भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 889 में से

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पृष्ठ 570

अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६१

अथ सप्तमोऽध्यायः

महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने-अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
असुरान्महिषो दृष्ट्वा विषण्णमनसस्तदा।<br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव मृगराडसौ॥ १[हे महाराज जनमेजय!] महिषासुरने समस्त दानवोंको खिन्नमनस्क देखकर महिषका वह रूप छोड़कर तत्काल सिंहका रूप धारण कर लिया॥ १॥
कृत्वा नादं महाघोरं विस्तार्य च महासटाम्।<br>पपात सुरसेनायां त्रासयन्नखदर्शनैः॥ २तत्पश्चात् भयानक गर्जन करके गर्दनके बाल (अयाल) फैलाकर अपने तीक्ष्ण नख दिखाकर देवताओंको भयभीत करता हुआ वह देवसेनापर टूट पड़ा॥ २॥
गरुडञ्च नखाघातैः कृत्वा रुधिरविप्लुतम्।<br>जघान च भुजे विष्णुं नखाघातेन केसरी॥ ३उसने गरुड़के ऊपर अपने नाखूनोंसे आघात करके उन्हें रक्तसे लथपथ कर दिया। पुनः सिंहरूपधारी उस दानवने विष्णुकी भुजापर अपने नखोंसे प्रहार किया॥ ३॥
वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य वेगवान्।<br>हन्तुकामो हरिः काममवापाशु क्रुधान्वितः॥ ४भगवान् विष्णुने उसे देखकर कुपित हो तत्काल अपना सुदर्शन चक्र लेकर उस दैत्यको मार डालनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उसपर चला दिया॥ ४॥
यावद्वयरिपुं वेगाच्चक्रेणाभिजघान तम्।<br>तावत्सोऽतिबलः शृङ्गी शृङ्गाभ्यां न्यहनद्धरिम्॥ ५भगवान् विष्णुने उस महिषासुरपर ज्यों ही अपने चक्रसे तेज प्रहार किया त्यों ही वह महान् शक्तिशाली महिषका रूप धारणकर भगवान् विष्णुको अपनी सींगोंसे मारने लगा॥ ५॥
वासुदेवो विषाणाभ्यां ताडितोरसि विह्वलः।<br>पलायनपरो वेगाज्जगाम भुवनं निजम्॥ ६वक्षःस्थलपर सींगके आघातसे व्याकुल होकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे भागकर अपने लोक चले गये।
गतं दृष्ट्वा हरिं कामं शङ्करोऽपि भयान्वितः।<br>अवध्यं तं परं मत्वा ययौ कैलासपर्वतम्॥ ७विष्णुको पलायित देखकर शंकरजी भी बहुत भयभीत हो गये और उसे सर्वथा अवध्य मानकर कैलासपर्वतपर चले गये।
ब्रह्मापि च निजं धाम त्वरितः प्रययौ भयात्।<br>मघवा वज्रमालम्ब्य तस्थावाजौ महाबलः॥ ८ब्रह्माजी भी उसके डरसे तत्काल अपने लोक चले गये॥ ६-७ १/२॥<br>महाबली इन्द्र वज्र धारण किये हुए समरांगणमें डटे रहे।
वरुणः शक्तिमालम्ब्य धैर्यमालम्ब्य संस्थितः।<br>यमोऽपि दण्डमादाय यत्तः समरतत्परः॥ ९वरुणदेव अपना पाशास्त्र लेकर धैर्यपूर्वक खड़े रहे। यमराज अपना दण्ड धारण किये युद्ध करनेके लिये सावधान होकर खड़े थे।
ततो यक्षाधिपः कामं बभूव रणतत्परः।<br>पावकः शक्तिमादाय तत्राभूद्युद्धमानसः॥ १०यक्षाधिपति कुबेर युद्ध करनेके लिये पूर्णरूपसे उद्यत थे और अग्निदेव बर्छी लेकर युद्ध करनेके विचारसे स्थित थे।
नक्षत्राधिपतिः सूर्यः समवेतौ स्थितावुभौ।<br>वीक्ष्य तं दानवश्रेष्ठं युद्धाय कृतनिश्चयौ॥ ११नक्षत्रोंके नायक चन्द्रमा तथा भगवान् सूर्य—दोनों एक साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये और उस दानवश्रेष्ठ महिषासुरको देखकर उन्होंने युद्ध करनेका निश्चय कर लिया॥ ८—११॥