भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 567
५५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| तयोः परस्परं युद्धं बभूव हरिदैत्ययोः।<br>बाणासिचक्रमुसलैर्गदाशक्तिपरश्वधैः ॥ २१ | इस प्रकार विष्णु तथा अन्धकासुर—उन दोनोंमें बाण, तलवार, चक्र, मूसल, गदा, बर्छी तथा फरसोंसे भीषण युद्ध होने लगा॥ २१॥ | | महेशान्धकयोर्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।<br>पञ्चाशद्दिनपर्यन्तं बभूव च परस्परम्॥ २२ | इसी प्रकार महेश्वर तथा अन्धकासुरके बीच भीषण रोमांचकारी युद्ध निरन्तर पचास दिनोंतक होता रहा॥ २२॥ | | इन्द्रबाष्कालयोस्तद्वन्महिषासुररुद्रयोः ।<br>यमत्रिनेत्रयोस्तद्वन्महाहनुधनेशयोः ॥ २३<br><br>असिलोमवरुणयोर्युद्धं परमदारुणम्।<br>गरुडं गदया दैत्यो जघान हरिवाहनम्॥ २४<br><br>स गदापातखिन्नाङ्गो निःश्वसन्नवतिष्ठत।<br>शौरिस्तं दक्षिणेनाशु हस्तेन परिसान्त्वयन्॥ २५<br><br>स्थिरं चकार देवेशो वैनतेयं महाबलम्।<br>समाकृष्य धनुः शार्ङ्गं मुमोच विशिखान्बहून्॥ २६ | उसी तरह इन्द्र तथा बाष्कल, महिषासुर तथा भगवान् रुद्र, यमराज तथा त्रिनेत्र, महाहनु तथा कुबेर एवं असिलोमा तथा वरुणके बीच महाभीषण युद्ध हुआ। इसी बीच अन्धकासुरने अपनी गदासे भगवान् विष्णुके वाहन गरुडपर प्रहार किया। गदाके प्रहारसे घायल अंगोंवाले गरुड लम्बी साँस खींचते हुए स्थित हो गये। तत्पश्चात् देवाधिदेव विष्णुने अपने दाहिने हाथसे सहलाकर महाबली गरुडको सान्त्वना प्रदान करते हुए उन्हें स्वस्थचित्त किया। तब भगवान् विष्णुने अन्धकका संहार करनेके विचारसे अपना शार्ङ्गधनुष खींचकर उसके ऊपर बहुत-से बाण छोड़े॥ २३—२६ १/२॥ | | अन्धकोपरि कोपेन हन्तुकामो जनार्दनः।<br>दानवोऽपि च तान्बाणांश्छिच्छेद स्वशरैः शितैः॥ २७<br><br>पञ्चाशद्भिर्हरिं कोपाज्जघान च शिलाशितैः।<br>वासुदेवोऽपि तांस्तूर्णं वञ्चयित्वा शरोत्तमान्॥ २८<br><br>चक्रं मुमोच वेगेन सहस्रारं सुदर्शनम्।<br>त्यक्तं सुदर्शनं दूरात्स्वचक्रेण न्यवारयत्॥ २९ | दानव अन्धकने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और इसके बाद सानपर चढ़ाकर तेज बनाये गये पचास बाण भगवान् विष्णुके ऊपर कुपित होकर एक ही साथ छोड़े। भगवान् विष्णुने भी उन उत्तम बाणोंको तत्क्षण निष्फल करके अपना हजार अरोंवाला सुदर्शन चक्र अन्धकासुरके ऊपर वेगपूर्वक चलाया। तब अन्धकासुरने भगवान् विष्णुद्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्रको अपने चक्रसे काफी दूरसे ही विफल कर दिया। हे महाराज [जनमेजय]! इसके बाद देवताओंको सम्मोहित करते हुए उसने भीषण गर्जना की॥ २७—२९ १/२॥ | | ननाद च महाराज देवान्सम्मोहयन्निव।<br>दृष्ट्वा तु विफलं जातं चक्रं देवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३०<br><br>जग्मुः शोकं सुराः सर्वे जहर्षुर्दानवास्तथा।<br>वासुदेवोऽपि तरसा दृष्ट्वा देवान्छुचावृतान्॥ ३१<br><br>गदां कौमोदकीं धृत्वा दानवं समुपाद्रवत्।<br>तं जघानातिवेगेन मूर्ध्नि मायाविनं हरिः॥ ३२<br>स गदाभिहतो भूमौ निपपातातिमूर्च्छितः। | तत्पश्चात् शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके सुदर्शन चक्रको विफल हुआ देखकर सभी देवता शोकाकुल हो उठे तथा दानवगण हर्षित हो गये। तब भगवान् विष्णु भी देवताओंको चिन्तामग्न देखकर अपनी कौमोदकी गदा लेकर दानव अन्धकपर झपट पड़े। श्रीहरिने बड़े वेगसे उस मायावीके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। वह दैत्य गदाके प्रहारसे पूर्णरूपसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३०—३२ १/२॥ |