भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 889 में से

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पृष्ठ 568

अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं तथा पतितं वीक्ष्य ह्यारिरतिकोपनः ॥ ३३<br><br>आजगाम रमानाथं त्रासयन्नतिगर्जितैः ।<br>वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा समायान्तं क्रुधान्वितम् ॥ ३४<br><br>चापज्यानिनादं चोग्रं चकार नन्दयन्सुरान् ।<br>शरवृष्टिं चकाराशु भगवान्महिषोपरि ॥ ३५<br><br>सोऽपि चिच्छेद बाणौघैस्ताञ्छरानागनेरितान् ।<br>तयोर्युद्धमभूद्राजन् परस्परभयावहम् ॥ ३६उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपनी घोर गर्जनासे भयभीत करता हुआ भगवान् विष्णुके सामने आ गया। भगवान् विष्णुने भी उस महिषासुरको कुपित होकर अपने समक्ष आया देखकर देवताओंको आनन्दित करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यंचासे भयानक टंकार उत्पन्न की। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु महिषासुरके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे। उसने भी अपने बाणसमूहोंसे उन आते हुए बाणोंको आकाशमें ही काट डाला। हे राजन्! इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अति भीषण युद्ध हुआ॥ ३३-३६॥
गदया ताडयामास केशवो मस्तकोपरि ।<br>स गदाभिहतो मूर्ध्नि पपातोर्व्यां सुमूर्च्छितः ॥ ३७<br><br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य सुदारुणः ।<br>स विहाय व्यथां दैत्यो मुहूर्तादुत्थितः पुनः ॥ ३८<br><br>गृहीत्वा परिघं शीर्षे जघान मधुसूदनम् ।<br>परिघेणाहतस्तेन मूर्च्छामप जनार्दनः ॥ ३९<br><br>मूर्च्छितं तमुवाहाशु जगाम गरुडो रणात् ।<br>परावृत्ते जगन्नाथे देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ४०भगवान् विष्णुने गदासे महिषासुरके मस्तकपर प्रहार किया। मस्तकपर उस गदाके आघातसे मूर्च्छित होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। [यह देखकर] उसकी सेनामें अति भीषण हाहाकार मच गया। कुछ ही क्षणोंमें अपनी वेदनाको भूलकर वह दैत्य फिर उठकर खड़ा हो गया। उसने तत्काल एक परिघ लेकर मधुसूदन श्रीविष्णुके सिरपर प्रहार किया। उस परिघके प्रहारसे आहत होकर भगवान् विष्णु मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। तब गरुड मूर्च्छाको प्राप्त उन भगवान् विष्णुको युद्धस्थलसे लेकर बाहर चले गये। इस प्रकार जगत्पति विष्णुके समरांगणसे लौट जानेपर इन्द्र आदि प्रधान देवता भयभीत हो गये और दुःखसे पीड़ित होकर युद्धभूमिमें चीखने-चिल्लाने लगे॥ ३७-४० १/२॥
भयं प्रापुः सुदुःखातार्श्चक्रुशुश्च रणाजिरे ।<br>क्रन्दमानान्सुरान्वीक्ष्य शङ्करः शूलभृत्तदा ॥ ४१<br><br>महिषं तरसाभ्येत्य प्राहरद्रोषसंयुतः ।<br>सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ शङ्करस्योरसि स्फुटम् ॥ ४२<br><br>जगर्ज स च दुष्टात्मा वञ्चयित्वा त्रिशूलकम् ।<br>शङ्करोऽपि तदा पीडां न प्रापोरसि ताडितः ॥ ४३<br><br>तं जघान त्रिशूलेन कोपादरुणलोचनः ।तत्पश्चात् शूलधारी भगवान् शंकरने देवताओंको इस प्रकार करुण क्रन्दन करते हुए देखकर अत्यन्त क्रोधके साथ महिषासुरके पास द्रुतगतिसे पहुँचकर उसपर भीषण प्रहार किया। उस महिषासुरने भी भगवान् शंकरके वक्षःस्थलपर अपनी शक्ति (बर्छी)-से तेज प्रहार किया और उनके त्रिशूलप्रहारको विफल करके उस दुष्टात्माने बड़ी तेज गर्जना की। वक्षपर प्रहार होनेपर भी भगवान् शंकरको कोई पीड़ा नहीं हुई और क्रोधसे आँखें लाल करके उन्होंने उसपर अपने त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ४१-४३ १/२॥