्य रणाजिरे।<br>शरवृष्टिं चकाराशु तडित्वानिव सागरे॥५१ताम्र बहुत-से सैनिकोंके साथ समरांगणमें आकर इस प्रकार वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगा मानो मेघ समुद्रमें जल बरसा रहा हो॥५१॥
वरुणः पाशमुद्यम्य जगाम त्वरितस्तदा।<br>यमश्च महिषारूढो दण्डमादाय निर्ययौ॥५२उस समय वरुणदेव पाश लेकर तथा यमराज हाथमें दण्ड धारण करके महिषपर चढ़कर [युद्धभूमिमें] शीघ्र ही पहुँच गये॥५२॥
तत्र युद्धमभूद् घोरं देवदानवयोरिथः।<br>बाणैः खड्गैश्च मुसलैः शक्तिभिश्च परश्वधैः॥५३अब देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर बाणों, तलवारों, मुसलों, बछियों तथा फरसोंसे भीषण संग्राम होने लगा॥५३॥
दण्डेन निहतस्ताम्रो यमहस्तोद्यतेन च।<br>न चचाल महाबाहुः संग्रामाङ्गणतस्तदा॥५४यमराजके द्वारा अपने हाथसे फेंके गये दण्डसे ताम्र आहत हो गया, किंतु वह महाबाहु ताम्र समरांगणसे हिलातक नहीं॥५४॥
चापमाकृष्य वेगेन मुक्त्वा तीव्राञ्छिलीमुखान्।<br>इन्द्रादीनहनत्तूर्णं ताम्रस्तस्मिन् रणाजिरे॥५५ताम्र उस संग्रामभूमिमें वेगपूर्वक धनुषको खींच-खींचकर अति तीक्ष्ण बाण छोड़कर इन्द्र आदि देवताओंपर शीघ्रतासे प्रहार करने लगा॥५५॥
तेऽपि देवाः शरैर्दिव्यैर्निशितैश्च शिलाशितैः।<br>निजघ्नुर्दानवान्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चुक्रुशुः॥५६वे देवता कुपित होकर पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये तीक्ष्ण दिव्य बाणोंसे दानवोंको मारने लगे और 'ठहरो-ठहरो' कहकर चिल्लाने लगे॥५६॥