देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५७
| मघवा विस्मितस्तत्र दृष्ट्वा तां दैत्यनिर्मिताम् ।<br>बभूवातिभयोद्विग्नो मायां मोहकरीं किल ॥ ९ | तब दैत्य महिषासुरद्वारा उत्पन्न की गयी उस मोहकरी मायाको देखकर इन्द्र विस्मयमें पड़ गये तथा भयसे बहुत व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥ |
| वरुणोऽपि सुसन्त्रस्तस्तथैव धननायकः ।<br>यमो हुताशनः सूर्यः शीतरश्मिर्भयातुरः ॥ १०<br><br>पलायनपराः सर्वे बभूवुर्मोहिताः सुराः ।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्मरणं चक्रुरुद्यताः ॥ ११ | वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भयभीत हो गये और सभीके मनमें त्रास छा गया। सभी देवगण माया-विमोहित होकर भाग खड़े हुए और वे सावधान होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका स्मरण करने लगे ॥ १०-११ ॥ |
| तत्राजग्मुश्च काजेशाः स्मृतमात्राः सुरोत्तमाः ।<br>हंसतार्क्ष्यवृषारूढास्त्रातुकामा वरायुधाः ॥ १२ | स्मरण करते ही उनकी रक्षाकी कामनासे श्रेष्ठ आयुध धारण करके सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अपने-अपने वाहन हंस, गरुड तथा वृषभपर आरूढ होकर वहाँ आ गये ॥ १२ ॥ |
| शौरिस्तां मोहिनीं दृष्ट्वा सुदर्शनमथोज्ज्वलम् ।<br>मुमोच तत्तेजसैव माया सा विलयं गता ॥ १३ | मोहकारिणी उस आसुरी मायाको देखकर भगवान् विष्णुने अपना तेजोमय सुदर्शन चक्र चला दिया, जिसके प्रचण्ड तेजसे वह माया समाप्त हो गयी ॥ १३ ॥ |
| वीक्ष्य तान्महिषस्तत्र सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।<br>योद्धुकामः समादाय परिघं समुपाद्रवत् ॥ १४ | तदनन्तर सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले उन देवताओंको देखकर उनसे युद्ध करनेकी इच्छासे वह महिषासुर परिघ लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥ |
| महिषाख्यो महावीरः सेनानीश्चिक्षुरस्तथा ।<br>उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च दुद्रुवुर्युद्धकामुकाः ॥ १५<br><br>असिलोमात्रिनेत्रश्च बाष्कलोऽन्धक एव च ।<br>एते चान्ये च बहवो युद्धकामा विनिर्ययुः ॥ १६ | इसके बाद महावीर महिषासुर, सेनाध्यक्ष चिक्षुर, उग्रास्य, उग्रवीर्य, असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक—ये दानव एवं इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दानव युद्धकी अभिलाषासे निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥ |
| सन्नद्धा धृतचापास्ते रथारूढा मदोद्धताः ।<br>परिवव्रुः सुरान्सर्वान्वृका इव सुवत्सकान् ॥ १७ | उन कवचधारी, धनुष धारण करनेवाले, रथारूढ तथा मदोन्मत्त दानवोंने सभी देवताओंको उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार भेड़िये अत्यन्त कोमल बछड़ोंको घेर लेते हैं ॥ १७ ॥ |
| बाणवृष्टिं ततश्चक्रुर्दानवा मदगर्विताः ।<br>सुराश्चापि तथा चक्रुः परस्परजिघांसवः ॥ १८ | तदनन्तर एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे मदोन्मत्त दानव तथा देवता बाण-वृष्टि करने लगे ॥ १८ ॥ |
| अन्धको हरिमासाद्य पञ्चबाणाञ्छिलाशितान् ।<br>मुमोच विषसन्दिग्धान्कर्णाकृष्टान्महाबलान् ॥ १९ | इसी बीच अन्धकासुरने भगवान् विष्णुके समक्ष पहुँचकर सानपर चढ़ाये गये, विषमें दग्ध किये गये तथा कानतक खींचे गये अत्यन्त शक्तिशाली पाँच बाण छोड़े ॥ १९ ॥ |
| वासुदेवोऽप्यसंप्राप्तानविशिखानाशुगैस्तदा ।<br>चिच्छेद तान्पुनः पञ्च मुमोच रिपुनाशनः ॥ २० | शत्रुदमन भगवान् विष्णुने भी बड़ी तत्परताके साथ अपने तीव्रगामी बाणोंसे अन्धकासुरके उन बाणोंको दूरसे ही काट डाला और फिर उसके ऊपर पाँच बाण छोड़े ॥ २० ॥ |