देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 571, कुल 889 में से
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| श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ ] |
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| ५६२ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धं दैत्यसैन्यं समभ्यगात्।<br>विसृजन्बाणजालानि क्रूराहिसदृशानि च॥ १२ | इतनेमें क्रूर सर्पोंके समान बाण-समूहोंकी वर्षा करती हुई क्रुद्ध दानवी सेना वहाँ आ गयी॥ १२॥ |
| कृत्वा हि माहिषं रूपं भूपतिः संस्थितस्तदा।<br>देवदानवयोधानां निनादस्तुमुलोऽभवत्॥ १३ | वह दानवराज महिषका रूप धारण करके खड़ा था। उस समय देवता तथा असुर-पक्षके योद्धाओंका भीषण गर्जन होने लगा॥ १३॥ |
| ज्याघातश्च तलाघातो मेघनादसमोऽभवत्।<br>संग्रामे सुमहाघोरे देवदानवसेनयोः॥ १४ | देवताओं तथा दानवोंके बीच हो रहे महाभयानक संग्राममें धनुषकी टंकार तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनि मेघ-गर्जना जैसी प्रतीत हो रही थी॥ १४॥ |
| शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप च महाबलः।<br>जघान सुरसङ्घांश्च दानवो मदगर्वितः॥ १५ | अभिमानमें चूर महाबली दैत्य महिषासुर अपनी सींगोंसे पर्वत-शिखर फेंक-फेंककर देवसमूहपर प्रहार कर रहा था॥ १५॥ |
| खुराघातैस्तथा देवान्युच्छस्य भ्रमणेन च।<br>स जघान रुषाविष्टो महिषः परमाद्भुतः॥ १६ | क्रोधमें भरे हुए उस परम अद्भुत महिषासुरने अपने खुरोंके आघातसे तथा पूँछ घुमाकर बहुत-से देवताओंपर प्रहार किया॥ १६॥ |
| ततो देवाः सगन्धर्वा भयमाजग्मुरुद्यताः।<br>मघवा महिषं दृष्ट्वा पलायनपरोऽभवत्॥ १७ | तत्पश्चात् लड़नेके लिये उद्यत देवता तथा गन्धर्व भयभीत हो गये और महिषासुरको देखकर इन्द्र भी भाग गये॥ १७॥ |
| सङ्गरं सम्परित्यज्य गते शक्रे शचीपतौ।<br>यमो धनाधिपः पाशी जग्मुः सर्वे भयातुराः॥ १८ | संग्राम छोड़कर शचीपति इन्द्रके भाग जानेपर यमराज, धनाध्यक्ष कुबेर तथा वरुणदेव—ये सब भी भयभीत होकर भाग चले॥ १८॥ |
| महिषोऽपि जयं मत्वा जगाम स्वगृहं ततः।<br>ऐरावतं गजं प्राप्य त्यक्तमिन्द्रेण गच्छता॥ १९<br>तथोच्चैःश्रवसं भानोः कामधेनुं पयस्विनीम्।<br>स्वसैन्यसंवृतस्तूर्णं स्वर्गं गन्तुं मनो दधे॥ २० | महिषासुर भी अपनी जीत मानकर अपने घर चला गया। इन्द्रके भाग जानेके बाद उनके द्वारा त्यक्त ऐरावत हाथी, सूर्यका उच्चैःश्रवा घोड़ा तथा दूध देनेवाली कामधेनु गौको उसने हस्तगत कर लिया। तत्पश्चात् उसने शीघ्र ही सेनाको साथमें लेकर स्वर्ग जानेका मनमें निश्चय किया॥ १९-२०॥ |
| तरसा देवसदनं गत्वा स महिषासुरः।<br>जग्राह सुरराज्यं वै त्यक्तं देवैर्भयातुरैः॥ २१ | इसके बाद शीघ्र ही देवलोक पहुँचकर महिषासुरने भयाक्रान्त देवताओंके द्वारा पहलेसे ही छोड़ दिये गये उनके राज्यपर आधिपत्य कर लिया॥ २१॥ |
| इन्द्रासने तथा रम्ये दानवः समुपविशत्।<br>दानवान्स्थापयामास देवानां स्थानकेषु सः॥ २२ | इसके बाद उस रमणीय इन्द्रासनपर महिषासुर आसीन हुआ और उसने राज्य-संचालनार्थ देवताओंके स्थानपर दानवोंको स्थापित कर दिया॥ २२॥ |
| एवं वर्षशतं पूर्णं कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>अवापैन्द्रपदं कामं दानवो मदगर्वितः॥ २३ | इस प्रकार पूरे सौ वर्षतक भीषण युद्ध करके अभिमानमें चूर उस दैत्यने इन्द्रपद प्राप्त किया॥ २३॥ |
| निर्जरा निर्गता नाकात्तेन सर्वेऽतिपीडिताः।<br>एवं बहूनि वर्षाणि बभ्रमुर्गिरिगह्वरे॥ २४ | सभी देवता उस महिषासुरसे प्रताड़ित होकर स्वर्गसे निकल गये और बहुत वर्षोंतक पर्वतकी गुफाओंमें घूमते-फिरते रहे॥ २४॥ |