देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 565, कुल 889 में से
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| ५५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| निहतस्तैः सुरैर्दैत्यो मूर्च्छामप रणाङ्गणे ।<br>हाहाकारो महानासीद्दैत्यसैन्ये भयातुरे ॥ ५७ | उन देवताओंके प्रहारसे घायल होकर दैत्य ताम्र युद्धभूमिमें मूर्च्छित हो गया। तब भयाक्रान्त दैत्यसेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ ५७ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| ताम्रेऽथ मूर्च्छिते दैत्ये महिषः क्रोधसंयुतः ।<br>समुद्यम्य गदां गुर्वीं देवानुपजगाम ह ॥ १ | इस प्रकार दानव ताम्रके मूर्च्छित हो जानेपर महिषासुर कुपित हो गया और एक विशाल गदा लेकर देवताओंके समक्ष जा डटा ॥ १ ॥ |
| तिष्ठन्त्वद्य सुराः सर्वे हन्म्यहं गदया किल ।<br>सर्वे बलिभुजः कामं बलहीनाः सदैव हि ॥ २<br><br>इत्युक्त्वासौ गजारूढं सम्प्राप्य मदगर्वितः ।<br>जघान गदया तूर्णं बाहुमूले महाभुजः ॥ ३ | हे देवताओ! तुम सब ठहरो; मैं अभी अपनी गदासे तुम सभीको मार डालूँगा। बलिभाग (हविष्य) खानेवाले तुम सब तो सदासे बलहीन रहे हो—ऐसा कहकर अभिमानके मदमें चूर वह महाबाहु महिषासुर हाथीपर बैठे हुए इन्द्रके पास पहुँचकर उसने उनके बाहुमूलपर अपनी गदासे तीव्र आघात किया ॥ २-३ ॥ |
| सोऽपि वज्रेण घोरेण चिच्छेदाशु गदाञ्च ताम् ।<br>प्रहर्तुकामस्त्वरितो जगाम महिषं प्रति ॥ ४ | इन्द्रने अपने भयंकर वज्रसे उस गदाको तुरंत काट दिया और वे महिषासुरको मारनेकी इच्छासे बड़ी शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर बढ़े ॥ ४ ॥ |
| हयारिरपि कोपेन खड्गमादाय सुप्रभम् ।<br>ययाविन्द्रं महावीर्यं प्रहरिष्यन्निवान्तिकम् ॥ ५ | तत्पश्चात् वह महिषासुर भी कुपित होकर अपने हाथमें चमचमाती हुई तलवार लेकर प्रहार करते हुए महाबली इन्द्रके सामने पहुँच गया ॥ ५ ॥ |
| बभूव च तयोर्युद्धं सर्वलोकभयावहम् ।<br>आयुधैर्विविधैस्तत्र मुनिविस्मयकारकम् ॥ ६ | तब उन दोनोंमें नानाविध आयुधोंके द्वारा समस्त प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाला तथा मुनिजनोंको भी विस्मित कर देनेवाला भीषण युद्ध छिड़ गया ॥ ६ ॥ |
| चकाराशु तदा दैत्यो मायां मोहकरीं किल ।<br>शाम्बरीं सर्वलोकघ्नीं मुनीनामपि मोहिनीम् ॥ ७ | तत्पश्चात् दैत्य महिषासुरने सम्पूर्ण जगत्को नष्ट कर देनेवाली तथा मुनियोंको भी मोहित कर देनेवाली मोहकारिणी शाम्बरी मायाका तत्काल प्रयोग किया ॥ ७ ॥ |
| कोटिशो महिषास्तत्र तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।<br>ददृशुः सायुधाः सर्वे निघ्नन्तो देववाहिनीम् ॥ ८ | उस मायाके प्रभावसे महिषासुरके ही रूपवाले तथा उसीके समान पराक्रमी करोड़ों महिषासुर अनेक प्रकारके आयुध लेकर देवसेनाका संहार करते हुए दिखायी पड़े ॥ ८ ॥ |