देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 569, कुल 889 में से
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| ५६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| संलग्नं शङ्करं दृष्ट्वा महिषेण दुरात्मना ॥ ४४<br><br>आजमाम हरिस्तावत्त्यक्त्वा मूर्च्छां प्रहारजाम् ।<br>महिषस्तु तदा वीक्ष्य सम्प्राप्तौ हरिशङ्करौ ॥ ४५<br><br>युद्धकामौ महावीर्यौ चक्रशूलधरौ वरौ ।<br>कोपयुक्तो बभूवासौ दृष्ट्वा तौ समुपागतौ ॥ ४६<br><br>जगाम सम्मुखस्तावत्संग्रामार्थं महाभुजः ।<br>माहिषं वपुरास्थाय धुन्वन्पुच्छं समुत्कटम् ॥ ४७<br><br>चकार भैरवं नादं त्रासयन्नमरानपि ।<br>धुन्वञ्शृङ्गे महाकायो दारुणो जलदो यथा ॥ ४८<br><br>शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप भृशमुत्कटान् । | इसी बीच दुष्टात्मा महिषासुरके साथ भगवान् शंकरको इस प्रकार युद्धरत देखकर प्रहारजनित मूर्च्छाका त्याग करके वहाँ भगवान् विष्णु आ गये। उस समय युद्धके लिये उत्सुक महापराक्रमी विष्णु तथा शिवको श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल धारण करके लड़नेके लिये अपने समक्ष उपस्थित देखकर वह महाबली महिषासुर अत्यन्त कुपित हो उठा। तत्पश्चात् वह विशालबाहु दैत्य उन दोनों देवताओंको अपने समीप आया हुआ देखकर महिषका रूप धारण करके पूँछ हिलाता हुआ युद्ध करनेके लिये उनके समक्ष पहुँच गया। देवताओंको आतंकित करते हुए उस विशालकाय तथा भयावह महिषासुरने अपनी सींगें फटकारते हुए मेघकी भाँति भीषण गर्जना की तथा वह अपनी सींगोंसे पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा ॥ ४४-४८ ½ ॥ |
| दृष्ट्वा तौ तु महावीर्यौ दानवं देवसत्तमौ ॥ ४९<br><br>चक्रतुर्बाणवृष्टिं च दानवोपरि दारुणाम् ।<br>कुर्वाणौ बाणवृष्टिं तौ दृष्ट्वा हरिहरौ हरिः ॥ ५०<br><br>चिक्षेप गिरिशृङ्गं तु पुच्छेनावृत्य दारुणम् ।<br>आपतन्तं गिरिं वीक्ष्य भगवान्सात्वतां पतिः ॥ ५१<br><br>विशिखैः शतधा चक्रे चक्रेणाशु जघान तम् ।<br>हरिचक्राहतः संख्ये मूर्च्छामाप स दैत्यराट् ॥ ५२<br><br>उत्तस्थौ च क्षणान्नूनं मानुषं वपुरास्थितः ।<br>गदापाणिर्महाघोरो दानवः पर्वतोपमः ॥ ५३<br><br>मेघनादं ननादोच्चैर्भीषयन्नमरानपि । | उस दानवको देखकर महापराक्रमी देवश्रेष्ठ विष्णु तथा शंकर उसके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगे। भगवान् विष्णु तथा शिवको अपने ऊपर बाण-वृष्टि करते हुए देखकर महिषासुरने अपनी पूँछमें एक भयानक पर्वतशिखर लपेटकर उनके ऊपर फेंका। उस पर्वत-शिखरको आते देखकर भगवान् विष्णुने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये और फिर सुदर्शन चक्रसे उसके ऊपर शीघ्रतासे प्रहार किया। भगवान् विष्णुके चक्रसे आहत होकर वह दैत्यराज महिषासुर युद्धमें मूर्च्छित हो गया। किंतु थोड़ी ही देरमें वह मनुष्यका शरीर धारण करके उठ खड़ा हुआ। पर्वतके समान शरीरवाला वह महाभयानक दैत्य हाथमें गदा धारणकर देवताओंको भयभीत करता हुआ मेघके समान जोर-जोरसे गरजने लगा ॥ ४९-५३ ½ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पाञ्चजन्यं समुज्ज्वलम् ॥ ५४<br><br>पूरयामास तरसा शब्दं कर्तुं खरस्वरम् ।<br>तेन शब्देन शङ्खस्य भयत्रस्ताश्च दानवाः ।<br>बभूवुर्मुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ५५ | उस नादको सुनकर भगवान् विष्णुने तीव्रतर ध्वनि उत्पन्न करनेके लिये बड़ी तेजीसे अपना देदीप्यमान पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंखकी उस ध्वनिसे समस्त दानव भयभीत हो गये और तपोधन ऋषिगण तथा देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ५४-५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरस्येन्द्रादिदेवैः सह युद्धवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥